लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती (चकल्दी) में शांत

हम घूम -घूमकर वयोवृद्ध लोकमानस को टटोल रहे थे ताकि चंपावती नगरी का अतीत खंगाल पाएँ

गांववालों ने हमें बताया कि हमारे आने से बहुत पहले बहुतेरे लोग बनियादेव मूर्तियाँ लेके जा चुके हैं।हमें स्मरण हो आया  यहां से निकली तीन-चार तीर्थंकर प्रतिमाएं हमें उज्जैन के जयसिंहपुरा स्थित जैन संग्रहालय में दिखीं थीं। चार अन्य प्रतिमाएं भोपाल स्थित बिरला संग्रहालय में भी प्रदर्शित दिखीं। चकल्दीवासी अपने तबेले और गौशालाओं में प्रयुक्त पुरा महत्व के अवशेष हमें दिखाते रहे। गाँव के चौपाल और ओटलों पर गप्पें लड़ाते ग्रामवासी भी इस क्रम में गाहे-बगाहे सहयोगी बनते रहे।

बिरला संग्रहालय में रखी प्रतिमाएँ जो चकल्दी से मिलीं

गांव की पथरीली सकरी गलियां हमें  चकल्दी के एक पक्के व्यवस्तिथ  मकान तक ले आई जो सरपंच राजेश कुमार मालवीया जी का था। हमने उनसे चम्पावती नगरी की नामधेय  कथा सुनी। अब हम पूर्णतः आश्वस्त थे कि चम्पावती नगरी ही वर्तमान की चकल्दी है। उन्होंने बताया कि अपने बुजुर्गों की कही बातों का अनुसरण करते हुए उन्होंने नाम परिवर्तन हेतु सरकार के पास एक प्रस्ताव भी भेजा था। पूरा चकल्दी गाँव चम्पावती नाम करण का  पक्षधर है। अब तक चम्पावती की चम्पई दोपहरी में हमारा  मन रमने लगा था।

गांव के चौकों से दाल-बाटी बनने की महक आ रही थी और हम घूम -घूमकर वयोवृद्ध लोकमानस को टटोल रहे थे ताकि चंपावती नगरी का अतीत खंगाल पाएँ। गांव के लोग भी विक्रमादित्य के शनि प्रकोप की गाथा बड़े चाव से सुना रहे थे और यह बताना भी नहीं भूल रहे थे कि चंपावती नगरी के ब्याज से ही उज्जैन नगरी बसी है। राम विश्वकर्मा (75 वर्ष), देवलाल (85 वर्ष) और खाती समाज की 90 वर्षीया मुल्ली बाई पटेल ने हमें चम्पावती नगरी से जुड़ी सत्यता बताई। एक आदिवासी के खेत में हमें विशालकाय सती स्तम्भ, राजा हनुमान, गणेश, विष्णु और देवी प्रतिमाएँ भी मिलीं।

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Comments

  1. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी सादर चरणस्पर्श, दीदी आपने महाराजा विक्रमादित्य से जुड़ी प्राचीन चम्पावती नगरी और आधुनिक चकल्दी शहर को इतिहास के पन्नो से लाकर एक बार फिर पुनर्जीवित कर दिया। आपके इस प्रयास के लिए मेरे पास आपकी तारीफ के लिए शब्द नही है आदरणीय दीदी। मैं हमेशा आपके लेख की प्रतीक्षा करता हूँ।

  2. राजेन्द्र कौशिके says:

    बहुत सुंदर लेख

  3. वीरेंद्र सिंह says:

    महाराजा विक्र्मादित्य और उनसे जुड़ी अनेकों महत्वपूर्ण बातें, स्थान व कार्य जो हमे लगता है कि किसी इतिहास में उल्लेख किया गया मुझे नहीं लगता क्योकि आज के इतिहास में वो ही पढाया जाता है जो सिर्फ नयी पीढ़ी के इतिहासकारों जो ये मानते हैं कि वही जो चार विदेशी व देशी इतिहास कार बिना शोध के सीमित संसाधनों के द्वारा बता देते हैं आज मैंने राजा विक्रमादित्य के बारे में वो तथ्य देखे और सुने जो आधुनिक इतिहास जान कर अनजान था राजा विक्रमादित्य के बारे में उन पर साढ़े साती का प्रकोप का होना और जुडी अनेक मान्यतायें व स्थान के बारे में बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी शोध के साथ आपने ने बतायी जिससे सबसे पहले तो यह स्थान जो पहले कभी राजा विक्रमादित्य ने जिसको बसाया था व जिसका नाम चंपावती था वह कैसे इतिहास के गर्त में भूला दिया गया और जिसको सिर्फ आज एक छोटा सा गांव चकल्दी कैसे रह गया जिसे आज कोई इतिहास में उसका वर्णन तक नहीं मिलता जबकि इसके चारों तरफ उनसे जुड़ी अनेकों सबूत भरे पड़े हुये हैं चकल्दी ( चम्पावती) जो कभी कितनी सुन्दर और सम्पन्न रहा होगा ये वहा पर बिखरे पड़े हुये प्राचीन भवनों और मन्दिरों के अवशेष व भग्नावशेषों से सहज रूप से अनुमान लगाया जा सकता है परन्तु आज के इतिहासकार व पुरातत्व वेत्ता अपने को कहने वाले लगता है सिर्फ कालेज या विश्व्विद्यालयो के प्राग्ड़ में बैठकर शोध कर लेते हैं यहाँ पर जिस तरह से हमारी प्राचीन व सांस्कृतिक धरोहर हिन्दू व जैन की बिखरी पड़ी है ये सहज ही इसका बखान करते हैं ।आपका यह लेख भारतीय सनातन संस्कृति व इतिहास को समझने में आने वाली पीढ़ियों के लिए मील का पत्थर साबित होगा तथा इसके अलावा जो समाज में लोक मान्यतायें व लोकोक्तीया भी अपने अन्दर इतिहास समेटे हुए है इसे नये इतिहासकारों को स्वीकार करना चाहिए ।जिसका आधुनिक अपने को मानने वाले अनदेखा करते हैं और सिर्फ इतिहास के किताबों में लिखी लाईनो को ही इतिहास मानते हैं ।