बिहार का गोड़ऊ लोकनाट्य, बुंदेली लोकगान और असम के लोकनृत्य

बिहार का गोड़ऊ लोकनाट्य, बुंदेली लोकगान और असम की कथक गुरू मरामी मेंधी लोकनृत्य शैली देवधानी और ओझा पाली

शाक्त परम्परा के गढ़ असम जहां देवी कामाख्या का तांत्रिक पीठ है की पावन भूमि पर 15वीं सदी ईसवी में वेष्णव मठाों की स्थापना का श्रेय श्रीमंत शंकर देव को जाता है जिन्होंने नृत्य को अराधना संकीर्तन तथा कथावाचन शैली में निबद्ध कर वैष्णव मत के प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम बनाया। स्थानीय नृत्य के समस्त घटकों के सम्ममिश्रण से एक नई नृत्य शैली का सूत्रपात किया जिसके माध्यम से गायन व नृत्य ही नहीं धार्मिक आख्यानों को लोकग्राहय बनाया जा सका। समग्र असम में ऐसे पूजा केंद्र ‘नामघर’ कहलाये। शैव शाक्त, गाणपत्य परंपराायें असम की पूज्य भूमि पर पल्लवित हुईं पनपीं और विकसीं। मेधामी बताती हैं कि लंदन, मिस्त्र, फिलिस्तीन, इजराइल, न्यूजीलैण्ड, सउदी अरब, बांग्लादेश आदि देशों में उनकी कला को विशेष सराहना मिली। लेकिन सर्वाधिक प्रशंसा उज्जैन के सभागार में मिली जिसके स्मरण मात्र से आज भी उन्हें स्वार्गिक सुख मिलता है। उनका मानना है कि उज्जैन स्थित हर सिद्धि और असम में कामाख्या शक्तिपीठों की विद्यमानता के कारण भी सम्भवतः उन्हें ऐसी अनुभूति हुई हो। उनकी प्रस्तुति में पुत्री मेघरंजनी मेधी, सुकन्याबोरा, अमृतप्रवा महंता, बरनाली कलिता, हिमश्री शर्मा, हृदयपरेश कलिता की सहभागिता महत्वपूर्ण रही यहां श्री कौशिक की प्रकाश व्यवस्था का उल्लेख भी आवश्यक है। असमिया लोक संस्कृति के प्रसार हेतु निष्ठापूर्वक सेवा करना जिनका परम ध्येय हो ऐसी प्रतिभासम्पन्न कथक गुरू मेधामी मेधी की कला साधना असमिया लोक कलाओं के उन्नयन में विशेष उपलब्धि कहलायेगी।

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Comments

  1. Marami Medhi says:

    Excellent write up.
    Thank you so much for the write up and video.
    Excellent reporting.

    Regards
    Marami Medhi 🙏

  2. उदय सेवक धावन says:

    वाह बहुत ही सुन्दर

  3. प्रभु बिहार says:

    आपने तो हम लोगों का नाटक का इतिहास लिख डाला बहुत अच्छा लगा अब तक तो हमारी शैली को कोई इतना प्यार नहीं किया जितना आप ने दिया है

  4. Dr Manish Sharma says:

    Bihar me hudka naach ke rup me ye famous dance form lupt ho raha hai isme purush hi mahila patra ban nachte accha laga

  5. Dr Anil pathak says:

    Very nIce…OLD Traditions must be preserved….well carried out..

  6. वीरेन्द्र सिंह says:

    आपने बिहार का गोड़ ऊ नाच का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है परन्तु मै जहाँ तक समझता हूँ ये गोड़ जाती और उनका नाच सिर्फ बिहार का कहना ठीक नही होगा क्योकि ये गोड़ जाती बिहार के अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी अच्छी खासी तादाद में पाये जाते हैं हमारे आजमगढ़ और मऊ जिले में खूब है और इनका हुरका नाच बहुत ही शौक से लोग देखते है हमारे गाँव के देवीजी के मन्दिर पर साधारणतया हर मौके जैसे मुंडन शादी और पूजा पर खूब देखने को मिलता है हमारे घर के पीछे काफी संख्या गोड़ लोगों की है आप ने लिखा है कि ये सिर्फ पुरुष ही करते है परन्तु हमारे घर के पीछे एक गोड़ीन थी उसके जैसा गोड़ऊ नाच करने वाला हमने नहीं देखा जिसका पिछले वर्ष ही देहांत हो गया परन्तु आपका लेख व गोड़ो का प्रोगाम देख कर गाँव की याद ताजा हो गई ।