लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती (चकल्दी) में शांत

कलियुग में त्रेता युग जैसे समाज की के परिकल्पनाकार लोकव्यापी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य पर शनिदेव की साढ़ेसाती को लेकर अनेक जनश्रुतियां

लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती में शांत

विक्रमादित्य पर शनिदेव की साढ़ेसाती को लेकर अनेक जनश्रुतियां मिलती रहीं  हैं। कलियुग में त्रेता युग जैसे समाज की के परिकल्पनाकार लोकव्यापी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के संबंध में लोक का यह विश्वास हमें अचंभित कर रहा था। हमने  पूरन जी से इस सन्दर्भ में बात की तो उन्होंने बताया कि विक्रमादित्य संबंधी बहुतेरी कथाएं अनेक प्रांतों में आंचलिकता लिए मिलती हैं यहां तक कि पाकिस्तान और तुर्की में भी प्राप्त होती है। लोक मनीषी डाॅ. पूरन सहगल जी ने हमें लोक में परिव्याप्त ‘वारत राजा विक्रमाजीत दी’  का उद्धरण देते हुए बताया कि पंजाबी की उपबोली लहंदी में भी विक्रमादित्य सम्बन्धी लोक गाथा मिलती है।

राजा होया उज्जैन विच, नाम विक्रमाजीत / संवत चलाया विक्रमी, उसदे गावां गीत /धन्न उज्जैनी धन्न छीपरा, तीरथ गंगाघाट / महाकाल राजा उथे, होर  सुण्या हे भाट / कोई कुझ  वी  कहंदा रहवे, सानूं लगदरियाँ  झल्ल  / विक्रमजीत चलाया संवत् ए हे पक्की गल / हिक सिंघासन इन्दर बरगा रत्तन मणिया दार / बत्ती पुतलियां उसते जड़ियां, पाए पक्के चार / बत्ती पुतलियां इवें जाणो, न्याय दिया पहरेदार /  सच्च -झूठ नूँ  फौरन परखण , रहदियाँ सी होशियार  / दान पुन्न दी गल न पुच्छो , दोनइ हथां वंडदा  / जितना  वंडदा  उतना बघदा , करण वांग हथ मंड दा 

इसी में आगे राजा विक्रमादित्य पर साढ़े साती के प्रकोप की कथा का उल्लेखन हुआ है। समय रूपी कुम्भकार का चक्र जिस प्रकार निरंतर घूर्णन करता है उसी प्रकार जीवन में भी जय पराजय का क्रम अनवरत चलता रहता है।लोक का प्रबल विश्वास है कि  शनि के कोपभाजन बने विक्रमादित्य की दृढ़ता, आस्था, धर्मपरायणता, सत्यप्रियता ही  उन्हें शनि की कष्टकारी दशा में भी सुरक्षित रख पाई  । साढ़ेसत्ती शनिश्चरी करे ताकड़ी बाट अखरा-बखरा वई गया विक्रमजितरा ठाठ  मालवपति द्वारा भोगी गयी असहीनय  दशा में साथी संघाती, स्नेही मित्रवत सगे संबंधियों यहां तक कि देवी देवताओं द्वारा साथ छोड़ देने का वर्णन मिलता है। लोक की मान्यता है कि महाराज विक्रमादित्य शनि की दशा से मुक्ति के लिए नियमानुसार धर्मनिष्ठ और सत्यमार्ग के अनुगामी बने रहे और आत्मबल से दुर्दिनों को काट लिया। मालवा में प्रचलित कथानुसार शनि दशा में संध्याकाल में शस्त्र सहित राजवेश धारण कर अश्वारोहण कर महल से निकलते हैं,   विक्रमादित्य से  अश्व रुपी शनि देव   घोड़े का सौदा करते  हैं और ज्यों ही विक्रमादित्य शनि द्वारा प्रदत्त  घोड़े पर आरूढ़ होते हैं घोड़े  के पवन के वेग से उड़ने का प्रसंग मिलता है , अँधेरे में सघन वन प्रदेश में उन्हें एक हिरण और व्याघ्र दिग्भ्रमित कर देता है। उज्जैनी से कोसों दूर पहुंचकर एक निर्जन अरण्य में वे चकमक पत्थर चटकाकर अग्नि उत्पन्न करते हैं।

बुरो समय आवे जैद गता पड़े नहिं गम्म / हमज होच भी न पड़े हिरदै पड़े भरमा

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Comments

  1. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी सादर चरणस्पर्श, दीदी आपने महाराजा विक्रमादित्य से जुड़ी प्राचीन चम्पावती नगरी और आधुनिक चकल्दी शहर को इतिहास के पन्नो से लाकर एक बार फिर पुनर्जीवित कर दिया। आपके इस प्रयास के लिए मेरे पास आपकी तारीफ के लिए शब्द नही है आदरणीय दीदी। मैं हमेशा आपके लेख की प्रतीक्षा करता हूँ।

  2. राजेन्द्र कौशिके says:

    बहुत सुंदर लेख