लोक धारणा : राजा विक्रमादित्य के पिता राजा गन्धर्वसेन की गन्धर्वपुरी

राजा विक्रमादित्य

मालवी में गंधर्व सेन के गर्धभ रूप की प्रमाणिकता को सिद्ध करते हुए जनश्रुति मिलती है राजा भागोर की पुत्री बाईसा अपनी सहेलियों के साथ खेल रही थी तभी मेध बरसने लगते है बईसा इन्द्र देव से प्रार्थना करती है कि अभी मत आना खेल खत्म हो जाने के बाद आ जाना। खेल समाप्त होते ही इन्द्र राजा उस तक पहुंचते है वे बईसा से गंधर्व विवाह करते हैं। उनसे हुए पुत्र से गांव वाले पिता का नाम जानने की चेष्टा करते हैं। बालक हर दिन अपनी मां से वहीं प्रश्न दोहराता है थकहार कर मां अर्धरात्रि में इन्द्र के जाते समय विमान को दिखाकर बालक को उसके पिता के नाम से अवगत करा देती है बालक दौड़कर इन्द्र के विमान को पकड़कर इन्द्रपुरी पहुंच जाता है। जहां अप्सराएं नृत्यरत रहती हैं। इन्द्रसभा में आये नये आगन्तुक को देखकर अप्सराओं का ध्यान भंग होने से क्रुद्ध इन्द्र सभा में खड़े अपने पुत्र को देखकर कहते है तू यहां आ गया गधा क्यों नहीं बन गया और पैर से नीचे की ओर धकेल देतें हैं। पृथ्वीलोक में गिरकर बालक गधा बन जाता है और गधी के गर्भ से जन्मता है। लोक जब किसी पर तुष्ट हो जाता है तब उसमे दिव्यता की सर्जना स्वयं कर लेता है।

पुरातत्व संग्रहालय परिसर की मुक्ताकाशी दीर्घा संग्रहालय के संरक्षक रामलाल कुसुमारिया

यही विचारते हुए गांव की संकरी गलियां हमें पंचायत भवन में स्थित मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित संग्रहालय की मुक्ताकाशी दीर्घा तक ले आई थीं। यहां हमें रामलाल कुसुमारिया जी मिले जो सरकार की ओर से यहां संग्रहीत लगभग 300 शैव, शाक्त, वैष्णव व जैन प्रतिमाओं के संरक्षण का दायित्व संभाल रहे थे। अवलोकनार्थ रखी ध्यानवस्थित शिव की प्रतिमा उमा महेश्वर की वृषभारुड़ प्रतिमा, समभंग मुद्रा में चतुर्भुजी शिव प्रतिमा सौम्य मुखाकृति अलंकृत शेषशायी विष्णु प्रतिमा, वराह स्वरूपी प्रतिमा, चतुर्भुजी अष्ठ हस्तधारी समभंगी मुद्रा में विष्णु जी के नीचे हयग्रीव दो द्वारपाल खड्गासन में स्थित, गरूढ़ासीन अष्टभुजाधरी वैष्णवी, सूर्य की दुर्लभ प्रतिमा (जो सूर्यशिव, विष्णु और ब्रह्मा का सामजस्य प्रदर्शित कर रही थी)  इस प्रतिमा का प्रभामण्डल चेत्याकार तीन बंधनों में दृष्टिगोचर हो रहा था। यह परमारकालीन सर्वोत्तकृष्ट कृति थी। गंधर्वपुरी के संग्रहालय में पदमासन में जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी की प्रस्तर प्रतिमा, खडगासन में शांतिनाथ जी, महावीर स्वामी जी का पद्मकलम से अलंकृत मनोहारी प्रभामण्डल, कुन्तल केशराशि और छाती पर श्रीवत्स अत्यन्त प्रभावकारी थे। अम्बिका देवी द्विभंग मुद्रा में सप्तफणी नाग के नीचे आजानबाहू पार्श्वनाथ जी, लेटी र्हुअ अवस्था में जैन तीर्थकर, कल्प वृक्ष के नीचे खड़ी जैन यक्षिणी का माधुर्य, बीस भुजाओं वाली चक्रेश्वरी देवी का द्विभंगी मुद्रा में लालित्य उस काल के शिल्पसौष्ठव की पराकाष्ठा को दर्शा रहा था। धार्मिक सहिष्णुता के परिचायक ये परमारकालीन शिल्प उस समय के शिल्पियों के शिल्प नैपुण्य का प्रदर्शन था।

गन्धर्वपुरी संग्रहालय के भीतर सहेजी गईं प्रतिमाएँ, अंतिम चित्र राज्य पुरातत्व संग्रहालय भोपाल में गन्धर्वपुरी से प्राप्त संरक्षित कार्तिकेय प्रतिमा

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Comments

  1. O P Mishra says:

    Wow! Well written and finely executed. You proved that Gardbhilla was Vikramaditya’s father. You are on the footsteps of Mrs devala Mitra DGA SI. Taking forward the interest in the field of art culture,and archaeology.
    Congratulations!

  2. दिनेश झाला says:

    काफी समय बाद आपकी गन्धर्वपुरी पर रचना पढने के बाद बहुत आनंद आ गया धन्यवाद आभार।
    -दिनेश झाला शाजापुर ।🙏🏻🙏🏻👏👏

  3. Shyam says:

    दीदी नमस्कार.केसर बाई के लोकगीत मे आनंद आ गया आपके द्वारा हमे कई सारी एतिहासिक जानकरी प्राप्त हुई आपका आभार.आपको बधाई.

  4. वीरेंद्र सिंह says:

    ऊँ नमः शिवाय आपका नया ब्लाग पढ़ कर अति प्रसन्नता हुई परन्तु उससे अधिक जिज्ञासा बढ़ गयी गन्धर्व पुरी के बारे में एक ऐसे प्रतापी राजा और वंश के बारे में जिन्होंने परमार वंश की नीव रखी जिनका साम्राज्य मध्य भारत से दक्षिण भारत तक फैला हुआ था जिनके वंशज एक महान सम्राट विक्रमादित्य हुए तो दूसरे राजा भर्तृहरि जिन्होने हिन्दू धर्म का मार्ग दर्शन किया, सबसे बड़ी बात जो आपके शोध से सामने आयी कि किस प्रकार पहले के इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के साथ घोर अन्याय किया है आपने जिस तरह से पूरी प्रमाणिकता के साथ तथ्यों को सामने लाने का प्रयास किया है शायद इससे आने वाले समय में भारत का प्राचीन इतिहास पुनः एक बार ऐसे ही शोध के साथ देश दुनिया के सामने लाने की आवश्यकता है, आज की जो युवा पीढ़ी जिसको अपने गौरव शाली इतिहास को ना तो बताया गया और ना तो दिखाया गया ऐसे छात्रों के लिए आपका ये लेख किसी अमूल्य खजाने से कम नहीं हैं पर मेरा उन छात्रों से भी निवेदन है कि वे आपका लेख सिर्फ पढ़े नहीं बल्कि गंधर्वपुरी आकर स्वयं अवलोकन भी करे ।इतिहास में प्रामाणीकता सिर्फ किताबों के अन्दर नहीं बल्कि भारत के लोककथाओं में व लौकक्तियो में भी भरे पड़े हैं । जिसको ये पश्चिमी मानसिकता वाले इतिहासकारों ने बड़ी चालाकी से नकारने की कोशिश की । मेरे विचार से आपका ये लेख राजपूत वंश में परमार वंश को और अधिक गहराई से जानने में सहायक सिद्ध होगा ।गंधर्वपुरी को सरकार को विश्व धरोहर स्थल व पर्यटक स्थल घोषित करना चाहिए जिससे भारतीय अपने गौरव शाली इतिहास को जान सके व राज्य का भी आर्थिक विकास हो ।

  5. कमलेश बुन्देला says:

    अति सुन्दर जानकारी
    कमलेश बुन्देला

  6. दयाराम सिरोलिया says:

    बहुत ख़ूब दीदी
    दयाराम सिरोलिया देवास