लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती (चकल्दी) में शांत

विक्रमादित्य ने अपनी प्रजा को अपने खजाने से धन देकर ऋणमुक्त किया और तब नव संवत् चलाया

राजा विक्रमादित्य को शनि दशा लगी थी यह बात सोलह आने सही है, यह हम भलिभांति समझ गये थे और भी जान गए थे कि मालवा में आज भी शनि के गीत गाते हुए महिलाएं मालाएं यूँ  ही नहीं फेरती हैं।

सूरज का अवतार सनीदेव फेरांगा माला तमारी जी / राम के लाग्या, लक्ष्मण के लाग्या सीता माई जी / राजा रावण के ऐसा लाग्या कुल का नाम कराया जी /राज विक्रम के ऐसा लाग्या चोरंग्या कर डाला जी / शनिवार शनिदेव मनावां भैंसा पे सवारी जी।। 

हमने इतिहास मर्मज्ञ और मालवा ग्रन्थ के रचयिता डाॅ. भगवतीलाल राजपुरोहित जी के समक्ष विक्रमादित्य की शनि दशा के संदर्भ में प्रश्न किया तो उन्होंने स्पष्ट किया कि लोक कथाओं से विक्रमादित्य के शनि संत्रस्त होने की पुष्टि होती है और लोकचित्त से उपजी वाचिक परम्पराएं झूठ नहीं बोलतीं।

स्मरण रहे विक्रमादित्य ने ही शकों को पराजित कर मालवगण की पुनः स्थापना की थी। विक्रमादित्य ने अपनी प्रजा को अपने खजाने से धन देकर ऋणमुक्त किया और तब नव संवत् चलाया आज भी देश के अधिकांश भागों में और नेपाल में विक्रम संवत् चलता है। संवत प्रवर्तक विक्रमादित्य सम्बन्धी प्रबंध कोष के अनुसार राम राज्य की अभिलाषा में विक्रमादित्य ने अनेक राज्यों में मंदिर बनवाये राम की स्वर्ण पादुका के अन्वेषण के लिए अयोध्या में उत्खनन करवाया। महाकाल मंदिर की निर्मिति कराई भविष्य पुराण के अनुसार महाकाल मंदिर परिसर में उन्होंने राजसभा बनाई, उसमें अपना 32 पुतलियों वाला सिंहासन रखा। जिस पर बैठ कर विप्र रूपधारी बेताल की पच्चीस समस्यामूलक कहानियाँ सुनीं और उनका समाधान किया। उज्जैन के आस-पास क्षिप्रा और गंभीर नदियों से ऐसे अनेक सिक्के और मोहरें मिली हैं जिनके ब्राह्मी लिपि में विक्रमादित्य कालीन होने की पुष्टि डॉ. जगन्नाथ दुबे, सलाहकार महाराजा विक्रम शोध पीठ, उज्जैन ने भी की है। शिलालेखों में कृत सम्वत को ही मालव सम्वत निरूपित किया गया है।उल्लेखनीय है कि उज्जैन में कृत की कतस उजनियस लिखी सील भी प्राप्त होती है। हमने दुबे जी से चर्चा कर  विक्रमादित्य के पुरा महत्व को समझने की चेष्टा की।

 

जग को आलोकमान करता सूरज अब आमडो, आमाझिरी की पगडंडियों से उठकर सामने आ चुका था, लेकिन मन अनादि से संभावित की यात्रा में लगा हुआ था। वैसे भी मन का भटकना लेखन की नियति है। हम चकल्दी गांव पहुंच गये थे। शनि कथा में घोड़े के अंतरध्यान हो जाने के बाद की कहानी चंपावती नगरी से सम्बंधित थी जिसे चकल्दी के नाम से जाना जाता है। यही हमारा नियत पड़ाव भी था। सात हजार वासियों का टप्पा, किराने की कई दुकानें प्रवेश के साथ ही दिखाई देने लगी थीं। कृषि उपजों से सम्बंधित विक्रेता, खाद और बीज की दुकानें, दर्जी, कुम्हार, पटेल, साहू, प्रजापति, सेन बाखलों (मोहल्ले) को पार करते हुए हम टप्पे के चप्पे-चप्पे पर विक्रमादित्य से जुड़ी लोककथा के तत्वों को टुकुर-टुकुर ताकने में लगे हुए थे। हमने सुन रखा था कि चकल्दी का तेली समाज विक्रमादित्य के आशीष से संपन्न है इसलिए हमने सर्वप्रथम तेली समाज के वयो वृद्ध व्यक्ति से मिलने का मन बनाया। साहू समाज के भूतपूर्व अध्यक्ष नन्नूलाल जी का घर हमारा पहला पड़ाव था।

 

बांध के द्वार से प्रघोष करती जल व्यवस्था, ठेका प्राप्त नौकाओं से मछली पकड़ने वाले, लोहापठार गाँव की आदिवासी जीवनशैली, चप्पे-चप्पे पर विक्रमादित्य से जुड़ी लोककथा के तत्व

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Comments

  1. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी सादर चरणस्पर्श, दीदी आपने महाराजा विक्रमादित्य से जुड़ी प्राचीन चम्पावती नगरी और आधुनिक चकल्दी शहर को इतिहास के पन्नो से लाकर एक बार फिर पुनर्जीवित कर दिया। आपके इस प्रयास के लिए मेरे पास आपकी तारीफ के लिए शब्द नही है आदरणीय दीदी। मैं हमेशा आपके लेख की प्रतीक्षा करता हूँ।

  2. राजेन्द्र कौशिके says:

    बहुत सुंदर लेख

  3. वीरेंद्र सिंह says:

    महाराजा विक्र्मादित्य और उनसे जुड़ी अनेकों महत्वपूर्ण बातें, स्थान व कार्य जो हमे लगता है कि किसी इतिहास में उल्लेख किया गया मुझे नहीं लगता क्योकि आज के इतिहास में वो ही पढाया जाता है जो सिर्फ नयी पीढ़ी के इतिहासकारों जो ये मानते हैं कि वही जो चार विदेशी व देशी इतिहास कार बिना शोध के सीमित संसाधनों के द्वारा बता देते हैं आज मैंने राजा विक्रमादित्य के बारे में वो तथ्य देखे और सुने जो आधुनिक इतिहास जान कर अनजान था राजा विक्रमादित्य के बारे में उन पर साढ़े साती का प्रकोप का होना और जुडी अनेक मान्यतायें व स्थान के बारे में बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी शोध के साथ आपने ने बतायी जिससे सबसे पहले तो यह स्थान जो पहले कभी राजा विक्रमादित्य ने जिसको बसाया था व जिसका नाम चंपावती था वह कैसे इतिहास के गर्त में भूला दिया गया और जिसको सिर्फ आज एक छोटा सा गांव चकल्दी कैसे रह गया जिसे आज कोई इतिहास में उसका वर्णन तक नहीं मिलता जबकि इसके चारों तरफ उनसे जुड़ी अनेकों सबूत भरे पड़े हुये हैं चकल्दी ( चम्पावती) जो कभी कितनी सुन्दर और सम्पन्न रहा होगा ये वहा पर बिखरे पड़े हुये प्राचीन भवनों और मन्दिरों के अवशेष व भग्नावशेषों से सहज रूप से अनुमान लगाया जा सकता है परन्तु आज के इतिहासकार व पुरातत्व वेत्ता अपने को कहने वाले लगता है सिर्फ कालेज या विश्व्विद्यालयो के प्राग्ड़ में बैठकर शोध कर लेते हैं यहाँ पर जिस तरह से हमारी प्राचीन व सांस्कृतिक धरोहर हिन्दू व जैन की बिखरी पड़ी है ये सहज ही इसका बखान करते हैं ।आपका यह लेख भारतीय सनातन संस्कृति व इतिहास को समझने में आने वाली पीढ़ियों के लिए मील का पत्थर साबित होगा तथा इसके अलावा जो समाज में लोक मान्यतायें व लोकोक्तीया भी अपने अन्दर इतिहास समेटे हुए है इसे नये इतिहासकारों को स्वीकार करना चाहिए ।जिसका आधुनिक अपने को मानने वाले अनदेखा करते हैं और सिर्फ इतिहास के किताबों में लिखी लाईनो को ही इतिहास मानते हैं ।