लोक धारणा : राजा विक्रमादित्य के पिता राजा गन्धर्वसेन की गन्धर्वपुरी

राजा विक्रमादित्य

भविष्य पुराण में कलियुग के प्रारंभ के 3710 वर्षोंपरांत अवन्ती प्रदेश में प्रमर नामक राजा था महामद, देवापि, देवदूत, देव गन्धर्वसेन परवर्ती राजा हुए गन्धर्वसेन अपने पुत्र शंख को राजपाट सौंपकर वानप्रस्थ चले गये यह जानकारी मिलती है। भविष्य पुराण में ही विक्रमादित्य को प्रमरवंश का बताया गया है। जिसकी वंशावली है पंवारवंशदर्पण, जिसमें चित्रांगद गन्धर्वसेन, विक्रमादित्य, भर्तृहरि, खवासन का बेताल, बहिन मैनावती, उसका बेटा गोपीचन्द विक्रमादित्य का पुत्र विक्रमचरित्र, का नाम आता हैं। यह प्रमर वंश ही संस्कृत में परमावंश कहलाया। 11वीं शताब्दी की क्षेमेन्द्र की वृहत्कथा मंजरी के अनुसार विदेशी शकों, काम्बोजों यवनों, हूणों, बार्वरों तुषारों को नष्ट कर विक्रमादित्य ने धर्म की स्थापना की। सोमदेव की कथासरित्सागर, बुधस्वामी की वृहत्कथा श्लोकसंग्रह की इसकी संपुष्टि करते हैं। गन्धर्वसेन का पूरा परिवार का नाम लोककथाओं और लोकगीतों में पूरे आदर के साथ लिया जाता रहा।
मालवा में लोकप्रिय लोकख्यानों में भी उज्जैन के राजा गर्दभिल्ल उनकी रानी चम्पादे का संतान प्राप्ति हेतु अनुष्ठान करने और भरथरी के जन्मने का रसभीना कथानक आता है।
उज्जैनी तीरथ बड़ों महाकार रो राज
जतरा बी राज विया करया धरम रा काज
गर्ध भिल्ल राजो बड़ो नैम धरम निरधार
चम्पाडे राणी कहें सतवतीं सतनार
राणी  तप तपसा  करे करे  पुन्न  रा काम
गर्ध भिल्ल राजो सुभद्र सूरवीर रण हाम।
लोककंठों में थिरकता लोकगीत आँखों देखी पर भरोसा करता है। यही कारण है कि 2100 साल पुरानी इतिहास आश्रित गाथाओं को बिना लाग लपेट के जस का तस कांठानुकंठ पहुंचाता रहता है।

९० वर्षीया केसर बाई लोकगीत गायक का साक्षात्कार

भीली कथाएं भी इसका साक्ष्यांकन करती हैं। जिनमें वर्णित है कि गर्दभिल्ल भीलों का राजा था गंधर्व भिल्ल गोत्र का था चारीखूंट उसका रौब था उसने चार विवाह किये क्षत्राणी से विक्रमादित्य, ब्राह्मणीसे वररूचि, बनियानी से शंकू और शूद्रा से भाटड़ा (भट्ट) पैदा हुआ। विक्रमादित्य के पैदा होने के दिन दितवार था इसलिए उसका नाम दितवारया पड़ा गंधर्व भिल्ल को न्यायप्रिय, खड़गविद्या में निपुण, धर्मप्राण वन रक्षक निर्धनों का सहारा बताते हुए शब्द भेदी बाण चलाने में अभ्यस्त रणभूमि में सिंह के समान गर्जना करने वाला इन्द्र की भांति यशस्वी बताया गया है। गंधर्व भिल्ल को क्षत्रिय मानने वाले उसे कई नामों से पुकारे जाने जैसे महेन्द्रदित्य/गंधर्वसेन आदि की जानकारी भी देते हैं। उनकी क्षत्रिय रानी मृगनयनी थी शिवकी परमाराध्या थी नित्य भण्डारा करती थी। क्षिप्रा के जल से सूर्य को अर्घ्य देने वाली चम्पावर्णी स्त्री होने के कारण चम्पावती कहलायी ऐसा लिखा मिलता है। गंधर्वसेन को गांव की बहनें बेटियां मामा कहकर संबोधित करती थीं।

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Comments

  1. O P Mishra says:

    Wow! Well written and finely executed. You proved that Gardbhilla was Vikramaditya’s father. You are on the footsteps of Mrs devala Mitra DGA SI. Taking forward the interest in the field of art culture,and archaeology.
    Congratulations!

  2. दिनेश झाला says:

    काफी समय बाद आपकी गन्धर्वपुरी पर रचना पढने के बाद बहुत आनंद आ गया धन्यवाद आभार।
    -दिनेश झाला शाजापुर ।🙏🏻🙏🏻👏👏

  3. Shyam says:

    दीदी नमस्कार.केसर बाई के लोकगीत मे आनंद आ गया आपके द्वारा हमे कई सारी एतिहासिक जानकरी प्राप्त हुई आपका आभार.आपको बधाई.

  4. वीरेंद्र सिंह says:

    ऊँ नमः शिवाय आपका नया ब्लाग पढ़ कर अति प्रसन्नता हुई परन्तु उससे अधिक जिज्ञासा बढ़ गयी गन्धर्व पुरी के बारे में एक ऐसे प्रतापी राजा और वंश के बारे में जिन्होंने परमार वंश की नीव रखी जिनका साम्राज्य मध्य भारत से दक्षिण भारत तक फैला हुआ था जिनके वंशज एक महान सम्राट विक्रमादित्य हुए तो दूसरे राजा भर्तृहरि जिन्होने हिन्दू धर्म का मार्ग दर्शन किया, सबसे बड़ी बात जो आपके शोध से सामने आयी कि किस प्रकार पहले के इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के साथ घोर अन्याय किया है आपने जिस तरह से पूरी प्रमाणिकता के साथ तथ्यों को सामने लाने का प्रयास किया है शायद इससे आने वाले समय में भारत का प्राचीन इतिहास पुनः एक बार ऐसे ही शोध के साथ देश दुनिया के सामने लाने की आवश्यकता है, आज की जो युवा पीढ़ी जिसको अपने गौरव शाली इतिहास को ना तो बताया गया और ना तो दिखाया गया ऐसे छात्रों के लिए आपका ये लेख किसी अमूल्य खजाने से कम नहीं हैं पर मेरा उन छात्रों से भी निवेदन है कि वे आपका लेख सिर्फ पढ़े नहीं बल्कि गंधर्वपुरी आकर स्वयं अवलोकन भी करे ।इतिहास में प्रामाणीकता सिर्फ किताबों के अन्दर नहीं बल्कि भारत के लोककथाओं में व लौकक्तियो में भी भरे पड़े हैं । जिसको ये पश्चिमी मानसिकता वाले इतिहासकारों ने बड़ी चालाकी से नकारने की कोशिश की । मेरे विचार से आपका ये लेख राजपूत वंश में परमार वंश को और अधिक गहराई से जानने में सहायक सिद्ध होगा ।गंधर्वपुरी को सरकार को विश्व धरोहर स्थल व पर्यटक स्थल घोषित करना चाहिए जिससे भारतीय अपने गौरव शाली इतिहास को जान सके व राज्य का भी आर्थिक विकास हो ।

  5. कमलेश बुन्देला says:

    अति सुन्दर जानकारी
    कमलेश बुन्देला

  6. दयाराम सिरोलिया says:

    बहुत ख़ूब दीदी
    दयाराम सिरोलिया देवास