लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती (चकल्दी) में शांत

लोहापठार के वनाच्छादित क्षेत्र में साजा, बहेड़ा, हल्दु, पलाश, अचार, चिरोल, बीजा और कुल्लु के हट्टे  कट्टे पेड़ों के समूहन के बीच से सरसर कर आती हवा की अनुगूंज

हम कक्ष क्र. ४९६ जंगल में खड़े थे जहां सन् २००१३-१४ में २७५००० सागौन के वृक्ष लगाये गये थे। यह लिखी हुई तख़्ती दूर से पढ़ी जा सकती थी। नीलकंठ, सतघाई, रॉबिन, सफेद बाज, चिंकारा, भालू, नीलगाय, तेंदुआ, काला हिरन जैसे वनचरों की बहुलता वाले जंगल में कई विषैले सरिसर्पों का बसेरा था। नितांत जंगल जिसकी शिराओं से झर रहा था सूनापन, जंगल जिसके पास अपना कोई इतिहास नहीं होता होता भीहै  इतिहास पर कहीं दर्ज नहीं होता, लोहापठार के वनाच्छादित क्षेत्र में साजा, बहेड़ा, हल्दु, पलाश, अचार, चिरोल, बीजा और कुल्लु के हट्टे  कट्टे पेड़ों के समूहन के बीच से सरसर कर आती हवा अनुगूंज कर रही थी।नारियल  चढ़ाकर वनगोचर जाति जिस घोड़सुन बाबा से जंगल में प्रतिदिन वनराज से अपनी रक्षा का आश्वासन लेती है।हम उन्हीं की शरण में जा रहे थे  जिज्ञासावश हमने सघन वन संपदा में प्रवेश किया वनजीवियों और वनपालों के लिए नियत अत्यन्त दुरूह मार्ग से हम वन में प्रविष्ट हुए, मार्ग इतना दुष्कर था कि गाड़ी से उतरकर पैदल ही चलना पड़ा। अभी ब्लेड मारकर वनमार्ग को तैयार किया नहीं जा सका था इसलिए पैंया-पैंया चलना श्रेयस्कर था। रवंजन, हुदहुद, शिकरा की चुहुक ठठेरा की ठकठक से गुंजायमान सघन वन संपदा परिमुग्ध कर रही थी लेकिन वजराज का पंजक (पदचिन्ह) भयभीत किये दे रहा था।

अजय सिंह उइके मवेशी चराने के लिए लोहापठार के घने जंगल की ओर ही जा रहे थे। हमने उनसे लोहापठार के घोड़ासुन बाबा की विश्रुत कथा की जानकारी चाही तो उन्होंने हमें बताया कि उज्जैन के राजा का घोड़ा यहीं लोहापठार अरण्यमामी प्रक्षेत्र में चोटिल हुआ था। घोड़े के खुर के आघात से निर्मित टाप सृदश आकृति को आदिवासी समाज पूजता है। कंवर सिंह उइके, विजय सिंह उइके ने भी अजय सिंह के स्वर में हाँ में हाँ मिलाया। लोहापठार गाँव के कोने में किशोरीलाल की किराने की दुकान थी। जहाँ से वे कुप्पी में पेट्रोल भी बेच रहे थे जो इस बात का संकेत था कि इस क्षेत्र में दूर-दूर तक पेट्रोल पंप नहीं हैं।हमने उनसे भी पूछ के देख लिया कि घोड़ासुन बाबा को वे पूजते हैं कि नहीं पूजते? तो 90 वर्षीय किशोरीलाल ने सहजता से हामी भर दी।

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Comments

  1. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी सादर चरणस्पर्श, दीदी आपने महाराजा विक्रमादित्य से जुड़ी प्राचीन चम्पावती नगरी और आधुनिक चकल्दी शहर को इतिहास के पन्नो से लाकर एक बार फिर पुनर्जीवित कर दिया। आपके इस प्रयास के लिए मेरे पास आपकी तारीफ के लिए शब्द नही है आदरणीय दीदी। मैं हमेशा आपके लेख की प्रतीक्षा करता हूँ।

  2. राजेन्द्र कौशिके says:

    बहुत सुंदर लेख