लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती (चकल्दी) में शांत

मार्ग में हल-बक्खर वाली पारम्परिक खेती, अनेक नदी-नालों से जलवती उपजाऊ दुमट्ट काली मिट्टी की रौनकें    

वीरपुर में कोलार बांध की व्यापकता में कौशल्या नदी की पावनता के दर्शन, आदिवासी महिलाएँ हाट बाजार में सौदा करती हुई

झालपीपली, सारस झिरी, बहेड़ा, चिकलपानी, लाड़कुई निकलते ही रविवार को आदिवासी हाट में गहनों, हंसली, तागली, कंधोरा, बांकड़या, झुक्का, बाजड़ी, गजरा, घूंसी (पायल) बिछुड़ी-छल्ला, लोंग, बोर से लकदक गोण्ड आदिवासी स्त्रियां सौदा खरीदती दिखाई देने लगीं। आगे लोहापठार का वन खण्ड और वनस्थ भोले-भाले गोंड आदिवासियों की सहज स्वाभाविक जीवनचर्या का वैशिष्ट्य सामने था। मन अवगुंथन में रत था कि हम जिस पथ पर जा रहें है क्या इसी मार्ग से होकर उज्जैनी से राजा विक्रमादित्य चंपावती नगरी पहुचें होंगें क्या चंपावती नगरी ही वस्तुतः चकल्दी है? क्या इसी अरण्य क्षेत्र में विक्रमादित्य का शनि रुपी अश्व अंतर्ध्यान हो गया था?  पृथ्वी के श्रृंगार वन, पुरासिद्ध नदियाँ बेतवा  चम्बल में, कोलार अथवा कौशल्या नर्मदा में समागमित होने को आतुर अनेक नदी-नालों से जलवती उपजाऊ दुमट्ट काली मिट्टी पर लहलहाती गेहूँ, चना, तुअर दाल की पैदावार से संतुष्ट उल्लसित मन, कभी समतल कभी टेकरियाँ, खेत की कच्ची मेढें, मालवी नस्ल की गायों को हांकते चरवाहे, बबूल, तिनस और सागौन की लकड़ी से बनी बैलगाड़ियाँ, हल-बक्खर लिए बैलों की जोड़ी खींचते हाली, देवमातृक (वर्षा के जल से संपन्न कृषि)  इस क्षेत्र को समृद्ध बना रहीं थीं। मीलों तक विस्तारित कृषि भूमि पर इक्का-दुक्का गोबर लिपे घर बीच-बीच में दिख जाया करते थे। आदिवासियों ने अपने अथक परिश्रम से इस धरा को ऐसा उर्वर बना दिया था मानो राम ने अहल्या अर्थात न जोतने योग्य भूमि का सीता रुपी हल की नोक से उद्धार कर दिया हो। पारम्परिक खेती करने वाले ये लोग आज भी बुआई के समय कृषि देवी  जनक तनया सीता जी की पूजा करते हैं। कु लिया अंगारे पर  रखकर दूध उफनाने के बाद ही खेती की जमीं तैयार की जाती है। मन अगणित रास्तों से यात्रा करता हुआ अतीत के अध्यात्म से बार-बार खिंच रहा था। लोक विश्रुत कथाओं में हमने राजा विक्रमादित्य के शनि दशा के पश्चात् चकल्दी में समय व्यतीत करने की बतकही सुनी थी बस उसके अनुभावक बनने की मंशा लिए हम चकल्दी की ओर बढ़ रहे थे।

प्रकीर्तित विक्रमादित्य और प्रकुपित शनी देव की कथा के तत्व चकल्दी में बहुतायत से उपलब्ध 

वनगोचर आदिवासी की सहज स्वाभाविक जीवन शैली, पारम्परिक खेती करते कृषक, कोलार जल परियोजना का तंत्र, और ग्रामीण

मन ना जाने क्या क्या गुनने लगा था ,  शनि और विक्रमादित्य की कथाएँ मन को भटकाए जा रहीं थीं,  लोक धारणा है कि इन्द्र के परामर्श पर नौ ग्रह इन्द्र की  सभा में उपस्थित हुए और प्रश्न करने लगे कि कौन सर्वाधिक शक्तिमान है जहां अपेक्षित उत्तर न मिल पाने के कारण वे विक्रमादित्य की सभा में पहुँचे।न्यायप्रिय राजा विक्रमादित्य ने समग्र ग्रहों की शक्तिमत्ता को समान बता दिया। स्वयं को सर्वश्रेष्ठ घोषित करने वाले शनिदेव को विक्रमादित्य का यह निर्णय अनुचित लगा। उन्होंने कुपित होकर विक्रमादित्य को सबक सिखाने के लिए घोड़े का रूप धरकर उन्हें सवारी हेतु चुनौती दे डाली। विक्रमादित्य पर साढ़े साती सवार थी विक्रमादित्य ने घोड़े पर बलौद रखा और सवार हो गये। मायावी काला घोड़ा पलक झपकते ही अदृश्य हो गया। निर्जन नितान्त निरे वन में विक्रमादित्य को अकेला छोड़कर उसने अपने प्राणोत्सर्ग कर दिये। आगे उन्हें तेली मिलता है जिससे वे विनम्रता से जल पिलाने की विनती करते हैं  वह  उन्हें सादर चारपाई पर बिठाता है  शीशम के पेड़ के नीचे विक्रमादित्य घोड़ा बांधकर भीतर बैठते  हैं । इस कथा में घोड़ा विक्रमादित्य के साथ दिखाई देता है। तेली की पत्नी गुड़ की डली और लोटा भर पानी देती है।  तेली उन्हें बताता है कि इस अंचल में विक्रमादित्य की सत्ता है और उनके पुण्य प्रताप से प्रजा धन धान्य से परिपूर्ण है। विक्रमादित्य उच्चारण सुन राजा की स्मृतियां लौट आती हैं पर वे  परिचय देना व्यर्थ जानकर मौन धारण करे रहते  हैं। इधर वे शनि की कठिन परीक्षा में  स्वयं को सिद्ध करने में प्रत्यनशील रहते हैं। उधर महल में रानी मां हरिसिद्धि और महाकाल की साधना व शनिदेव के यज्ञ पूजन में लिप्त रहती हैं। तेली द्वारा विक्रमादित्य को मान सम्मान दिया जाता है। कथा आगे कहती है भीखम तेली के कहने पर वे  चम्पावती नगरी में रहकर घानी संभालने, बुहारने, बैलों की सेवा करने, घर की चाकरी करने का कार्य करते हैं, पर  कथा में पुनः एक मोड़ आता है। गांव के साहूकार और साहुकारिन के कपाट (अलमारी) में से उनकी दासी आभूषणों की पोटली चोरी कर लेती है। चोरी कर भागते समय उसका चोरी किया हुआ हार तेली के घर के सामने गिर जाता है, जहां विक्रमादित्य पहरेदारी कर रहे थे। आभूषण चोरी के आरोप में उन्हें वहां का  प्रजा पालक दोनों हाथ काटने का  दण्ड सुना  देता है। तेली पति-पत्नी हमारा देवाल्या चोर नहीं हैं कि गुहार लगाते रहते हैं पर उनकी कोई सुनवाई नहीं होती। वधिक वधस्थल पर खड़ग चलाने के लिए ज्यों ही प्रवृत्त होता है  चील आभूषणों से भरी पोटली आकाश मार्ग से नीचे गिरा देती है। साहूकारिन पहचान लेती है यह तो दासी सोवती की साड़ी की पोटली है। तभी उज्जैन से खोजते हुए बेताल और महामंत्री आ जाते हैं। भीखमतेली और उसकी पत्नी रोने लगते हैं। चहुंओर महाराजा विक्रमादित्य की जयजयकार होने लगती है।  विक्रमादित्य द्वारा तेली परिवार को दस हजार स्वर्ण मुद्राएं देकर, विशाल भव्य भवन बनवाने और कृषि हेतु भूमि देने की घोषणा की जाती है। यह कथा मालवा में विक्रम री साढ़े साती भोग के रूप् में मिलती है।

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Comments

  1. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी सादर चरणस्पर्श, दीदी आपने महाराजा विक्रमादित्य से जुड़ी प्राचीन चम्पावती नगरी और आधुनिक चकल्दी शहर को इतिहास के पन्नो से लाकर एक बार फिर पुनर्जीवित कर दिया। आपके इस प्रयास के लिए मेरे पास आपकी तारीफ के लिए शब्द नही है आदरणीय दीदी। मैं हमेशा आपके लेख की प्रतीक्षा करता हूँ।

  2. राजेन्द्र कौशिके says:

    बहुत सुंदर लेख

  3. वीरेंद्र सिंह says:

    महाराजा विक्र्मादित्य और उनसे जुड़ी अनेकों महत्वपूर्ण बातें, स्थान व कार्य जो हमे लगता है कि किसी इतिहास में उल्लेख किया गया मुझे नहीं लगता क्योकि आज के इतिहास में वो ही पढाया जाता है जो सिर्फ नयी पीढ़ी के इतिहासकारों जो ये मानते हैं कि वही जो चार विदेशी व देशी इतिहास कार बिना शोध के सीमित संसाधनों के द्वारा बता देते हैं आज मैंने राजा विक्रमादित्य के बारे में वो तथ्य देखे और सुने जो आधुनिक इतिहास जान कर अनजान था राजा विक्रमादित्य के बारे में उन पर साढ़े साती का प्रकोप का होना और जुडी अनेक मान्यतायें व स्थान के बारे में बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी शोध के साथ आपने ने बतायी जिससे सबसे पहले तो यह स्थान जो पहले कभी राजा विक्रमादित्य ने जिसको बसाया था व जिसका नाम चंपावती था वह कैसे इतिहास के गर्त में भूला दिया गया और जिसको सिर्फ आज एक छोटा सा गांव चकल्दी कैसे रह गया जिसे आज कोई इतिहास में उसका वर्णन तक नहीं मिलता जबकि इसके चारों तरफ उनसे जुड़ी अनेकों सबूत भरे पड़े हुये हैं चकल्दी ( चम्पावती) जो कभी कितनी सुन्दर और सम्पन्न रहा होगा ये वहा पर बिखरे पड़े हुये प्राचीन भवनों और मन्दिरों के अवशेष व भग्नावशेषों से सहज रूप से अनुमान लगाया जा सकता है परन्तु आज के इतिहासकार व पुरातत्व वेत्ता अपने को कहने वाले लगता है सिर्फ कालेज या विश्व्विद्यालयो के प्राग्ड़ में बैठकर शोध कर लेते हैं यहाँ पर जिस तरह से हमारी प्राचीन व सांस्कृतिक धरोहर हिन्दू व जैन की बिखरी पड़ी है ये सहज ही इसका बखान करते हैं ।आपका यह लेख भारतीय सनातन संस्कृति व इतिहास को समझने में आने वाली पीढ़ियों के लिए मील का पत्थर साबित होगा तथा इसके अलावा जो समाज में लोक मान्यतायें व लोकोक्तीया भी अपने अन्दर इतिहास समेटे हुए है इसे नये इतिहासकारों को स्वीकार करना चाहिए ।जिसका आधुनिक अपने को मानने वाले अनदेखा करते हैं और सिर्फ इतिहास के किताबों में लिखी लाईनो को ही इतिहास मानते हैं ।