लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती (चकल्दी) में शांत

पेड़ के नीचे घोड़े के खुर शिलोत्कीर्ण, कालिमा लिये चिन्हांकन समय के साथ-साथ धुंधला गये,  पेड़ पर लटकी लगामें मनौती पूरी होने पर श्रद्धालुाओं द्वारा अर्पित की गयीं 

हम लोहापठार के जंगल में अंदर तक धँस चुके थे। तितलियाँ नाक पर बैठ रही थीं, सांय-सांय सूं ऽऽ सूं ऽऽ करती सन्नाटों को चीरती हवा पल-प्रतिपल आगाह कर रही थी। हम आगे बढ़ रहे थे 20-25 कदम चलने पर जिसका अंदेशा था वही हुआ। हमें वनराज के पदचिन्हऔर अधिक गदराए हुए से  दिखने लगे। सोचा लौट जायें लेकिन भयप्रद मन कौतूहल लिये वहीं डटा रहा। जैसे-तैसे आगे बढ़े और लम्बे-लम्बे डग भरते हुए विक्रमादित्य के घोड़े के स्थान पर पहुंच ही गये। सामने अनगिनत पत्थरों की व्यवस्थित ढेरी से टेकरी सी बनी हुई थी। जो मनोकामनाएं फलीभूत होने पर गोण्ड आदिवासियों द्वारा घोड़ासुन बाबा को कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए चढ़ाई गयी आदरांजलियां थीं।

हम देख पा रहे थे पेड़ पर कई घोड़े की लगामें टंगी थीं जो समय समय पर धर्म -कर्म से जुड़े श्रद्धान्वितों द्वारा घोड़ासुन बाबा के समक्ष समर्पण भाव से रखी गयी थीं। राजस्थान के लुहारों की घुमन्तु जाति गाडुरिया लुहारों की चलायमान घर गिरस्ती हमें लोहापठार गांव में प्रविष्टि के समय दिखी थीं। ये लगामें संभवतःउन्हीं  से  बनवायी गयी थीं। आदिवासी लोग मनिहारी की दूकानों से जहां से ढोनी, पागा कंठी, मोरा-मोरी आदि खरीदते हैं उनसे भी लगाम  बनवा लेते हैं। यही वह घोड़ासुन बाबा हैं जिन्हें लोक का विश्वास अर्जित है। हम पेड़ के नीचे घोड़े के खुरों को शिलोत्कीर्ण देख रहे थे कालिमा लिये ये चिन्हांकन समय के साथ-साथ धुंधला गये थे। पेड़ पर लटकी लगामें मनौती पूरी होने परआस-पास के गाँवों के श्रद्धालुाओं द्वारा अर्पित की गयी थीं। हरदा, इंदौर, खातेगाँव, कन्नौज, रेहटी, होशंगाबाद से आने वाले आस्थावान यहाँ शनि का उतारा करने आते हैं। घोड़े के सामने शीश नवाकर हम सरासर बाहर निकल आये मार्ग में एक गोण्ड आदिवासी परिवार  से मिलकर अपनी जिज्ञासाएं शांत कीं तब जाकर संतुष्टि मिली। लोहा पठार के वनप्रांत से लौटने पर कोने में फूल सिंह, फुगला और सूबा बाई का घर था, उन्हीं से घोडा सुन बाबा की कथा सुनने का अवसर मिला। वन विभाग में सेवाएं देने वाले फूल सिंह ने बताया कि जंगल में घातक वन्य जीवों से रक्षा हेतु गोंड आदिवासी  घोडा सुन बाबा को पुकारते हैं। ये लोग अमावस्या और पूर्णिमा के दिन बाबा के सामने फल और नारियल भेंट करते हैं।

अभी तक आंगन-ओसारे में यहां वहां उमग रही धूप दबे पांव सिमटने लगी थी। संझा के आते साथ सूरज सितार की तनतनाहट देह पर राग दीपक गत बजा रहा हो ऐसा प्रतीत हो रहा था। हम वनों के बीच से घाट उतरते चढ़ते भोपाल की ओर लौट रहे थे।मद्दे प्रकाश वाले   गोबर से लिपे पुते घरों से रामसत्ता के गीत मानो छन-छन कर हमारे कानों तक आ रहे थे।  दूर क्षितिज तक फैले जंगलों में घोड़े की टापें सुनाई दे रही थीं।

चकल्दी से भोपाल तक के रास्ते में अभिभूत करता निःसर्ग का सौंदर्य

मछली पकड़ने वाले ठेकेदारों की नावें, कौशल्या के निर्मल नीर में तिर रहीं थीं। भारतीय परम्पराओं की संवाहिका बेतवा में शाम का सूरज स्वयं को समर्पित कर रहा था। कलियासोत नदी आते आते हम इस निष्कर्ष तक पहुँच चुके थे कि ऐसा कोई देश नहीं, ग्राम नहीं, लोक नहीं, सभा नहीं, रात नहीं, दिन नहीं, जब और जहाँ विक्रमादित्य की प्रशंसा में गीत न गाये जा रहें हों। इक्कीस सौ साल बाद विक्रमादित्य से जुड़े कथानक और लोक गीत हम तक और हमसे आप तक पहुंच रहे हैं किसी अन्य लोकनायक का ऐसा गुणगान आप ने सुना है? नहीं सुना होगा न !!! जो हमने आज सुना!

न स देशों न स ग्रामो न सा सभा / न तन्नक्तं दिवं यत्र विक्रमार्को न गीयते

 

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Comments

  1. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी सादर चरणस्पर्श, दीदी आपने महाराजा विक्रमादित्य से जुड़ी प्राचीन चम्पावती नगरी और आधुनिक चकल्दी शहर को इतिहास के पन्नो से लाकर एक बार फिर पुनर्जीवित कर दिया। आपके इस प्रयास के लिए मेरे पास आपकी तारीफ के लिए शब्द नही है आदरणीय दीदी। मैं हमेशा आपके लेख की प्रतीक्षा करता हूँ।

  2. राजेन्द्र कौशिके says:

    बहुत सुंदर लेख

  3. वीरेंद्र सिंह says:

    महाराजा विक्र्मादित्य और उनसे जुड़ी अनेकों महत्वपूर्ण बातें, स्थान व कार्य जो हमे लगता है कि किसी इतिहास में उल्लेख किया गया मुझे नहीं लगता क्योकि आज के इतिहास में वो ही पढाया जाता है जो सिर्फ नयी पीढ़ी के इतिहासकारों जो ये मानते हैं कि वही जो चार विदेशी व देशी इतिहास कार बिना शोध के सीमित संसाधनों के द्वारा बता देते हैं आज मैंने राजा विक्रमादित्य के बारे में वो तथ्य देखे और सुने जो आधुनिक इतिहास जान कर अनजान था राजा विक्रमादित्य के बारे में उन पर साढ़े साती का प्रकोप का होना और जुडी अनेक मान्यतायें व स्थान के बारे में बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी शोध के साथ आपने ने बतायी जिससे सबसे पहले तो यह स्थान जो पहले कभी राजा विक्रमादित्य ने जिसको बसाया था व जिसका नाम चंपावती था वह कैसे इतिहास के गर्त में भूला दिया गया और जिसको सिर्फ आज एक छोटा सा गांव चकल्दी कैसे रह गया जिसे आज कोई इतिहास में उसका वर्णन तक नहीं मिलता जबकि इसके चारों तरफ उनसे जुड़ी अनेकों सबूत भरे पड़े हुये हैं चकल्दी ( चम्पावती) जो कभी कितनी सुन्दर और सम्पन्न रहा होगा ये वहा पर बिखरे पड़े हुये प्राचीन भवनों और मन्दिरों के अवशेष व भग्नावशेषों से सहज रूप से अनुमान लगाया जा सकता है परन्तु आज के इतिहासकार व पुरातत्व वेत्ता अपने को कहने वाले लगता है सिर्फ कालेज या विश्व्विद्यालयो के प्राग्ड़ में बैठकर शोध कर लेते हैं यहाँ पर जिस तरह से हमारी प्राचीन व सांस्कृतिक धरोहर हिन्दू व जैन की बिखरी पड़ी है ये सहज ही इसका बखान करते हैं ।आपका यह लेख भारतीय सनातन संस्कृति व इतिहास को समझने में आने वाली पीढ़ियों के लिए मील का पत्थर साबित होगा तथा इसके अलावा जो समाज में लोक मान्यतायें व लोकोक्तीया भी अपने अन्दर इतिहास समेटे हुए है इसे नये इतिहासकारों को स्वीकार करना चाहिए ।जिसका आधुनिक अपने को मानने वाले अनदेखा करते हैं और सिर्फ इतिहास के किताबों में लिखी लाईनो को ही इतिहास मानते हैं ।