लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती (चकल्दी) में शांत

क्या छोटा क्या बड़ा, क्या बुजुर्ग क्या महिला, सभी को झकझोरो तो चम्पावती नगरी और कौशल्या का नीर झरने लगता था

बढ़ई बाकल से आगे बढ़ने पर राम जानकी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री लखनलाल सोनी मिल गए जो हमें पीपल के पेड़ के सामने स्थित अपने निवास पर लेकर गए, जहाँ पहले से ही ढेर सारी आदिवासी औरतें रकम खरीदने के लिए बैठी हुई थीं। एरन, हथौड़ा, कैंची, चुग्गा, अमूर, संसी, मूस, जंतरी, पावठा लक्कड़ का, बंकनाल, और रकम के ठप्पे वाला सराजाम जुटाए बैठे सोनी समाज के प्रतिनिधि श्री लखनलाल सोनी जी को गांव की ऐतिहासिकता और पौराणिकता से विशेष लगाव है। जागरूक श्री सोनी जी हमारे साथ उन सभी स्थानों पर अवलोकनार्थ गए जहाँ परमारकालीन प्रतिमाएं या तो स्थापित थीं अथवा क्षत-विक्षत रखी हुई थीं। सोनी जी ने हमें बताया कि गाँव के आस-पास और अंदर भी मूर्तियों का अम्बार है जिसे सहेजे जाने की ज़रुरत है।

चकल्दी गाँव का परिदृश्य,  परमारक़ालीन प्रतिमाएँ स्थानीय मंदिर के परिसर में सुरक्षित,आदिवासी के अहाते में सहेजी गई मूर्तियाँ, संकरी गलियों में दबी ढकी अनेक प्रतिमाएँ और घाने

राजपूत, कहार, कलाल मोहल्लों के अतिरिक्त ब्राह्मण मोहल्ले भी अतीत के अवशेषों से पटे हुए हैं। यहीं हमने निर्माणाधीन घर की नीवों से निकल रही पुरा संपदा का निरीक्षण भी किया। ब्राह्मणों की बस्ती में हम एक प्राचीन गढ़ीनुमा घर के भीतर विक्रमादित्य सम्बन्धी पुरानी गुफा के दर्शन का मन्तव्य लिये प्रविष्ट हुए जहां चढ़ाव के पास ग्रामीणों ने एक गुफा होने का दावा किया था लेकिन वहां दुर्भाग्यवश अर्वाचीन निर्माण कार्य के कारण पुरानी स्मृतियां विनष्ट हो चुकी थीं।

लोककथाएँ  मात्र लोकानुरंजन का माध्यम नहीं होतीं इसमें लोक की समग्रता समाहित होती है। लोक विश्वास गहन नैराश्य में भी आशाएं जगाता है और हमें अपने अतीत को समझने का अवसर भी प्रदान करता है। जितने मुँह, उतनी बातें लोकोक्ति तो हमने सुन रखी थी पर जितने मुँह, एक सी बातें हमें चकल्दी में ही सुनने को मिली। क्या छोटा क्या बड़ा, क्या बुजुर्ग क्या महिला, सभी को झकझोरो तो चम्पावती नगरी और कौशल्या का नीर झरने लगता था। हम एक समझदार पढ़े-लिखे गांव की योग्य युवा प्रतिभा से भी मिले जिन्होनें ददिहाल और ननिहाल में सुनी सुनाई कहानियों को हमसें साझा किया।

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Comments

  1. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी सादर चरणस्पर्श, दीदी आपने महाराजा विक्रमादित्य से जुड़ी प्राचीन चम्पावती नगरी और आधुनिक चकल्दी शहर को इतिहास के पन्नो से लाकर एक बार फिर पुनर्जीवित कर दिया। आपके इस प्रयास के लिए मेरे पास आपकी तारीफ के लिए शब्द नही है आदरणीय दीदी। मैं हमेशा आपके लेख की प्रतीक्षा करता हूँ।

  2. राजेन्द्र कौशिके says:

    बहुत सुंदर लेख

  3. वीरेंद्र सिंह says:

    महाराजा विक्र्मादित्य और उनसे जुड़ी अनेकों महत्वपूर्ण बातें, स्थान व कार्य जो हमे लगता है कि किसी इतिहास में उल्लेख किया गया मुझे नहीं लगता क्योकि आज के इतिहास में वो ही पढाया जाता है जो सिर्फ नयी पीढ़ी के इतिहासकारों जो ये मानते हैं कि वही जो चार विदेशी व देशी इतिहास कार बिना शोध के सीमित संसाधनों के द्वारा बता देते हैं आज मैंने राजा विक्रमादित्य के बारे में वो तथ्य देखे और सुने जो आधुनिक इतिहास जान कर अनजान था राजा विक्रमादित्य के बारे में उन पर साढ़े साती का प्रकोप का होना और जुडी अनेक मान्यतायें व स्थान के बारे में बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी शोध के साथ आपने ने बतायी जिससे सबसे पहले तो यह स्थान जो पहले कभी राजा विक्रमादित्य ने जिसको बसाया था व जिसका नाम चंपावती था वह कैसे इतिहास के गर्त में भूला दिया गया और जिसको सिर्फ आज एक छोटा सा गांव चकल्दी कैसे रह गया जिसे आज कोई इतिहास में उसका वर्णन तक नहीं मिलता जबकि इसके चारों तरफ उनसे जुड़ी अनेकों सबूत भरे पड़े हुये हैं चकल्दी ( चम्पावती) जो कभी कितनी सुन्दर और सम्पन्न रहा होगा ये वहा पर बिखरे पड़े हुये प्राचीन भवनों और मन्दिरों के अवशेष व भग्नावशेषों से सहज रूप से अनुमान लगाया जा सकता है परन्तु आज के इतिहासकार व पुरातत्व वेत्ता अपने को कहने वाले लगता है सिर्फ कालेज या विश्व्विद्यालयो के प्राग्ड़ में बैठकर शोध कर लेते हैं यहाँ पर जिस तरह से हमारी प्राचीन व सांस्कृतिक धरोहर हिन्दू व जैन की बिखरी पड़ी है ये सहज ही इसका बखान करते हैं ।आपका यह लेख भारतीय सनातन संस्कृति व इतिहास को समझने में आने वाली पीढ़ियों के लिए मील का पत्थर साबित होगा तथा इसके अलावा जो समाज में लोक मान्यतायें व लोकोक्तीया भी अपने अन्दर इतिहास समेटे हुए है इसे नये इतिहासकारों को स्वीकार करना चाहिए ।जिसका आधुनिक अपने को मानने वाले अनदेखा करते हैं और सिर्फ इतिहास के किताबों में लिखी लाईनो को ही इतिहास मानते हैं ।