राजा विक्रमादित्य की बहन सुन्दराबाई का गांव सुन्दरसी

दो एकड़ में विस्तारित महाकाल मंदिर परिसर में अनगिन परमारकालीन स्थापत्य के भग्नावशेष एकत्रित

माता चौक से थोड़ी ही दूर पर रावला बावड़ी के ध्वंसावशेष, महाकाल मंदिर द्वार, सती स्तम्भ 

हम देवेंद्र जी के साथ चलते-चलते कालीसिंध नदी के कूल पर बने महाकाल मंदिर तक पहुँच गये थे। स्थानीय जनता द्वारा माता चौक के रूप में पुकारे जाने वाले इस स्थान से थोड़ी ही दूर पर रावला बावड़ी के ध्वंसावशेष और एक सती स्तम्भ ओटला भी दिखाई दे रहा था। बातों बातों में पता चला कि पुराने अस्पताल के निकट नदी पर जाने वाले लोग सुनेरी दरवाजे से होकर ही निकला करते थे। महाराजा दरवाजा महाकाल मंदिर मार्ग में रावले में रहने वाले राठौड़ों की आवक जावक का साक्षी रहा है । वर्तमान में इसके भग्नावशेष नीम के पेड़ वाले चबूतरे के आजू बाजू दिख रहे थे। ईश्वर के दिव्य विग्रहों से संपन्न नित्य तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित सुंदरगढ़ की आस्तिक जनता कभी अमृतमयी कृष्णा सिंधु नदी में स्नानोपरांत देवदर्शन  करती थी । महाकाल दर्शन के पश्चात् नागनाथ दर्शन का भी विधान था  जिसके प्रमाण हमने मार्ग में स्थित पंचमुखी नागेश्वर मंदिर में देखे थे। त्रिलोकी का रक्षण करने वाले महाकाल की सुन्दरसी में प्रतिस्थापना से परितुष्ट  सुखवंती बहिन सुन्दराबाई के सच्चे हृदय से हरि स्मरण करने से सुंदरगढ़ अथवा सुन्दरसी वैभव की पराकाष्ठा को संस्पर्श करता था। परिसर में प्रविष्टि के साथ ही शहतूत, अनार, बेलपत्र, नीम आदि के वृक्ष दिखाकर देवेन्द्र बताने लगे यहां कभी महाकालवन जैसा घना वनक्षेत्र हुआ करता था। भेड़ा पेड़ जिस पर लगे डोडे गांव वाले चाव से खाया करते थे; वृद्ध वट वृक्षों की तो भरमार थी। दो एकड़ में विस्तारित महाकाल मंदिर परिसर में अनगिन परमारकालीन स्थापत्य के भग्नावशेषों को एकत्रित कर सुरक्षित रख दिया गया था। परिसर में प्रवेश के साथ ही हम इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके थे कि पीढ़ी दर पीढ़ी विचरती लोक श्रुतियों को आधार मानकर जो निर्मितियाँ हुईं  बाद के शासकों ने भी उसी परम्परा का अनुगमन किया। वस्तुतः  जो दृष्टव्य था वह परमार नृपों द्वारा निर्मित कल्याण के प्रदाता देवाधिदेव महादेव के भव्यतम आलयों के संकुल के रूप में हमारे सामने था। भूमिज शैली में निबद्ध सप्तरर्थी तल विन्यास वाली अप्रतिम संरचना  पूर्वाभिमुखी  मंदिर जो अर्धमण्डप, महामण्डप, अन्तराल तथा गर्भगृह में विभक्त था को सामने पाकर हम अभिभूत  थे।स्थापत्य विशेषज्ञों ने  मंदिर के द्वितीय तल पर ओमकार मान्धाता के अनुरूप ओम्कारेश्वर मंदिर की निर्मिति मानी  है।

भूमिज शैली में निबद्ध सप्तरर्थी तल विन्यास वाली अप्रतिम संरचना पूर्वाभिमुखी महाकाल मंदिर का गर्भगृह

यहां कभी विद्यमान रहे मंदिरों  के शिखर जंघा, शुकनासा, रथि का, वरण्डिका, और स्कन्ध अलंकृत शिल्प खण्ड परिसर में ही सर्वत्र दिख रहे थे। महाकाल मंदिर के शंखयुक्त उदुम्बर, अर्धचन्द्र, मंडारक इत्यादि परमारकालीन स्थापत्य को परिभाषित करते प्रतीत हो रहे थे। ललितासन में विराजे उमामहेश्वर, लक्ष्मीनारायण युगल, अलंकृत खण्डित नंदी प्रतिमाएं भी मंदिर प्रांगण में यहां वहां दृष्टिगत हो रही थीं। शिल्पियों की अनूठी शिल्पण क्षमता का परिचायक रहे मंदिर के भीतर भी अलंकरण युक्त हाट पल्लव, दिभंग मुद्रा में द्वारपाल, प्रवेशद्वार की उत्तरांग पट्टिका के मध्य में अष्टभुजी शिव ताण्डव प्रतिमा, सप्तद्वारशाखा, कमलदलाकृतियों से अलंकृत द्वार शाखाओं पर शिवद्वारपालों और त्रिभंग मुद्रा में परिचारिकाओं का शिल्पाकंन, समभंग मुद्रा में सूर्य की स्थानक प्रतिमा, चतुर्भुजी वीणाधर शिव की त्रिभंग मुद्रा का अंकन, कुबेर की त्रिभंगी मुद्रा में प्रतिमा, शिवलिंग के पार्श्व  में समभंगी मुद्रा में मां पार्वती, मुख्यद्वार पर कीर्तिमुख, मध्य में मंदारक, ब्राह्मणी, वैष्ण्वी और सरस्वती प्रतिमाओं का शिल्पांकन और गजासुर संहार गणेश और योग प्रतिमाओं के माध्यम से शिल्प की दृष्टि से समृद्ध परमार कालीन शिल्पण को देखकर हम भौंचक्का थे। अशरणों को शरण देने वाले सबके मूल कारण और पालक आशुतोश शिव को नमन करके गहराई लिये गर्भगृह के चढ़ाव से ऊपर आने पर छः स्तम्भों में से दो स्तम्भों पर उत्कीर्ण शिलाक्षरों को पढ़ने के क्रम में सिंदूर का आलेपन बाधक बनता रहा। इतना भर समझ पाये कि ग्यारहवीं सदी में राजा उदियादित्य के शासनकाल में इस मंदिर की परिणिति हुई  थी। शिलालेख को समझने के लिए इतिहास से संबंद्ध उत्तरप्रदेश के सौरों क्षेत्र के इतिहासकार डॉ. उमेश पाठक जी का सहयोग लिया। उन्हीं से हमें विदित हुआ कि वला हितां जु प्रणाम तिनितां लिपि पठन के दृष्टिकोण से परमरकालीन शिलालेख  ही है। शिलालेख में जु वर्ण उन्हें  है हेय वंशी राजा जाजल्ल देव के काल कलचुरि सं  866 ई. अर्थात  1114 काल का  प्रतीत हुआ। यहां एक अन्य शिलालेख वि. संवत् 1224 का भी पढ़ने में आया। इतिहासकार श्री ललित शर्मा इस दूसरे शिलालेख को हरिश्चन्द्र परमार से जोड़कर देखते हैं। जो मालवा में परमारकालीन क्षेत्र के महाकुमार रूप में शासनकर्ता था। यह परमारों का पराभव काल था। पंचमहाशब्दोधारी मालव महाकुमार, परमारों की युवराज शासन श्रृंखला का प्रारब्ध काल था। परिसर में घूमने के क्रम में हमें सौभाग्य से 82 वर्षीय शंकर सिंह जी मिल गए। मंदिर की जीर्ण-शीर्ण स्थिति के प्रत्यक्षदर्शी रहे वयोवृद्ध शंकर सिंह जी ने हमें बताया कि उन्होनें पूर्व महंत ब्रह्मलीन स्वामी परमानन्द महाराज जी की प्रेरणा से खंडहर में परिवर्तित हो चुके महाकाल  मंदिर संकुल के परिमार्जन में सहयोग किया था।

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Comments

  1. बंशीधर बन्धु, ज़ेठरा जोड़ says:

    बहुत ही रोचक, तथ्य परख और महत्वपूर्ण। बधाई!

  2. Varsha Nalme, Ajmer says:

    Thanks maam…aadha pd liya ..bahut sunder matter n pics 👌💐💐💐😊

  3. ललित शर्मा, झालावाड़, राज. ('महाराणा कुम्भा इतिहास' अलंकरण) says:

    -पुरोवाक-

    भोपाल की सांस्कृतिक अस्मिता और लोक संस्कृति से अभिप्रेरित पत्रकार दिशा अविनाश शर्मा द्वारा एक लम्बे अरसे से मध्य प्रदेश की कई ऐसी लोकसंस्कृति धारोहरों पर ऐसा अनछुआ कार्य किया जा रहा है जिसके माध्यम से अनेक तथ्य व सांस्कृतिक पक्ष प्रकाश में आ रहे हैं।

    हाल ही में उन्होनें शाजापुर जिले के परमारकालीन सुन्दरसी ग्राम में स्थित महाकाल मंदिर तथा अन्य मंदिरों की लोक संस्कृति का चित्रण जिस प्रकार अपने परिश्रम से खींचा वह आश्चर्यचकित कर देने वाला है। उन्होंने सुन्दरसी की कथा, इतिहास के साथ विक्रमादित्य की अनुजा सुन्दरबाई के वृतान्त के साथ उस क्षेत्र के ग्रामीणों, बुद्धिजीवियों, कवियों के साक्षात्कार लेकर इस महत्ता को प्रमाणित किया है। दिशा शर्मा ने इसी के साथ चित्रों के माध्यम से पुरातत्व की दुर्लभ मूर्तियों, मंदिर, स्थापत्य के साथ स्थानीय ग्रामीण, पथ, सघन वन तथा ग्रामीण आवास का ऐसा जीवन्त चित्रण किया है मानो यहाँ की संस्कृति हमसे संवाद करने को तत्पर हो। उनके इस कार्य को महसूस कर यहाँ कहा जाना सटीक होगा कि- भारत की सच्ची लोक संस्कृति के दर्शन हमें सुन्दरसी जैसे ग्रामों में ही दिखायी देते हैं। सद् प्रयास हेतु हृदय से अभिवादन।

  4. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी बहुत ही सुंदर औ मनोहरी वर्णन है, आपकी लेखनी का जवाब नही है, सीधे मन मस्तिष्क पर प्रभाव डालती है।। इतिहास के गर्व से निकाल कर फिर एक बार एक ऐतिहासिक सत्य से सभी अनभिज्ञ लोगो को अवगत कराने के लिए धन्यवाद।।

  5. रामाराव जाधव सुन्दरसी says:

    धन्यवाद मैडम जी हम सभी गाँव वाले आभारी हैं आप के।

  6. Indra Dikshit, Pune says:

    To much scope in Archaeology. Best wishes to U. Nice research papers.

  7. O P Mishra, Bhopal says:

    I have read the complete text and videos ,photographs related to sundarsi ancient site in Malwa region.raman Solanki and Prashant Puranikji are the scholar’s in that region.puranshahgal also give informative.your report on this topic needs no comment.excellent matter .regarding this arealocal folk songs are also be quite impressive.photographs are to be in the photo archives.now no serious scholars moving for such academic researches.thank you very much for your field work and taking interviews of the very senior citizens.you are adding new chapters in archaeology, social areas,art,architectures and religious fields.once again thank you very much for taking interest.

  8. देवेंद्र प्रजापति, सुन्दरसी says:

    जय श्री महाकाल

    आपके द्वारा भूत भावन महाकाल की नगरी सुन्दरसी (सुंदरगढ़) के अवन्ति के राजा विक्रमादित्य की बहन सुंदराबाई जिनका विवाह सुंदरगढ़ के राजा भगवत सिंह से हुआ था एवं उज्जैन में जितने भी मंदिर थे उतने मंदिर ग्राम सुन्दरसी (सुंदरगढ़) में बनाए गए, विक्रमादित्य की बहन सुंदराबाई रोज सुबह महाकाल मंदिर एवं अन्य मंदिरों में दर्शन करने जाती थीं, यह सभी जानकारी आपके द्वारा बड़ी ही सुन्दर सटीक सरल भाषा के प्रयोग के साथ वर्णित की गई है। इससे हमारी नई पीढ़ी को ज्ञान प्राप्त होगा एवं इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त होगी।

    इससे मैं आपको सहृदय प्रणाम करता हूँ।

    “जय श्री महाकाल”

  9. राम प्रसाद ' सहज ' शुजालपुर says:

    रोचक, श्रेष्ठ व संग्रहणीय ।
    ‘साहसिक कदम ‘
    ‘हार्दिक बधाई’
    👌✍️👌

  10. Umesh Pathak says:

    ब्रह्माण्डीय यात्रा में हमें कब कहाँ जाना होगा यह निर्णय तो उसके निर्माता और नियन्ता के हाथ में ही होता है। पर यात्रा के अनुभव को उस मार्ग के विश्राम स्थलों के सहयात्रियों के साथ साझा किया जाता है। ज्ञानवृद्ध सहयात्री अपने अनुभवों से अग्र गमक जनों के लिए पथ प्रदर्शक होते हैं। आदरणीय बहन श्रीमती दिशा अविनाश शर्मा भोपाल भी एक ऐसी सहयात्री हैं जो अपनी मार्ग दैन्दिनी (रोड डायरी) सृज कर वर्ण, ध्वनि, व चित्र पिपासुओं को सुरम्य सुखद उद्यान उपलब्ध करती हैं। उनका सुन्दरसा (सुन्दरसी) यान्त्रिक ग्रन्थ (ब्लाग) वन्दनीय व नमनीय है। विक्रमादित्य के काल से अब तक के अनगिनत सृजनधर्माओं के कर-चिन्हों व ध्वनियों के संग्रहीत और संयोजित कर रामायण रघुवंश, रामचरितमानस या कामायनी जैसा सृजन दिशा बहन आपने दिया है। इसमें इतिहास, साहित्य, संगीत और कला (नैसर्गिक दृश्य) सब कुछ समाहित हैं, इसलिए यह एक महाकाव्य है। तथा भारत भूमि के महाप्रतापी नृप विक्रमादित्य को श्रद्धावनत पुष्प गुच्छ हैं। मेरे जैसे अनुजों औद इतिहास, साहित्य, संगीत व कला अनुशीलकों को आपका लेखनीय वरद हस्त सदैव शारदीय व वासन्तिक रहे इन्हीं कामना व भगवान धरणीधर व माता गंगाजी से प्रार्थना के साथ।

    आपका अनुज,
    उमेश पाठक
    वासन्तीय नवरात्रि प्रतिपदा, वि0सं0 2077
    मौ0 चैदहपौर महीधर्राचन खडगगिरिमठ
    पो0 सोरों सूकरक्षेत्र
    जनपद- कासगंज उ0प्र0

  11. बालकृष्ण लोखण्डे, भोपाल says:

    रचियेता द्वारा तथ्यों परक अनुशोधों की तह परत दर परत स्थलों की अनुश्रुतियों/किंवदंतियों पर ही नहीं प्रमाणों को अपनी श्रृशुधा शांत करने के संकल्प में यथासंभव भ्रमणशील को नमन्ति स्वीकार हो।

  12. दिनेश झाला, शाजापुर says:

    🙏🏻🙏🏻 आपके द्वारा सम्पादित कार्य अत्यंत सराहनीय हैं। साधुवाद ।

  13. नारायण व्यास says:

    देखा और सुना। बहुत अच्छा शोध हैं एक सामान्य व्यक्ति भी समझ सकता है। सौलंकी जी ने जिस स्तूप के विषय मे उल्लेख किया है, कभी भविष्य मे मैं कभी देखने जाऊँगा। धन्यवाद

  14. Pirtam Singh Rathod says:

    बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार