बिहार का गोड़ऊ लोकनाट्य, बुंदेली लोकगान और असम के लोकनृत्य

बिहार का गोड़ऊ लोकनाट्य, बुंदेली लोकगान और असम की कथक गुरू मरामी मेंधी लोकनृत्य शैली देवधानी और ओझा पाली

इसी कारण उनकी मण्डली के अधिकांश लोक कलाकार 60 वर्ष से अधिक उम्र के हैं। यद्यपि गोंडऊ नाच परंपरा ने वह दिन भी देखे हैं जब बच्चोें के तिलक और मुंडन आदि के शुभ अवसर पर माएं अपना आंचल बिछाती थीं। जिस पर लौंडा नाचकर अशीष गीत गाता था उसे उन दिनों में 1000 रू. की राशि ईनाम में दी जाती थी। कुचड़ा – कुचड़िन की हंसी ठिठोलियों में रुचने वाला लोकमानस यहां तक कि सिनेमागृहों का रास्ता तक भूल चुका था। गोंडऊ लोक नाट्य शैली का लिपिबद्ध साहित्य नहीं मिलता जैसा कि अन्य लोक धर्मी परंपराओं से मिलता है। कथा गीतपरक दोहे-चौपाई, सद्यःप्रसूत, कल्पित संवादों और लास्यागों वाली अनोखी मौलिकता लिए सामने आती जाती है। स्नातक उत्तीर्ण प्रभुकुमार अब अपने पूर्वजों की श्रृंगारिक धार्मिक और सामाजिक कथानकों वाली परंपराओं को लिपिबद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं। वे बताते हैं धोबी-धोबनिया का ‘दुमखच’ जिसमें बारात में पुरूषों की रवानगी के पश्चात घर में छूट गई महिलाएं डकैती के डर से मोहल्ले को जगाये रखने की गरज से जुलवा की नकलें व स्वांग करती थीं उन्हें भी सहेजने के दायित्व उन्होंने उठाया है। ‘बकलौल’ दहेज की कुरीति से बचने के लिए 18 साल की नववधु और उम्र दराज पति (बुड़बक) वाला विवश तरूणाई प्रहसन लोक रसिकों को झकझोरता है को भी उनके द्वारा पृष्ठांकित किया जा रहा है। लिखित कथानक के बिना खेले जाने वाले इस लोक नाट्य में हुड़का वादक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। कुल मिलाकर वह परिधि के मध्य का केन्द्र बिन्दु होता है। जो स्वयं स्फूर्तवान् नर्तकों का संचालन अपने ध्वनि संकेतों से देता चलता है।

उसके संकेत पाकर ही नर्तक तेजी से हिलता डुलता ठुमकता है और पुनः पैतरा बदलता है। मुरदार शंख रगड़ कर, होंठरानी लगाकर, राख से काजल (करीखा) बनाकर बनावटी बालों के उपयोग से सादगी भरी देहाती साज-सज्जा में जब इनका अंग-अंग फड़कता है तो लोक में थिरकन पैदा करता है। यद्यपि भावावेश में पात्रों द्वारा परिवेश से प्रभावित होकर अश्लील गाली-गलौज और फब्तियां कसने से इस लोकनाट्य शैली को उत्कर्ष के बाद अपकर्ष का भी सामना करना पड़ा है। इस बात की चिंता प्रभु कुमार जैसे संवेदनशील कलाकार को भी सताती है पर वे निरंतर परिवर्तनशील प्रदर्शनकारी लोक कलाओं के संरक्षण संवर्धन के लिए किये जा रहे सरकारी प्रयासों को नाकाफी मानकर इसे और अधिक प्रश्रय देने की वकालत भी करते हैं। वे गोंडजाति के युवाओं को समझाते हैं। “हम साग सब्जी बेचहिं बटिया प खेती करहीं कि इ कला क जिंदा रखीं ठीक ह जब तक करत हईं करत हई इ कला आपन पूर्वजन क धरोहर ह एके सहेजल आपन धरम ह” अपनी प्रभावकारी कला से ‘शिव-विवाह’ के प्रस्तुतिकरण से दर्शकों को बिहार की लोकसंस्कृति से परिचित कराने वाले प्रभुकुमार गोंड, नंदजी गोंड, संजय गोंड, श्रीनिवास गोंड़, दहारी गोंड़, भीम राठौर, हुड़क पर भृगुनाथ गोंड़, मंजीरे पर कमला गोंड़, श्रीकांत गोंड, मोतीलाल और गुप्तेश्वर गोंड़ की जितनी प्रशंसा की जाए वह कम ही होगी।

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Comments

  1. Marami Medhi says:

    Excellent write up.
    Thank you so much for the write up and video.
    Excellent reporting.

    Regards
    Marami Medhi 🙏

  2. उदय सेवक धावन says:

    वाह बहुत ही सुन्दर

  3. प्रभु बिहार says:

    आपने तो हम लोगों का नाटक का इतिहास लिख डाला बहुत अच्छा लगा अब तक तो हमारी शैली को कोई इतना प्यार नहीं किया जितना आप ने दिया है

  4. Dr Manish Sharma says:

    Bihar me hudka naach ke rup me ye famous dance form lupt ho raha hai isme purush hi mahila patra ban nachte accha laga

  5. Dr Anil pathak says:

    Very nIce…OLD Traditions must be preserved….well carried out..

  6. वीरेन्द्र सिंह says:

    आपने बिहार का गोड़ ऊ नाच का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है परन्तु मै जहाँ तक समझता हूँ ये गोड़ जाती और उनका नाच सिर्फ बिहार का कहना ठीक नही होगा क्योकि ये गोड़ जाती बिहार के अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी अच्छी खासी तादाद में पाये जाते हैं हमारे आजमगढ़ और मऊ जिले में खूब है और इनका हुरका नाच बहुत ही शौक से लोग देखते है हमारे गाँव के देवीजी के मन्दिर पर साधारणतया हर मौके जैसे मुंडन शादी और पूजा पर खूब देखने को मिलता है हमारे घर के पीछे काफी संख्या गोड़ लोगों की है आप ने लिखा है कि ये सिर्फ पुरुष ही करते है परन्तु हमारे घर के पीछे एक गोड़ीन थी उसके जैसा गोड़ऊ नाच करने वाला हमने नहीं देखा जिसका पिछले वर्ष ही देहांत हो गया परन्तु आपका लेख व गोड़ो का प्रोगाम देख कर गाँव की याद ताजा हो गई ।