पश्चिम बंगाल की लोक नाट्य शैली “भवानी जात्रा” में महिषासुरमर्दिनी

शुभोजीत के अनुसार जात्रा का अर्थ ही यात्राओं के माध्यम से भिन्न भिन्न स्थानों पर धार्मिक प्रवृति के नाटकों का आयोजन करना होता था लोक पर्वों और धार्मिक उत्सवों में पौराणिक आख्यायिकाएं ही चैतन्यमहाप्रभु के भक्ति आंदोलन से संकीर्तन के साथ-साथ पश्चिम बंगाल से त्रिपुरा, असम, उड़ीसा यहां तक कि बिहार भी पहुंची। भक्ति आंदोलन का प्रभाव परिनिष्ठित लोक कलाओं पर भी पड़ा।नि:सन्देह मध्ययुग में लीलापरक जात्रा की प्रसिद्धि इतनी अधिक थी कि मध्ययुग को जात्रा का उत्कर्ष काल कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।  शुभोजीत के अनुसार धर्मोन्मुख होने से लोक विश्वास को अनुसरित करने वाले अभिनय और लोकगीत जात्रा का अंग बने। देवी देवताओं के चित्रण और  नृत्यप्रधान अभिनय वाली इस विधा में निरंतर विकास के कारण नये-नये सामाजिक सरोकारों वाले प्रसंगों का  समावेश होता गया। एक समय में डेढ़ सौ रूपये के बजट वाली इस विधा में कलाकारों को एक आने से लेकर चार आने तक दिए गए। जात्रा का एक अन्य स्वरूप जात्रा पाला के रूप में पश्चिम बंगाल में मिलता है जिसमे लोकनाट्य का मंचन धारावाहिक की शैली में प्रतिदिन होता है। बंगाल में आज भी जात्रापाला का स्वरूप अस्तित्व में है। इसमें  कृष्ण जात्रा, शिवजात्रा, राम जात्रा, सीता जात्रा और भवानी जात्रा आदि का मंचन होता है।

पूरी रात चलने वाले ऐसे आयोजन उत्तर 24 परगना के क्षेत्रों में बहुतायत से होने लगे थे । पुरूलिया, मिदनापुर बीरभूम में जात्रा टोलियों की धूम थी। भड़कीले परिधान , लिपे पुते चहरों वाले पात्र ,संगीत का अतिरेक  इन जात्राओं  में  विवेक नामक पात्र ही उचित और अनुचित समझाने लगा था। वही  पद्यबद्ध रचनाओं के माध्यम से दो भूमिकाओं में संलाप कर गूढ़ार्थ स्पष्ट करता था जिसमें एक विवेकी और दूसरा अविवेकी होता था। जिसमें कई दृश्यों को एक कथासूत्र में पिरोया जाता था। वर्तमान में चार घण्टे की समयावधि वाली जात्रा में 7-8 गाने दृश्यानुसार यथोचित मानकर रख लिए जाते हैं जबकि पूर्व में 65-70 गीतों के बिना जात्रा अधूरी मानी जाती थी। शुभोजीत और सप्तर्षि मोहंती जात्रा के इतिहास से जुड़ी जानकारियां साझा कर रहे थे।

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Comments

  1. डॉ शैल श्रीवास्तव ,गीतांजलि कॉलेज,भोपाल says:

    दिशा जी आपके द्वारा लिखा गया ये ब्लॉग बहुत ही बढ़िया हे एकदम सटीक। आपको धन्यवाद की आपने हम सबको पश्चिम बंगाल के इस लोक नाट्य शैली “भवानी जत्रा” से परिचित कराया।
    वीडियो देखने पर आपकी लेखनी उसके साथ चलती नजर आईं। भाषा में तारतम्य कहीं भी टूटता नहीं हे। मां महिषासुर मर्दिनी के क्रोध का संपूर्ण वर्णन बहुत ही सुंदर किया गया हे। अंत में ,
    एक संदेश भी प्रतीत होता है कि सब रिश्तों में मां का स्थान सबसे ऊंचा हे।

  2. शुभोजीत हलदर says:

    Thank u so much ma’am…
    Bahot accha laga…
    Bahot i accha lika ma’am
    Thank u ma’am thank u so much….🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻💐

  3. राम जूनागढ़ says:

    Cભવાની જાત્રા કા પરિચય સુંદર તરીકે સે કરવાને કે લિએ ધન્યવાદ. લોકકલાઓકે બારેમે આપને પુખ્તા જાનકારી પ્રાપ્ત કરકે પીરસી હૈ.
    યા શકિત સર્વ ભૂતેષુ માતૃરુપેણ સંસ્થિતા,
    નમ : તસ્યૈ , નમ : તસ્યૈ , નમ : તસ્યૈ.