उज्जैन और उसके आसपास का पुरावैभव दर्शाता विक्रम विश्वविद्यालय का अनूठा संग्रहालय-अध्ययनशाला

  उज्जयिनी पुरातन काल से कला, शिक्षा, विद्या और धर्म का केंद्र रही है। कनकश्रन्गा, विशाला, कुशस्थली, अवन्ति, पद्यावती, अमरावती,  प्रतिकल्पा नामों से अभिहित उज्जयिनी के  पुरावैभव का अवलोकन करने का सुअवसर पिछले दिनों मिला। भूतभावन महाकाल की अधिष्ठान भूमि तथा भूमि पुत्र मंगल की जन्मभूमि उज्जयिनी की आस्थावान प्रणाम्य धरा के यूँ तो कई बार दर्शन किये हैं लेकिन इस बार पुरातात्विक दृष्टि से परिपूर्ण उज्जैन के प्राच्य सिंधिया शोध प्रतिष्ठान के संग्रहालय और अध्ययनशाला के दर्शन करने का मानस बना। उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय के विक्रम कीर्ति मंदिर में स्थित अनुशीलन संस्थान के रूप में स्थापित यह शोध संग्रहालय विश्वविद्यालय में …

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10वीं-13वीं सदी की परमारकालीन पुरातात्विक सम्पदा वाला शाजापुर जिला

भोपाल से शाजापुर तक 10वीं से 13वीं सदी में परमार नरेशों के सांस्कृतिक उन्नयन के प्रतिमान चप्पे-चप्पे पर  सूरज भल ऊगियो तुम जागो शंकर जी हो देव, तुम जागो हो ब्रह्म जी हो देव, तुम जागो विष्णु जी हो देव, सूरज भल ऊगियो रंग रातो जी दुनिया में हुओ उजास। मालवी भाषा की मिठास से पगी पंक्तियाँ इसलिए स्मृत हो आईं थीं क्योंकि आज हम पश्चिम मालवा के पुरातात्विक व ऐतिहासिक महत्व के स्थलों की जानकारियाँ एकत्रित करने के उद्देश्य से यात्रा पर निकले थे। उधर आकाश में धरती के उत्स में सम्मिलित होने के लिए सूर्य देव पटका बांधकर उद्यत हो …

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सिक्के वाले डॉ. आर. सी. ठाकुर के साथ अंतरंग भेंटवार्ता और महिदपुर दर्शन  

भोपाल से महिदपुर की साढ़े तीन घंटे की यात्रा, अश्विनी शोध संस्थान के संस्थापक डॉ. आर.सी. ठाकुर से वार्तालाप   कोहरे का दुशाला ओढ़े मानो कोई सौभाग्यवती सवेरे-सवेरे सूर्य दीपक जला गई हो और हम उसे निरखते हुए भोपाल से महिदपुर की यात्रा पर निकले हों उषाकाल में यही स्थिति थी राजमार्ग क्र.SH-18 और NH-52  पर, लगभग 240 किमी का रास्ता तय कर आज हम सिक्के वाले डॉ आर सी ठाकुर के अवेक्षणीय संग्रहण के अवलोकक बनने के लिए भोपाल से निकले हैं। लगभग चार लाख सिक्कों के अप्रतिम संग्रह के संबंध में जानने और समझने के उत्कंठातुर हम उज्जैन के महाकाल वन क्षेत्र …

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देवबल्ड़ा के मंदिरों की पुनर्निर्मिति से पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा

यात्रा की शुरुआत – देवास और सीहोर जिलों की सीमा (जिसे ग्रामीणजन सरहद्दी पुकारते हैं) में स्थित देवबल्ड़ा लीजिये! आकाश के सुन्दर क्षितिज पर आ विराजे हैं सविता भगवान और हम भोपाल इंदौर राजमार्ग क्रमांक 18 पर भोपाल से  125 कि.मी. दूर स्थित विंध्यांचल पर्वत माला के नाभिस्थान और नेवज नदी के उद्गम स्थल देवबल्ड़ा के परमारकालीन मंदिर संकुल के अन्वीक्षण की उद्देश्य सिद्धि यात्रा पर निकले हैं। देवास और सीहोर जिलों की परिमा (जिसे ग्रामीणजन सरहद्दी पुकारते हैं) में स्थित देवबल्ड़ा का पहुँच मार्ग मालवा  को श्रीसंपन्न बनाने वाली सिंचाई की बारहमासी प्राणपद नदियों के दिग्दर्शन कराता चलता  है। सोंडा गांव के …

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राजा विक्रमादित्य की बहन सुन्दराबाई का गांव सुन्दरसी

यात्रा का प्रारम्भ : भोपाल से सुन्दरसी पहुँच मार्ग में अखंड सनातन सत्य सी ग्राम्य संस्कृति कभी-कभी अनजाने ठिकानों को हेरना (ढूँढना) बहुत भला लगता है, है न!! इसीलिए  मुँह अँधेरे सूरज के जागने से पहले  इस बार हम श्यामपुर चांदबढ़ से होते हुए SH 41 मार्ग पर छतनारे बबूल के हट्टे-कट्टे वृक्षों के बीच से निकलकर  मालवांचल के गाँवों में अखंड सनातन सत्य सी ग्राम्य संस्कृति और तोतों-मोरों वाले भव्य नैसर्गिक विलास को निहारते हुए आगे बढ़े जा रहे थे। शाजापुर जिले के अंतर्गत आने वाला सुन्दरसी कस्बा हमारी गंतव्य स्थली था। हमने सुन रखा था ईसवी की प्रथम सदी में …

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छोटी टेकाम के गोंड चित्रों में गूलर, महुआ, सरई और साजा के पेड़

ये तो आप भी मानेंगे कि प्रकृति के साहचर्य में पली-पुसी जनजातीय चित्रकला में परम स्वाभाविकता, सहजता और सरलता दृश्यमान होती है, कृत्रिमता का इसमें लेशमात्र भी स्थान नहीं होता। भोपाल स्थित जनजातीय संग्रहालय की लिखंदरा दीर्घा में गोंड बहुल डिंडौरी जिले के गाँव सनपुरी के अरण्यगामी संस्कृति के बिम्ब देखने का सौभग्य प्राप्त हुआ। रचनाकर्म में डूबी हुई चितेरी श्रीमती छोटी टेकाम हमें अपने गूढ़ार्थ लिए मौलिक कला संसार के साथ वहीं मिल गयीं। उनके स्वाभाव की निश्छलता ऐसी थी मानो किसी प्रशांत नदी में अपना प्रतिबिम्ब निहार रहे हों। लेकिन साक्षात्कार के दौरान ज्यों-ज्यों उनके विचार सामने आते गए लगा …

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मालवा के लोकनाट्य माच में राजा भरथरी का कथानक

लोकनाट्य, लोक की श्रमशील स्थितियों, संघर्षों, प्रकृतिजन्य बाधाओं और सामजिक आवश्यकताओं की भावभूमि पर यथार्थ की उपज होते हैं। भोपाल स्थित जनजाति संग्रहालय के सभागार में उज्जैन के खेमासा गाँव की महावीर माच मंडली के  राजा भरथरी के प्रदर्शन में हमने यही अनुभूत किया। मालवा के प्रतिष्ठित, समर्पित और मर्यादित माचकारों में गुरु सिद्धेश्वर सेन का नाम आदरपूर्वक लिया जाता रहा है। उन्हीं की कलमबद्ध रचना को मंचित करती राजा भरथरी की पारम्परिक प्रस्तुति में रंगतों, हलूर, लावणी और लोकधुनों के साथ झुरना का सराहनीय समन्वय दिखाई दिया। पौरुष प्रधान अभिनय और नृत्य की समन्विति वाली यह लोकनाट्य शैली मुक्त कण्ठ की …

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