लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती (चकल्दी) में शांत

प्रकृति की सुषमा में आदिवासी संस्कृति के बिम्ब,बेतवा नदी का उद्गम स्थल-झिरीबहेड़ा

लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती में शांत

बेतवा उद्गम स्थल पर हनुमान जी का मंदिर, बेतवा नदी का उद्गम बिन्दु, नई नवेली सड़क पर प्रकृति जन्य वनस्पतियाँ, वन्यजीवों से भरा आरक्षित वन प्रक्षेत्र, कोलार बाँध

और अल्सुबह ही जब सूरज की किरणें गांव वालों को असीसने लगी थीं लगभग उसी समय हम चकल्दी मार्ग पर ओबेदुल्लागंज वनमण्डल के आरक्षित वन प्रक्षेत्र की मालीबायां वीरपुर टू लेन सड़क पर झाझड़, कऊ, धावड़ा, शीशम, सागौन, टेमरू, अचार, नीम, पीपल, बड़, गूलर, खैर, कारी, पलाश, गादिया, अंजन, बबूल, बेर, चिरोल से आवृत्त अरण्य तंत्र को समझने की चेष्टा में लगे हुए थे। दो फुंदने बांधे दिन के कांधे पर बैठकर हाट जा रही प्रफुल्लित लड़की सा सूरज सघन वन संपदा से बीच-बीच में झांककर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता जा रहा था। भोपाल के नयापुरा से चकल्दी तक 150 आदिवासी गाँवों में प्रकृति की रम्यता में तन्मय पर्यटक आंखों में भरभर प्राकृतिक दृश्यावलियां लिए आनंदित हुए जा रहे थे। पहले कलियासोत नदी निकली फिर बेतवा की बारी आई कुछ और आगे बढ़ने पर भील आदिवासियों की भीली संस्कृति से दिग्दर्शक बने हम झिरी बहेड़ा में पौराणिक महत्व की बेतवा अथवा बेत्रवती के उद्ग्मित स्थल पर निर्मित मंदिर में प्रविष्ट हुए थे। 85 वर्षीय श्री मनसा राम गुर्जर इस क्षेत्र के संरक्षक व अर्चक हैं। साजेड, इमली, महुआ, कवा आदि वृक्षावलियों के बीच बने उद्गम कुंड का जलाचमन करते हुए वे हमें बताने लगे यह बेतवा नदी का चरणतीर्थ है। आल्हा उदल द्वारा स्तवित इस नदी के जल कुण्ड से कुछ दूरी पर दरोई माता मंदिर के भग्नावशेष स्थित हैं।

छायादार, फलदार अनगिन वृक्षों वाली शस्य  सम्पदा, उनके पीछे पर्वतमालाएँ छोड़ आगे बढ़ने पर वीरपुर की सीमा में प्रवेश के साथ ही कोलार नदी की व्यापकता का विलोकन हमें उत्फुलित करने लगा था। 5080 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में विस्तारित जलाशय 45 मीटर गहराई लिए विंध्याचल पर्वत श्रृंगों की परिधि में सुकुमार सुनहली किरणों से दीपित विस्मृत कर रहा था। आधा कि.मी. लम्बे कोलार बांध को पार कर हम डेम के सुपरवाइजर श्री भगवान सिंह राजपूत से मिले और उनसे  क्षेत्र के 59-60 गावों में जलप्रदात्री कोलार नदी और धसई नदी के युग्मित जलतंत्र को समझा। उन्होंने बताया कि नसरूल्लागंज, रेहटी और बुधनी तहसीलों के लगभग 70,000 हेक्टेयर क्षेत्र को सींचने वाली कोलार नदी 70 कि.मी. तक प्रवाहमान रहकर नसरूल्लागंज रहेटी के मध्य नीलकंठ चीलखण्ड में नर्मदा नदी में समागमित हो जाती है। उन्हीं से पता चला की डेरियानाला से निकलने वाली धसई नदी और बिरजिस नगर पीपलठोन (इछावर से 10 कि.मी. पश्चिम में) से उद्भूत कोलार नदी के जल प्रवाह को और अधिक प्राबल्य देने के निमित्त इछावर नसरूल्लागंज मार्ग के मध्य प्रवाहित सोन नदी का भी कोलार नदी से युगमीकरण का कार्य इन दिनों प्रगति पर है। आठ प्रमुख गेट (द्वार) और भोपाल में जल वितरण हेतु दो (सेल्यूस गेट) वाले इस बांध से आगे बढ़ने पर झोलियापुर का सहायक बांध (सब डेम) आया। कोलार नदी का  जल बांध से छोड़ने पर झोलियापुर बैराज में लाकर नहरों के माध्यम से सिंचाई हेतु गांव-गांव जल पहुंचाने की प्रक्रिया में हम निसर्ग का निनाद सुन पर रहे थे।

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Comments

  1. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी सादर चरणस्पर्श, दीदी आपने महाराजा विक्रमादित्य से जुड़ी प्राचीन चम्पावती नगरी और आधुनिक चकल्दी शहर को इतिहास के पन्नो से लाकर एक बार फिर पुनर्जीवित कर दिया। आपके इस प्रयास के लिए मेरे पास आपकी तारीफ के लिए शब्द नही है आदरणीय दीदी। मैं हमेशा आपके लेख की प्रतीक्षा करता हूँ।