लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती (चकल्दी) में शांत

महाराष्ट्र में शनि प्रतिमाओं के साथ विक्रमादित्य के शीष की निर्मिति की जाती है जिसे भूलवश लोग राहूँ  समझ लेते हैं

लोकसंदर्भ विक्रमादित्य के पराक्रमी और प्रजा हितकारी चरित्र को कितना पूजता है यह बात हमें हक्का-बक्का करे दे रही थी। पूरन जी ने हमें बताया कि पंजाब में श्राद्ध के अवसर पर वीर विक्रमादित्य का श्राद्ध किया जाता है। पहले गंगा, फिर गुरु, फिर विक्रमजीत और फिर वरीयता के अनुसार पूर्वजों का श्राद्ध संपन्न होता है। इसी प्रकार निर्जला एकादशी पर सामूहिक रूप से घाटों पर जब पूर्वजों का तर्पण होता है तब विक्रमादित्य का भी तर्पण किया जाता है। विक्रम सम्वत के आरम्भ में पंचांग की पूजा का विधान भी भारतीय जनमानस में आस्था के प्रतीक बन गए विक्रमादित्य के प्रति लोक की निष्ठा सामने लाता है। मध्यप्रदेश से सटे गुजरात में विक्रम सम्वत का प्रचलन और महाराष्ट्र में शनि की ओवी तथा तेलाभिषेक, विक्रमादित्य की कीर्ति स्वयमेव उद्घाटित करते हैं। हमने त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग (द्वादश ज्योर्तिलिंग में परिगणित) के ज्योतिषाचार्य और अनुसंधानकर्ता विद्वान पंडित राजेश दीक्षित जी से सम्पर्क साधकर इस संबंध में उनसे  प्रकाश  डालने का निवेदन किया। उन्होंने उत्तर के साथ त्र्यंबक क्षेत्र में त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के पीछे स्थित शनि मंदिर में स्थापित शनि प्रतिमा का चित्र भी हमें प्रेषित किया जिसमें शनिप्रतिमा के साथ विक्रमादित्य का शीश विद्यमान है।

पं. दीक्षित जी ने हमें बताया कि प्रचलित शनि महात्म्य पर आधारित सभी मंदिरों की निर्मिति में शनि के साथ विक्रमादित्य की प्रतिष्ठा किये जाने का विधान शास्त्रों में प्रतिपादित किया गया है इसलिए क्योंकि शनिदशा  की समाप्ति पर शनि ने प्रकट होकर विक्रमादित्य से सहर्ष वरदान मांगने को कहा था तो उन्होंने प्रत्युत्तर में शनिदेव से  किसी को भी शनिदशा  में प्रताड़ना न देने  की याचना की थी। शनि तो असत्य के मार्गियों को दण्डित करने के लिए जाने जाते रहे हैं उन्होंने विक्रमादित्य से कहा यह तो मैं नहीं कर पाऊंगा। राजेश दीक्षित के अनुसार उन्होंने विक्रमादित्य को आश्वस्त किया कि मंदिरों में उनके साथ पूजा करने वाले आराधकों का वे कष्ट अवश्य कम कर देंगे, तभी से मंदिरों में शनि प्रतिमाओं के साथ धर्माचारी विक्रमादित्य बनाये जाने की परिपाटी चली आ रही है जिसे भूलवश अथवा अज्ञानता में राहू या  केतु का मुख समझकर सिंदूर लेपन कर दिया जाता है। महाराष्ट्र में जो  विक्रमादित्य की शनि की साढ़े साती वाली  कथा ‘श्री शनैष्चराची कथा के रूप् में मिलती है वह ‘गुजरात भाषेची कथा’ होते हुए महाराष्ट्र तक  पहुंचती है

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त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के पीछे स्थित शनि मंदिर में स्थापित शनि प्रतिमा के साथ विक्रमादित्य का शीश, उज्जैन स्थित राजा विक्रमादित्य मंदिर ,जहां वेताल और पुतलियाँ भी विधमान

आप देखिये गुजरात में ओ विक्रमादित्य नो वचन छे कहकर शपथ  लेने वाला पंजाब में श्राद्ध के अवसर पर वीर विक्रमाजीत का श्राद्ध करने वाला और निर्जला एकादशी पर नदी के घाट पर विक्रमादित्य का तर्पण करने वाला लोकनायक को आराध्य मानकर पूजता है। हमने मालवा के गाँवों में तुर्रा कलगी गायकी में शनिदेव की कथा सुनी थी। पौराणिक और ऐतिहासिक गाथा पर आधारित तुर्रा कलगी खयाल गायकी में शनिदेव के कोपभाजन बने उज्जयनी के विक्रम राजा के चम्पावती नगरी में जाने का उल्लेख भी मिला था। शनि कथानक हमारे सामने अवन्तिपुर बड़ोदिया और पगरावद गाँवों में ही आया था, वर्षों पूर्व लिखी गयीं ये पोथीबद्ध लोक कथाएँ मात्र मनोरंजन ही नहीं करतीं बल्कि अतीत की पड़ताल भी करती चलती हैं। अवन्तीपुर बड़ोदिया के श्री मनोहर लाल  उपलावदिया और पगरावद के कैलाश नारायण माहेश्वरी जी ने अपने उस्तादों की लिपिबद्ध रचनाएँ हमें सुनाई थीं। उन्हीं की पोथियों से निकालकर शनि की कथा हम यहाँ आपके पढ़ने के लिए संलग्न कर रहे हैं।

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Comments

  1. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी सादर चरणस्पर्श, दीदी आपने महाराजा विक्रमादित्य से जुड़ी प्राचीन चम्पावती नगरी और आधुनिक चकल्दी शहर को इतिहास के पन्नो से लाकर एक बार फिर पुनर्जीवित कर दिया। आपके इस प्रयास के लिए मेरे पास आपकी तारीफ के लिए शब्द नही है आदरणीय दीदी। मैं हमेशा आपके लेख की प्रतीक्षा करता हूँ।

  2. राजेन्द्र कौशिके says:

    बहुत सुंदर लेख