लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती (चकल्दी) में शांत

सात हजार वासियों का टप्पा,  टप्पे के चप्पे-चप्पे पर विक्रमादित्य से जुड़ी लोककथा के तत्व

प्रवेश के साथ ही हैंडपंप से सटे तेली-बाखल में हम चकल्दी के तेली समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले ८५ वर्षीय नन्नूलाल साहू जी से मिले उन्होंने बताया कि गाँव में यह विश्वास प्रचलन में है कि तेली समाज द्वारा विक्रम राजा की सहायता करने के कारण इस गाँव में तेली समाज आर्थिक रूप से सम्पन्न रहता है। उन्होंने अपने बड़ों से इस संबंध में सुना था कि यही राजा विक्रमादित्य की चम्पावती नगरी है उन्होंने अपने कथ्य की पुष्टि में एक कथा भी सुनाई जिसमें विक्रमादित्य के मल्हार राग गाने, रानी मनभावनी के मोहित हो जाने, विवाह करने, सेठ की पुत्री भँवर कुमारी के साथ भी विवाह करने और दहेज में दास दासियों, पालकियों, रथों और धन सम्पदा को  लेकर उज्जैन की ओर लौटने का उल्लेख मिलता है। वे बताते हैं कि सन 59 में  जब वे यहाँ अपने दादाजी के पास रहने आए थे तब २० छोटे घरों वाला चकल्दी चारों ओर से जंगल से घिरा था सभी घरों में लगभग तेल की पिराई होती थी।

अलसी, तिल्ली, गुल्ली, हिंगोन्या का तेल निकालने वाले घाने अधिकांश घरों में  लगे हुए  थे। सागौन, बोर, घटबोर, टेमरू,अचार, महुआ के पेड़ों की बहुतायत थी। झेंझड़ू और जंगली ज्वार से पेट भर लेने वाली ग्रामीण जनता कौशल्या नदी के जल पर आश्रित थी। पाँच तालाबों से पानी की पूर्ति हो जाती थी। बैसाख और जेठ के महीनों में कौशल्या सूख जाती थी, तब पूरन तालाब, पटेल के खेत वाली पुरानी बावड़ीआदि से काम चला लिया  जाता था।बातों बातों में  काठ के घाने से तेल पिराई और पत्थर के घाने से गन्ने की पिराई का काम कोई ६० साल पहले तक हुआ करता था यह भी पता चला । हम 101 वर्षीय रामकुमारी विश्वकर्मा जी से मिले इन्हें गांव में संकीर्तन विभूति माना जाता है। नित्य  प्रतिदिन गांव के मंदिर परिसर में आयोजित होने वाली भजन संध्या में अपनी उपस्थिति से भावप्रभव कर देने वाली रामकुमारी जी ने हमें भी लोक गीत सुनाकर भावविभोर कर दिया। अखंड ज्योत जलाकर चौबीस घंटे की रामसत्ता बैठाना चकल्दी की विशेषता है। रामसत्ता पुरुषों द्वारा और खड़ी सत्ता महिलाओं द्वारा गाए जाने की परिपाटी गांव में रही है जिसकी सूत्रधार रामकुमारी जी रहती आई हैं।

तेली, साहू समाज, विश्वकर्मा, यादव, अहीर, ग्वाल, पंवार, गुप्ता, पटेल, कुलाता, आदिवासी, खाती समाज के मोहल्लों से निकलकर हम रामजानकी मंदिर के सामने स्थित गाँधी चौक बाजार तक आ गए थे। इस गाँव में बनियादेव (जैनमूर्तियों) की बहुलता है। यहाँ वहाँ धँसी हुई, दबी हुई, ढकी हुई, टूटी-फूटी नीवों के नीचे से झाँकती हुई परमारकालीन प्रतिमाओं और मंदिर के ध्वंसावशेषों के अतिरिक्त अनेक तेल पेरने वाले कोल्हू के अवशेष भी हमें स्थान-स्थान पर मिलते रहे जिन्हें शासकीय संरक्षण की आवश्यकता है। कौशल्या नदी क्षेत्र में स्थित हनुमान मंदिर परिसर में रखी मूर्तियाँ हों या देवलाल के अहाते में रखी तीर्थंकर की प्रतिमा संरक्षण की बाट जोह रही हैं।

चकल्दी में यहाँ वहाँ धँसी हुई, दबी हुई, ढकी हुई, टूटी-फूटी नीवों के नीचे से झाँकती हुई परमारकालीन प्रतिमाओं और मंदिर के ध्वंसावशेषों के अतिरिक्त अनेक तेल पेरने वाले कोल्हू के अवशेष

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Comments

  1. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी सादर चरणस्पर्श, दीदी आपने महाराजा विक्रमादित्य से जुड़ी प्राचीन चम्पावती नगरी और आधुनिक चकल्दी शहर को इतिहास के पन्नो से लाकर एक बार फिर पुनर्जीवित कर दिया। आपके इस प्रयास के लिए मेरे पास आपकी तारीफ के लिए शब्द नही है आदरणीय दीदी। मैं हमेशा आपके लेख की प्रतीक्षा करता हूँ।

  2. राजेन्द्र कौशिके says:

    बहुत सुंदर लेख