राजा विक्रमादित्य की बहन सुन्दराबाई का गांव सुन्दरसी

महाकाल मंदिर से 500 मीटर  की दूरी पर तोड़ा इलाके में कब्रिस्तान में रेशम टीला 

महाकाल मंदिर से 500 मी. की दूरी पर तोड़ा मोहल्ले में रेशम का टीला

 मंदिर से 500 मीटर  की दूरी पर श्मशान घाट है और लगभग इतनी ही दूरी पर विपरीत दिशा में तोड़ा इलाके में कब्रिस्तान है देवेंद्र जी से यह जानकारी मिलते ही , हम उन्हीं को साथ लिए मंदिर परिसर के पीछे रानी के चबूतरे की ओर बढ़ गए, खेत की  काली मिट्टी को लगभग रोंदते हुए हम थोप के चबूतरे तक पहुंच गए थे। यह किसी रानी की छतरी थी।यहां खेती किसानी का कार्य अभी हाल  में ही होने लगा था , दिवस का अवसान समीप पाकर वहीं  से जल्दी जल्दी डग भरते हुए हम देवेंद्र जी के साथ रेशम टीला की ओर अग्रसर हो गए। रेशमी टीला तोड़ा मोहल्ले में स्थित है। वर्तमान में सीताफल की झाड़ियों के प्रभुत्व वाला  यह प्रक्षेत्र मुसलमानों की बसाहट वाला भू-भाग था । यहां के सीताफल ऊँचे दामों में देश विदेश में बिकते हैं। यहां की श्वेतवर्णी मुलायम मिट्टी हाथ में लेकर देवेंद्र जी बताने लगे  ,कभी इस मिट्टी की उपादेयता के कारण  विविध रंगी  कौशेय अर्थात उच्च कोटि के रेशम उत्पादन के कारण सुंदरसी चर्चित हुआ करती थी, शहतूत के झाड़ यहां  प्रचुर मात्रा में  थे जिन पर रेशम के कीड़े पलते थे। शहतूत को तोड़ते  समय इंद्रधनुषी वातावरण सिरजता था। समृद्ध व्यावसायिक केंद्र के रूप में गणनित इस क्षेत्र का उल्लेख कालांतर में भी फलते-फूलते रेशम उद्योग के रूप में  मिलता है, यही कारण रहा कि निर्यातकों की आवक जावक सुंदरगढ़ में  बनी रही । अब यहाँ कब्रिस्तान है। यहीं शाह सुलतान जलालुद्दीन के शासनकाल के सिक्के स्थानीय लोगों को बहुत बाद तक मिलते रहे। विपणन की समुचित व्यवस्था के चलते पटट वायों को भी  इस धरती से अत्यधिक लगाव हो गया था।गांव से उनकी  प्रीति का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है  कि विपरीत परिस्थितियों में सुन्दरसी से मंदसौर जाकर बसने वाले पटट वायों ने सुंदरसी  के साथ अपनी पुरानी  पहचान को आज तक  जोड़े रखा है। राजनीति के क्षेत्र में भी सुन्दरसी की धरा ने ऐसे व्यक्तित्वों को गढ़ा जिनके उल्लेख के बिना आलेख अधूरा ही माना जायेगा। सुन्दरसी के मालवीय परिवार के स्व. मोकमसिंह के वंशवृक्ष में भैरूलाल जी और नगराम जी का नाम आता है।इसी परिवार के  भैरूलाल जी के प्रतिभावान  सुयोग्य पुत्र कन्हैया लाल मालवीय ने अपनी राजनैतिक प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए सुन्दरसी का नाम राजनीति के मानचित्र पर स्वर्णाक्षरों से लिख दिया। वे 57 के दशक में शाजापुर सीट से कांग्रेस के सांसद रहे, किशनलाल जी मालवीय जो कि कन्हैया लाल जी के ताऊ के लड़के थे वे भी 1949 से ही  सक्रिय राजनीति में उतर चुके थे उनका चयन तत्कालीन विधायकी के लिए भी हुआ था । तीन बार बतौर विधायक क्षेत्र में अपनी धाक जमाने वाले मालवीय जी  शाजापुर सीट से कांग्रेस के विधायक  रहे। अपनी जनसेवा से मतदाताओं के बीच में उदारवादी नेता के रूप में लोकप्रिय रहे किशनलाल जी जनसंघ से भी जुड़कर शाजापुर सीट से  विधायक बने । यही नहीं इसी परिवार के कन्हैयालाल जी के भतीजे भागीरथ मालवीय भी 1952 में शाजापुर के सांसद के रूप में विजयी  हुए। इन सभी राजनैतिज्ञों ने भारी बहुमत के साथ अपने निकटतम प्रतिद्वंदियों को पराजित कर  यह सिद्ध कर दिया कि अति-साधारण जीवन यापन करने वाले अपरिमित संघर्षों से असाधारण क्षमताओं के बल पर अपने परिवार को  ही नहीं  अपने गांव को प्रसिद्धि दिला जाते हैं, राजनीति में इस परिवार का दबदबा यहीं तक सीमित नहीं रहा वरन किशनलाल जी की बहन भी गुलाना सीट से प्रत्याशी बनीं। बाद में मालवीय परिवार का राजनीती से मोहभंग हो गया। समाजसेवी और प्रजासेवी किशनलाल जी ने स्वार्थपरक राजनीति से मुंह फेर लिया। उनकी भावी पीढ़ी भी राजनीति से दूरी बरतती रही है।

थोप का चबूतरा महाकाल मंदिर की पृष्ठभूमि में, स्व. श्री भागीरथ जी मालवीय, स्व. श्री कन्हैयालाल जी मालवीय

अवंतिका नगरी के सादृश काली सिंध नदी के बाईं ओर गाँव के पश्चिमी छोर पर गोरा भैरव मंदिर देखने के लिए 2 किलोमीटर दूर हमने भैंरुपुरा का  भी रुख  किया। नीम, बरगद, पीपल, के पुराने  त्रिवेणी वृक्ष जिनकी परिक्रमा करने और जल सींचने का विधान शास्त्रों में भी प्रतिपादित है, के बीच से निकलकर भैंरुपुरा पहुंचने पर  उज्जैन के काल भैरव की तरह मदिरा पान करने वाले भैरव जी विराजे दिखे। भैरव साधना का केंद्र रहे मालवा में रूद्र का रौद्र रूप ही भैरव हैं। भैरव ने पाँच वर्ष की अवस्था में बटुक के रूप में आपद नामक राक्षस का वध किया था। इस मंदिर के भीतरी स्तम्भ पर 26 पंक्तियों में 3 भागों में विभक्त एक अभिलेख है. देवनागरी लिपि और संस्कृत भाषा में श्लोत्कीर्ण सम्वत 1200 इसमें स्पष्ट दिखाई देता है. स्थापत्य की दॄष्टि से परमारकालीन  मंदिर के समक्ष एक पेड़ के नीचे असुरक्षित विष्णु जी की चतुर्भुजी  परमारकालीन प्रतिमा को देखकर हमारे पाँव भी  ठिठक गए  थे।

सुन्दरसी से 2 किलोमीटर आगे भैरूपुरा स्थित गोरा भैरव मंदिर

देवेंद्र जी के साथ हम सास-बहू की तलाई भी गए जो गाँव से कुछ ही दूरी पर स्थित थी। स्थानीय लोग मानते हैं कि विधर्मी आक्रांताओं से भयाक्रांत सास-बहू ने यहाँ देहोत्सर्ग किया था। इससे और आगे राजेंद्र सिंह जी जो कि एक स्थानीय शिक्षक हैं के गेहूँ के खेत में हमें बावड़ी छतरियाँ और जैन प्रतिमाओं की सूचना मिली। हम वहाँ भी पहुंचे, उनकी पारदर्शियाँ आपके लिए भी उतारकर लाये। संयोग से हापाखेड़ा जाने का भी कार्यक्रम बन गया। कोई 6 किलोमीटर दूर हापाखेड़ा हापा जी का स्थान है, यहीं से  सर्वप्रथम  राठौर राजपूतों का मालवा के इस भू भाग से  पर्दापण हुआ था ऐसी मान्यता है। राजस्थान के हस्तलिखित प्राचीन भट्ट ग्रंथों में और गुजरात की पुस्तकों में क्षत्रियों के जिन 36 राजवंशों का उल्लेख मिलता है उन्हीं में से सूर्यवंशी राठोड़ों की 17  शाखाएं आती हैं। कर्नल टाड की 1913 में प्रकाशित टाड  राजस्थन नामक पुस्तक का अनुवाद  गरीब चौबे और हीराचंद ओझा ने किया था। उसी का प्रथम खंड हमारे हाथ लग गया था, उसी में हमने पढ़ा था। खैर यहाँ भी प्राचीन धरोहरों का बिखराव दृष्टिगत हुआ। गाँव के बीचों-बीच स्थित हनुमान जी के अति प्राचीन मंदिर के चौंतरे पर ही राठौरों का सती स्तम्भ स्थित था जिसकी विधि विधान से पूजा की जाती है ऐसा प्रथम दृष्टया प्रतीत हो रहा था, यद्यपि अब यह  गुर्जरों की बहुलता वाला गाँव है। काली सिंध नदी पर अधबने पुल से सूने आकाश झांक रहे थे, नदी के पास ही मछलियों के क्रेता विक्रेताओं का जमावड़ा था। हम जो जिज्ञासाएँ जगाकर सुन्दरसी में प्रविष्ट हुए थे उनको लगभग बुझा चुके थे। अब समय लौटने का हो गया था। मन में यही विश्वास था, दिन बहुरेंगे राजा विक्रम की बहन के गांव सुन्दरसी के।

एक खेत में बावड़ी और पुरावशेष, सास बहू की तलाई, हापाखेड़ा जहाँ राजस्थान से राठौर वंशीय राजपूत हापाजी सबसे पहले आए थे

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Comments

  1. बंशीधर बन्धु, ज़ेठरा जोड़ says:

    बहुत ही रोचक, तथ्य परख और महत्वपूर्ण। बधाई!

  2. Varsha Nalme, Ajmer says:

    Thanks maam…aadha pd liya ..bahut sunder matter n pics 👌💐💐💐😊

  3. ललित शर्मा, झालावाड़, राज. ('महाराणा कुम्भा इतिहास' अलंकरण) says:

    -पुरोवाक-

    भोपाल की सांस्कृतिक अस्मिता और लोक संस्कृति से अभिप्रेरित पत्रकार दिशा अविनाश शर्मा द्वारा एक लम्बे अरसे से मध्य प्रदेश की कई ऐसी लोकसंस्कृति धारोहरों पर ऐसा अनछुआ कार्य किया जा रहा है जिसके माध्यम से अनेक तथ्य व सांस्कृतिक पक्ष प्रकाश में आ रहे हैं।

    हाल ही में उन्होनें शाजापुर जिले के परमारकालीन सुन्दरसी ग्राम में स्थित महाकाल मंदिर तथा अन्य मंदिरों की लोक संस्कृति का चित्रण जिस प्रकार अपने परिश्रम से खींचा वह आश्चर्यचकित कर देने वाला है। उन्होंने सुन्दरसी की कथा, इतिहास के साथ विक्रमादित्य की अनुजा सुन्दरबाई के वृतान्त के साथ उस क्षेत्र के ग्रामीणों, बुद्धिजीवियों, कवियों के साक्षात्कार लेकर इस महत्ता को प्रमाणित किया है। दिशा शर्मा ने इसी के साथ चित्रों के माध्यम से पुरातत्व की दुर्लभ मूर्तियों, मंदिर, स्थापत्य के साथ स्थानीय ग्रामीण, पथ, सघन वन तथा ग्रामीण आवास का ऐसा जीवन्त चित्रण किया है मानो यहाँ की संस्कृति हमसे संवाद करने को तत्पर हो। उनके इस कार्य को महसूस कर यहाँ कहा जाना सटीक होगा कि- भारत की सच्ची लोक संस्कृति के दर्शन हमें सुन्दरसी जैसे ग्रामों में ही दिखायी देते हैं। सद् प्रयास हेतु हृदय से अभिवादन।

  4. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी बहुत ही सुंदर औ मनोहरी वर्णन है, आपकी लेखनी का जवाब नही है, सीधे मन मस्तिष्क पर प्रभाव डालती है।। इतिहास के गर्व से निकाल कर फिर एक बार एक ऐतिहासिक सत्य से सभी अनभिज्ञ लोगो को अवगत कराने के लिए धन्यवाद।।

  5. रामाराव जाधव सुन्दरसी says:

    धन्यवाद मैडम जी हम सभी गाँव वाले आभारी हैं आप के।

  6. Indra Dikshit, Pune says:

    To much scope in Archaeology. Best wishes to U. Nice research papers.

  7. O P Mishra, Bhopal says:

    I have read the complete text and videos ,photographs related to sundarsi ancient site in Malwa region.raman Solanki and Prashant Puranikji are the scholar’s in that region.puranshahgal also give informative.your report on this topic needs no comment.excellent matter .regarding this arealocal folk songs are also be quite impressive.photographs are to be in the photo archives.now no serious scholars moving for such academic researches.thank you very much for your field work and taking interviews of the very senior citizens.you are adding new chapters in archaeology, social areas,art,architectures and religious fields.once again thank you very much for taking interest.

  8. देवेंद्र प्रजापति, सुन्दरसी says:

    जय श्री महाकाल

    आपके द्वारा भूत भावन महाकाल की नगरी सुन्दरसी (सुंदरगढ़) के अवन्ति के राजा विक्रमादित्य की बहन सुंदराबाई जिनका विवाह सुंदरगढ़ के राजा भगवत सिंह से हुआ था एवं उज्जैन में जितने भी मंदिर थे उतने मंदिर ग्राम सुन्दरसी (सुंदरगढ़) में बनाए गए, विक्रमादित्य की बहन सुंदराबाई रोज सुबह महाकाल मंदिर एवं अन्य मंदिरों में दर्शन करने जाती थीं, यह सभी जानकारी आपके द्वारा बड़ी ही सुन्दर सटीक सरल भाषा के प्रयोग के साथ वर्णित की गई है। इससे हमारी नई पीढ़ी को ज्ञान प्राप्त होगा एवं इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त होगी।

    इससे मैं आपको सहृदय प्रणाम करता हूँ।

    “जय श्री महाकाल”

  9. राम प्रसाद ' सहज ' शुजालपुर says:

    रोचक, श्रेष्ठ व संग्रहणीय ।
    ‘साहसिक कदम ‘
    ‘हार्दिक बधाई’
    👌✍️👌

  10. Umesh Pathak says:

    ब्रह्माण्डीय यात्रा में हमें कब कहाँ जाना होगा यह निर्णय तो उसके निर्माता और नियन्ता के हाथ में ही होता है। पर यात्रा के अनुभव को उस मार्ग के विश्राम स्थलों के सहयात्रियों के साथ साझा किया जाता है। ज्ञानवृद्ध सहयात्री अपने अनुभवों से अग्र गमक जनों के लिए पथ प्रदर्शक होते हैं। आदरणीय बहन श्रीमती दिशा अविनाश शर्मा भोपाल भी एक ऐसी सहयात्री हैं जो अपनी मार्ग दैन्दिनी (रोड डायरी) सृज कर वर्ण, ध्वनि, व चित्र पिपासुओं को सुरम्य सुखद उद्यान उपलब्ध करती हैं। उनका सुन्दरसा (सुन्दरसी) यान्त्रिक ग्रन्थ (ब्लाग) वन्दनीय व नमनीय है। विक्रमादित्य के काल से अब तक के अनगिनत सृजनधर्माओं के कर-चिन्हों व ध्वनियों के संग्रहीत और संयोजित कर रामायण रघुवंश, रामचरितमानस या कामायनी जैसा सृजन दिशा बहन आपने दिया है। इसमें इतिहास, साहित्य, संगीत और कला (नैसर्गिक दृश्य) सब कुछ समाहित हैं, इसलिए यह एक महाकाव्य है। तथा भारत भूमि के महाप्रतापी नृप विक्रमादित्य को श्रद्धावनत पुष्प गुच्छ हैं। मेरे जैसे अनुजों औद इतिहास, साहित्य, संगीत व कला अनुशीलकों को आपका लेखनीय वरद हस्त सदैव शारदीय व वासन्तिक रहे इन्हीं कामना व भगवान धरणीधर व माता गंगाजी से प्रार्थना के साथ।

    आपका अनुज,
    उमेश पाठक
    वासन्तीय नवरात्रि प्रतिपदा, वि0सं0 2077
    मौ0 चैदहपौर महीधर्राचन खडगगिरिमठ
    पो0 सोरों सूकरक्षेत्र
    जनपद- कासगंज उ0प्र0

  11. बालकृष्ण लोखण्डे, भोपाल says:

    रचियेता द्वारा तथ्यों परक अनुशोधों की तह परत दर परत स्थलों की अनुश्रुतियों/किंवदंतियों पर ही नहीं प्रमाणों को अपनी श्रृशुधा शांत करने के संकल्प में यथासंभव भ्रमणशील को नमन्ति स्वीकार हो।

  12. दिनेश झाला, शाजापुर says:

    🙏🏻🙏🏻 आपके द्वारा सम्पादित कार्य अत्यंत सराहनीय हैं। साधुवाद ।

  13. नारायण व्यास says:

    देखा और सुना। बहुत अच्छा शोध हैं एक सामान्य व्यक्ति भी समझ सकता है। सौलंकी जी ने जिस स्तूप के विषय मे उल्लेख किया है, कभी भविष्य मे मैं कभी देखने जाऊँगा। धन्यवाद

  14. Pirtam Singh Rathod says:

    बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार