लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती (चकल्दी) में शांत

लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती में शांत

 

शनि प्रकोप से प्रभावित राजा विक्रमादित्य के चम्पावती नगरी में प्रवेश संबंधी कथानक के सूत्र चकल्दी में उपलब्ध

मध्यप्रदेश के  शाजापुर जिले के अवन्तिपुर बड़ोदिया और पगरवाद गांवों में तुर्रा और कलगी के अखाड़े ढफ बजाकर अपने खयालों के माध्यम से विक्रमादित्य को लगी साढ़े साती शनि दशा को गा कर सुना रहे थे, सुनकर हम निःस्तब्ध थे। 2100 वर्ष बाद शनि की साढ़े साती से संत्रस्त राजपुरूष विक्रमादित्य की लोककथा आधारित गीत विक्रमादित्य  काल की ऐतिहासिकता को उद्घाटित कर रहे थे, इसी से उस दिव्य पुरूष की चतुर्दिक दिव्यता के प्रसरण का सहजता से अनुमान लगाना हमारे लिए  सुगम हो गया था। पं. रामचन्द्र शुक्ल ने वर्षों पूर्व इस तथ्य पर ध्यान दिलाया था “भारतीय जनता के सामान्य स्वरूप को पहचानने के लिए पुराने परिचित ग्रामगीतों की ओर दृष्टिपात करना आवश्यक है”। लोक का सुदीर्ध मौखिक साहित्य ही वस्तुतः लिखित समृद्ध साहित्य की परंपरा का जनक है। सत्यतः लोक जीए हुए जीवन पर निर्भर है , भारतीय मन की आत्मीयता की अक्षय निधि कहलाने वाली ऐसे ही मालवी की लोक कथा हम तक पहुंची जिसकी कथावस्तु राजा विक्रमादित्य को  शनि की साढ़े साती लगने से सम्बद्ध थी।सदियों से   राजा विक्रमादित्य यशोगान से पगी गाथाएँ लोक कंठों पर थिरकती हुई कंठानुकंठ पंजाब, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, सौराष्ट्र (गुजरात), महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में पीढ़ी दर पीढ़ी विचरती रही हैं। यहीं नहीं शनि के प्रकोप से प्रभावित लोक नायक विक्रमादित्य जैसे शक्तिमान व देवप्रिय प्रजापालक की दुर्दशा से जुड़ी लोक कथाएं भी लोकधारणा के धारक विक्रमादित्य को पूजनीय बनाती रही हैं। हमें उत्कंठा हुई कि क्या वास्तव में राजा विक्रमादित्य शनि का कोप भाजन बने थे? हमने सुप्रिसिद्ध मालवी लोकवेत्ता डाॅ. पूरन सहगल से विक्रमादित्य पर शनि के प्रभाव सम्बन्धी लोक में व्यापित किवदंतियों के सन्दर्भ में चर्चा की। मालवी लोकगाथाओं और मुल्तानी लंहदी पंजाबी में विक्रमादित्य के  इतिहासोन्मुखी दुर्लभ लोक साहित्य को संकलित करने वाले डॉ. सहगल ने बताया कि उन्होंने आंचलिक कथाओं से विक्रमादित्य को शनि दशा लगने वाले प्रसंग संग्रहित किये हैं। बड़े-बूढ़े रस लेकर इन कहानियों को सुनते-सुनाते आये हैं।मालवा मेंतो   बच्चों को सुनाई जाने वाली कथाओं के केंद्र में शनि दशा और विक्रमादित्य रहे ही रहे हैं। उनके उज्जैन से निकलकर उज्जैन तक पहुँचने के क्रम में आने वाले घटनाक्रमों को पूरन जी के  अनुसार लोक ने विविध दृष्टिकोणों से देखा है।

लोक की भव्यता जितनी दृश्य है उतनी अदृश्य भी है, जितनी लौकिक  है उतनी अलौकिक भी। बकौल डॉ. सहगल लोकसाहित्य के पैर नहीं होते पंख होते हैं। सात समुन्दर पार यात्रा करके लौटने वाले लोक साहित्य में  बहुत कुछ जुड़ा मिलता है और बहुत कुछ उससे छूट भी जाता है। लोक साहित्य की आखन देखी पर भरोसा कर गहन अध्ययन और शोध परक अनुमनना के उपरांत लोक से निस्सृत विक्रमादित्य और शनि की साढ़े साती गाथा के सूत्र हमने भोपाल से 65 कि.मी. दूर सीहोर जिले के नसरुल्लागंज विकास खण्ड में  स्थित रमपूरा चकल्दी गाँव में अंततः खोज ही लिए। भोपाल से निकटता के कारण समय न गँवाते हुए हमने चकल्दी प्रस्थान का कार्यक्रम बनाया।

चकल्दी से भोपाल के मध्य मार्ग पर प्रकृति मनोहर चित्रावलियाँ, दरोई माता के ध्वंसावशेष, भीली संस्कृति, बेतवा और कलियासोत नदियाँ

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Comments

  1. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी सादर चरणस्पर्श, दीदी आपने महाराजा विक्रमादित्य से जुड़ी प्राचीन चम्पावती नगरी और आधुनिक चकल्दी शहर को इतिहास के पन्नो से लाकर एक बार फिर पुनर्जीवित कर दिया। आपके इस प्रयास के लिए मेरे पास आपकी तारीफ के लिए शब्द नही है आदरणीय दीदी। मैं हमेशा आपके लेख की प्रतीक्षा करता हूँ।

  2. राजेन्द्र कौशिके says:

    बहुत सुंदर लेख

  3. वीरेंद्र सिंह says:

    महाराजा विक्र्मादित्य और उनसे जुड़ी अनेकों महत्वपूर्ण बातें, स्थान व कार्य जो हमे लगता है कि किसी इतिहास में उल्लेख किया गया मुझे नहीं लगता क्योकि आज के इतिहास में वो ही पढाया जाता है जो सिर्फ नयी पीढ़ी के इतिहासकारों जो ये मानते हैं कि वही जो चार विदेशी व देशी इतिहास कार बिना शोध के सीमित संसाधनों के द्वारा बता देते हैं आज मैंने राजा विक्रमादित्य के बारे में वो तथ्य देखे और सुने जो आधुनिक इतिहास जान कर अनजान था राजा विक्रमादित्य के बारे में उन पर साढ़े साती का प्रकोप का होना और जुडी अनेक मान्यतायें व स्थान के बारे में बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी शोध के साथ आपने ने बतायी जिससे सबसे पहले तो यह स्थान जो पहले कभी राजा विक्रमादित्य ने जिसको बसाया था व जिसका नाम चंपावती था वह कैसे इतिहास के गर्त में भूला दिया गया और जिसको सिर्फ आज एक छोटा सा गांव चकल्दी कैसे रह गया जिसे आज कोई इतिहास में उसका वर्णन तक नहीं मिलता जबकि इसके चारों तरफ उनसे जुड़ी अनेकों सबूत भरे पड़े हुये हैं चकल्दी ( चम्पावती) जो कभी कितनी सुन्दर और सम्पन्न रहा होगा ये वहा पर बिखरे पड़े हुये प्राचीन भवनों और मन्दिरों के अवशेष व भग्नावशेषों से सहज रूप से अनुमान लगाया जा सकता है परन्तु आज के इतिहासकार व पुरातत्व वेत्ता अपने को कहने वाले लगता है सिर्फ कालेज या विश्व्विद्यालयो के प्राग्ड़ में बैठकर शोध कर लेते हैं यहाँ पर जिस तरह से हमारी प्राचीन व सांस्कृतिक धरोहर हिन्दू व जैन की बिखरी पड़ी है ये सहज ही इसका बखान करते हैं ।आपका यह लेख भारतीय सनातन संस्कृति व इतिहास को समझने में आने वाली पीढ़ियों के लिए मील का पत्थर साबित होगा तथा इसके अलावा जो समाज में लोक मान्यतायें व लोकोक्तीया भी अपने अन्दर इतिहास समेटे हुए है इसे नये इतिहासकारों को स्वीकार करना चाहिए ।जिसका आधुनिक अपने को मानने वाले अनदेखा करते हैं और सिर्फ इतिहास के किताबों में लिखी लाईनो को ही इतिहास मानते हैं ।