लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती (चकल्दी) में शांत

रेहटी के वनाच्छादित वनारक्षित लोहापठार में घोड़सुन बाबा के प्रति गोंड लोगों की अपार आस्था

चकल्दी में कोने-कांतर में चंपावती नगरी की लोक में विद्यमानता के अनुभावी बनने  के उपरांत हमारे मन में वनमय क्षेत्र में घोड़ासुन बाबा के दर्शन की अभिलाषा जागी।चकल्दी वालों को राम राम कह हम पुनः कोल्टर की सड़क पर आ गए , आगे चकल्दी से लोहापठार  मार्ग  में वनों से विस्तारण के बीच हम आदिम संस्कृति के बिम्बों को समेटते रहे। गौधूलि बेला में गाय घर लौट रहीं थीं। सूरज की लालिमा में पंछी भी घर लौटने लगे थे। गाँव के हवा-वृक्ष, लता-पत्ते, पशु-पक्षी सभी में  अभ्यस्त जीवन सी हलचल थी। हम 15 किलोमीटर दूर भोपाल चकल्दी मार्ग पर लोहा-पठार की ओर बढ़ रहे थे। चकल्दी से सटे रेहटी वन आरक्षित क्षेत्र के लोहापठार के घने दुर्गम जंगल में घोड़ासुन बाबा का वास है हमे बताया गया था कि वनस्थ गोंड जाति के अतिरिक्त यहां किसी अन्य की प्रविष्टि असंभव है लेकिन चंपावती नगरी के अन्वेषण से उत्साहित हमारी दृष्टि ऐसे अंचल को टटोलने में किंचित भयभीत नहीं थी जहाँ विक्रमदित्य के घोड़े ने प्राण उत्त्सर्ग किये थे। हमने प्रण कर रखा था कि हम वहां अवश्य जायँगे। हमें  बताया गया था कि  धुर्वे, उइके, बारिबे, पल्लाम, कड़ोड़िया, सरेआम, गोत्रधारी गोण्ड समाज घोड़ासुन बाबा को आराध्य के रूप में मानता है। अब हम रेहटी के आरक्षित वन प्रक्षेत्र  (1150 वर्ग किमी. विस्तारित) में आने वाले लोहा पठार के घने जंगल जो  निष्पर्यन्त हैं में प्रविष्ट हो चुके थे। रातापानी अभ्यारण के अधीक्षक श्री प्रदीप त्रिपाठी जी ने हमें सावधान किया था कि ओबेदुल्लागंज वन प्रक्षेत्र के रातापानी (823 वर्ग किमी. विस्तारित) अभ्यारण्य के वनारक्षित क्षेत्र से अपेक्षाकृत कहीं अधिक लोहापठार  जंगल प्रकंपित करने वाला है। पर मन स्थिर नहीं होना चाहता था इसलिए अनचीन्हे रास्तों पर यात्रा करने को उतावला था।

गोंड आदिवासियों द्वारा घोड़ासुन बाबा से वन्य जीवों से सुरक्षा की आश्वस्ति, लोहापठार का दुर्गम घना जंगल और वनराज का पगचिह्न

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Comments

  1. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी सादर चरणस्पर्श, दीदी आपने महाराजा विक्रमादित्य से जुड़ी प्राचीन चम्पावती नगरी और आधुनिक चकल्दी शहर को इतिहास के पन्नो से लाकर एक बार फिर पुनर्जीवित कर दिया। आपके इस प्रयास के लिए मेरे पास आपकी तारीफ के लिए शब्द नही है आदरणीय दीदी। मैं हमेशा आपके लेख की प्रतीक्षा करता हूँ।

  2. राजेन्द्र कौशिके says:

    बहुत सुंदर लेख

  3. वीरेंद्र सिंह says:

    महाराजा विक्र्मादित्य और उनसे जुड़ी अनेकों महत्वपूर्ण बातें, स्थान व कार्य जो हमे लगता है कि किसी इतिहास में उल्लेख किया गया मुझे नहीं लगता क्योकि आज के इतिहास में वो ही पढाया जाता है जो सिर्फ नयी पीढ़ी के इतिहासकारों जो ये मानते हैं कि वही जो चार विदेशी व देशी इतिहास कार बिना शोध के सीमित संसाधनों के द्वारा बता देते हैं आज मैंने राजा विक्रमादित्य के बारे में वो तथ्य देखे और सुने जो आधुनिक इतिहास जान कर अनजान था राजा विक्रमादित्य के बारे में उन पर साढ़े साती का प्रकोप का होना और जुडी अनेक मान्यतायें व स्थान के बारे में बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी शोध के साथ आपने ने बतायी जिससे सबसे पहले तो यह स्थान जो पहले कभी राजा विक्रमादित्य ने जिसको बसाया था व जिसका नाम चंपावती था वह कैसे इतिहास के गर्त में भूला दिया गया और जिसको सिर्फ आज एक छोटा सा गांव चकल्दी कैसे रह गया जिसे आज कोई इतिहास में उसका वर्णन तक नहीं मिलता जबकि इसके चारों तरफ उनसे जुड़ी अनेकों सबूत भरे पड़े हुये हैं चकल्दी ( चम्पावती) जो कभी कितनी सुन्दर और सम्पन्न रहा होगा ये वहा पर बिखरे पड़े हुये प्राचीन भवनों और मन्दिरों के अवशेष व भग्नावशेषों से सहज रूप से अनुमान लगाया जा सकता है परन्तु आज के इतिहासकार व पुरातत्व वेत्ता अपने को कहने वाले लगता है सिर्फ कालेज या विश्व्विद्यालयो के प्राग्ड़ में बैठकर शोध कर लेते हैं यहाँ पर जिस तरह से हमारी प्राचीन व सांस्कृतिक धरोहर हिन्दू व जैन की बिखरी पड़ी है ये सहज ही इसका बखान करते हैं ।आपका यह लेख भारतीय सनातन संस्कृति व इतिहास को समझने में आने वाली पीढ़ियों के लिए मील का पत्थर साबित होगा तथा इसके अलावा जो समाज में लोक मान्यतायें व लोकोक्तीया भी अपने अन्दर इतिहास समेटे हुए है इसे नये इतिहासकारों को स्वीकार करना चाहिए ।जिसका आधुनिक अपने को मानने वाले अनदेखा करते हैं और सिर्फ इतिहास के किताबों में लिखी लाईनो को ही इतिहास मानते हैं ।