लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती (चकल्दी) में शांत

निष्पक्ष लोक साहित्य और इतिहास अन्योन्याश्रित होते हैं, इतिहास और लोक कथाएं एक दूसरे का मार्ग प्रशस्त करती हैं

वे हर आने जाने वाले से उज्जैन का मार्ग पूछते हैं। सूर्य के प्रकाश में वे अश्वारोहण कर पुनः अन्चीन्हें मार्ग पर अग्रसर होते हैं। अबकी बार दस्युओं द्वारा उनके आभूषण शस्त्रादि छिना लिये जाते हैं।
सौ योद्धाओं पर अकेले भारी पड़ने वाले विक्रमादित्य शनि की दशा में पांच दस्युओं से भय प्रद मौन साधे निःसहाय खड़े रहते हैं। आगे कथा में अश्व पर सवार होकर उनके एक अनजाने गांव में लोहार के ठिहे पर पहुंचकर जल हेतु निवेदन का प्रसंग आता है। लोहार कहता है तनिक रुक  जाओ तलवार का बांक निकाल लूं तुम घन उठाओं मेरे निर्देश पर आघात करते रहो।

लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती में शांत

कूप खनाया मोकरा सरवर गामो गाम / ऐसा विक्रमजीत ने जल नी मलयोराम

बेताल पच्चीसी और सिंहासन बत्तीसी में आने वाले  कथानकों से भिन्न मालवी भाषा में संग्रहित लोककथा में शनिदेव रूपी काले  घोड़े  के सघन वन क्षेत्र में  प्राण न्यौछावर करने का कथानक मिलता है। कोपिष्णु शनि मनुष्य के अच्छे बुरे कर्मों के धर्माधिपति हैं। वे राम, रावण और विक्रमादित्य तीनों को अपने कोप का भाजन बनाते हैं। मालवी भाषा में विक्रमादित्य के घोड़े के गुजर जाने के बाद जंगल में चरवाहे द्वारा जल पिलाने, चंपावती  नगरी में जाने, नगर के सेठ की पत्नी का हार खूँटी द्वारा लील जाने के दण्ड स्वरूप तेली के कोल्हू चलाने वाले विक्रमादित्य के साढ़े साती के प्रभाव की समाप्ति से पूर्व दीपक राग गाने से नगर दीप्त हो जाने की कथा वस्तु हमें अन्यत्र भी मिलती है। साढ़े सात साल तक शनि के कोपित होने का प्रतिफल भुगतने वाले विक्रमादित्य के धर्मानुकूल आचरण से शनि प्रसन्न होते  हैं। अन्य सुखांत लोक कथनकों की भाँति विक्रमादित्य की कथा का अंत भी सुखदायी होता है। हमने मालवा लोक साहित्य संस्कृति अनुष्ठान के निदेशक विद्वान डाॅ. पूरन सहगल से इस कथान्तर को समझने का प्रयास किया उनका कहना था कि यह देखी से लेखी की क्रमिक यात्रा है। इतिहास और लोक कथाएं एक दूसरे का मार्ग प्रशस्त करती हैं। पूरन सहगल जी का मानना है कि निष्पक्ष लोक साहित्य और इतिहास अन्योन्याश्रित होते हैं।

हमने विक्रमादित्य और शनि दशा वाले कथानक को कहाँ कहाँ नहीं तलाशा ,साहित्यिक प्रमाण हमें गुणाढ्य की कथा सरित सागर के अंश बेताल पंचविशन्ति में मिले  जो बेताल पच्चीसी के रूप में हिंदी में लोकप्रिय है। उदात्त व् उदार चरित्र वाले विक्रमादित्य के किस्से सिंहासन बत्तीसी में भी मिलते हैं। पूरन  जी कहते हैं कि विक्रमादित्य जो ईसा से 57 वर्ष पूर्व हुए और जिन्होंने विक्रम सम्वत चलाया, उनकी महानता से प्रभावितहोकर  अनेक राजाओं ने यह  गौरवमयी नाम उपाधि धारण कर लीथी । दिलचस्प बात यह है कि जितने विक्रमादित्य  हुए उतने ही  बेताल भी हुए जतरा ठाकर, वतरा चाकर, डॉ सहगल ने  अपने पिता से बेताल पच्चीसी की कई कथाएँ पंजाबी में सुनी थीं। विक्रम रा दरबार में, नव रतनां रो आज / विद्या रो ऊजास वे, अन्धकार रो खोज / सिंघासन पे बैठतां, मुख ऐसा भलकाय / हूरज ने औचक करे, परक झांप ढब जाय / धन-धन माता सीपरा, धन राजा महाकार / अजबी गजबी रोनका, विक्रम रे दरबार / आज तलक होयो नहीं, विक्रम जैसो वीर / जुद्ध नीत अर न्याव में, हरदम राखी धीर   सुनाकर मालवाधिपति विक्रमादित्य के बारे में वे बताते हैं कि पूरे एशिया में उनकी गौरव गाथाएँ मिलती हैं।  विक्रमरी मइमा बड़ी, माख देस विदेश / नौ रतना रे बीच में, सोभे घणों नरेस / महाकार ने धोकतां, हरसिद्ध धोक लगाय / पूजे माता कारका फेर, मेहलां में आय

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Comments

  1. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी सादर चरणस्पर्श, दीदी आपने महाराजा विक्रमादित्य से जुड़ी प्राचीन चम्पावती नगरी और आधुनिक चकल्दी शहर को इतिहास के पन्नो से लाकर एक बार फिर पुनर्जीवित कर दिया। आपके इस प्रयास के लिए मेरे पास आपकी तारीफ के लिए शब्द नही है आदरणीय दीदी। मैं हमेशा आपके लेख की प्रतीक्षा करता हूँ।

  2. राजेन्द्र कौशिके says:

    बहुत सुंदर लेख