लोक धारणा : राजा विक्रमादित्य के पिता राजा गन्धर्वसेन की गन्धर्वपुरी

राजा विक्रमादित्य

तालोद का सूरजकुंड, विक्रमादित्य का षष्टी पूजन का स्थान, मूलप्रकृति के छठे अंश से उत्तपन्न होने के कारण षष्टी देवी के प्रति गांव वालों में विशेष आस्था

सूरजकुंड, सोमवती नदी का उद्गमस्थल, षष्टी देवी के नाम से प्रसिद्ध सिद्धयोगिनी देवी स्वामी कार्तिकेय की पत्नी का मंदिर, तालोद के राम मंदिर,  हनुमान मंदिर और स्कूल भवन के पास रखी प्रतिमाएं 

गंधर्वपुरी की सहज स्वाभाविक देहाती जीवन शैली में रमते-रमाते ज्यों ही हम लौटने को हुए त्योंही गांव वालों ने हमें पांच किलोमीटर और आगे विक्रमादित्य की छठी के स्थान तालोद होकर भोपाल जाने का सुझाव दे दिया उनका मन रखते हुए हम उबड़ खाबड़ रास्ते से तालोद की ओर रवाना हुए केवल ट्रेक्टरट्रालियों के लिए नियत मार्ग पर विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं और सागौन के घने वृक्षों के बीच से होते हुए हम तालोद पहुंच गए। अब तक प्राप्त मालवा क्षेत्र के सर्वाधिक विस्तारित ‘जल कुंडों में से एक ’ सूरज कुण्ड की भव्यता हमारे समक्ष थी। वर्गाकार पूर्व से पश्चिम की ओर 140 फीट और उत्तर से दक्षिण की ओर 140 फीट लम्बान वाली भीतों से चतुर्दिक घिरा सूरज कुण्ड अनुमान है कि  मालवा क्षेत्र के जलकुण्डों से अपेक्षाकृत सबसे अधिक विशालित है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में परिगणित उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मदिर परिसर में स्थित जलकुण्ड से समानता लिए परमार कालीन सूरज कुण्ड पुराजानकार भूतपूर्व विधायक डाॅ. तेजसिंह सैंधव के अनुसार देवबल्ड़ा, गनौरा भरोसा, नकलन, ओखलेश्वर और देवास जिले के अन्य स्थानों में विद्यमान जल कुंडों से अधिक विशालकाय है डाॅ. सैंधव श्री व्ही.एम. पाण्डेय द्वारा जलकुण्ड के शिलाखण्डों पर शिल्पियों के नाम वाले शिलाक्षरों और शिलोत्कीर्ण चिन्ह सृदश आकृतियों के आधार पर सूरजकुण्ड के चतुर्दिश रखे शिलाखण्डों को परमार काल का बताते हैं। इस प्रक्षेत्र में विखण्डित परमारकालीन शिव मंदिर के भग्नावशेष दिखायी देते हैं। एक बीघा क्षेत्रफल में विस्तृत जलकुण्ड में ऐसी संभावना है कि 16 सीढ़ियां रही होंगी। अस्त व्यस्त प्रस्तर खण्डों के कारण अन्य सीढ़ियों की विद्यमानता अस्पष्ट सी हो गई है। परमार कालीन वास्तु युक्ति का अनुपम उदाहरण रहे इस सूरजकुण्ड के पश्चिम में शिवालय और शिलाक्षर युक्त सती स्तम्भ और पुजारियों की समाधियां हैं। आड़े और खड़े प्रस्तरों की पंक्तियों की जमावट अद्भुत है। जलकुण्ड के पाषाण खण्डों को लोहे के बंधनों से संयुक्त करने का भी विधान किया गया था ऐसा प्रतीत होता है। हमें यह पता चला कि गंधर्व पुरी से बहने वाली सोमवती नदी का उद्गमस्थल भी यहीं कुण्ड है यहीं सोमवती नदी बाद में काली सिंध नदी में समागमित हो जाती है। यहीं हमारी भेंट उत्साही जितेन्द्र सिंह (ठाकुर) सेंधव जी से हुई उन्होंने हमें बताया कि इस सेंधवा पटेल बहुल गांव के बच्चों के सूरजपूजन का कार्यक्रम षष्टी माता मंदिर में होता है जो सूरजकुण्ड के किनारे पर स्थित है।

मंदिर में षडभुजी देवी, कार्तिकेय को लिए हैं। उन्होंने अपने पुर्वजों से सुना है कि राजा गन्धर्व सेन कुंड में स्नान के लिए यहां आया करते थे विक्रमादित्य का छठी पूजन भी यहीं हुआ था ऐसा गांव वाले मानते हैं। भणयाँ भराई की परिपाटी से लेकर भभूतिया के निवारण हेतु जल कुण्ड की महत्ता आस-पास के गावों में भी रही है। पौराणिक महत्व के इस जलकुण्ड के समीप स्थित भव्य मंदिर में प्रतिष्ठित बालकों की अधिष्ठात्री षष्टी देवी को पूजने की परम्परा है नवजात शिशुओं को लेकर महिलाएं परिवार सहित यहां आती हैं साथ ही छठी महोत्सव का आयोजन होता है। मूलप्रकृति के छठे अंश से उत्तपन्न होने के कारण षष्टी देवी के नाम से प्रसिद्ध देवी स्वामी कार्तिकेय की पत्नी है। बालकों को दीर्घायु बनाने और उनकी सुरक्षा करने वाली देवी सिद्धयोगिनी देवी मानी जाती हैं। पोथियों में इन्हें विष्णु माया अथवा बालदा भी कहा गया है। मातृकाओं में देवसेना के नाम से प्रसिद्ध देवी के प्रति गांव वालों में विशेष आस्था है। जीतेन्द्र बताते है कि पवनगुराड़िया से लेकर तालोद तक एक पाल बना हुआ है पर आज तक अनेक प्रयत्नों के बाद भी ताल के पानी को प्रशासन रोक नहीं पाया है। गांव वालों ने हमें यह भी बताया कि गंधर्वपुरी की सीमाएं पहले कभी तालोद तक हुआ करती थीं। दो गाँवो के बीच बनी गुफा के माध्यम से राजा गन्धर्वसेन जलकुण्ड तक आकर स्नान ध्यान करते थे। लोक तो गुफा के द्वार पर ताला लगाने से तालोद के नामकरण को भी जोड़ कर देखता है। हम जलकुण्ड की पश्चिमी दिशा में विशालकाय इमली के वृक्ष के नीचे रखी खण्डित नवग्रह प्रतिमा को देख पा रहे थे। एक फीट 10इंच लम्बाई लिए प्रतिमा के दाई ओर वीणाधर शिव उत्कीर्ण थे। साढ़े चार हज़ार गांववासियों वाले तालोद गांव में परमारकालीन शिल्प बहुतायत से हैं गांव में स्कूल भवन के निकट चौसठ योगिनी देवी प्रतिमाएं, हनुमान जी के ओटले पर और राम मंदिर परिसर में पुरातात्विक महत्व की अनेक प्रतिमाएं सुरक्षित हैं। जिन्हें गॉंव वाले चौसठ योगनी माता के नाम से पूजते हैं। त्रिमुखी ब्राहमणी प्रतिमा, लक्ष्मी, अश्वमुखी देवी, पंचातपाश पार्वती, कृशोदरी चामुण्डा देवी की प्रतिमाओं का इस क्षेत्र से मिलना यह दर्शता है कि पूर्व मेुं तालोद गांव चौसठ योगिनी देवियों की पूजास्थली रहा होगा। जलकुण्ड के पश्चिम में इमली के वृक्ष के नीचे रखे ध्वंसावशेषों में विशाल पार्वती प्रतिमा का कबंध दिखाई देता है। जंघा पर गणेश को गोद लिए ललितासन के विराजी पार्वती की प्रतिमा, सूपकर्णी गणेश, दशमुंडी गणेश ऋद्धि सिद्धि के साथ ललितासन में विराजे हुए, शिवजी की त्रिमुखी प्रतिमा, और सुखासन में चतुर्हस्त वीणाधर शिव, नृत्यरत शिव का विशाल ललाट बिम्ब का मिलना परमारकालीन शिल्प वैभव को दर्शता है। निकट स्थित सतीस्तम्भ पर हमने देखा कि दो योद्धाओं को घोड़े पर सवार दिखाया गया है। सिंदूरलेपन के कारण कदाचित आकृतियां धुंधला गयी हैं। संभवतः यह सती स्तम्भ या तो आक्रान्ताओं द्वारा मंदिर को ध्वस्त करने अथवा मंदिर को संरक्षित करने वाले दो योद्धाओं का है। जीतेन्द्र ने हमें बताया कि ऐसा ही एक अन्य सती स्तम्भ मंदिर से कुछ दूरी पर एक खेत के मध्य में स्थित है। जिसे देखना हमारे लिए किसी अनुभव से कम नहीं था। अब हम सोचने को विवश थे कि गंधर्वपुरी से लेकर तालोद तक का इतिहास लोक साक्ष्य लिए कही अनकही कथाओं पर आधारित है। इन गॉवों को समझने के लिए लोक मान्यताओं और इतिहासधारित साक्ष्यों की विवेचना की समदृष्टि विकसित करनी होगी तभी किसी निष्कर्ष तक पंहुचा जा सकता है।

९० वर्षीया केसर बाई के लोकगीतों में आज भी राजा गन्धर्वसेन के प्रति श्रद्धा भाव

लौटते समय मंदिर परिसर में बैठी मालवी में गंधर्वसेन के भजन गाती 90 वर्षीया केसर बाई के स्वरों की मिठास देवास जिले से निकलने वाली कालीसिध के प्रवाहमान नीर तक——– नहीं, गांव की संकरी गलियों की मेड़ तक ——नहीं अनुपम प्राकृतिक ग्राम्य सौंदर्य तक ——– नहीं बल्कि इन्दौर के रास्ते भोपाल लौटते वक्त देर तक आलोड़ित करती रही। एक गांव अपने भीतर कितना कुछ समेंटे हैं अब तक आप समझ गये होगे। ग्रामीण पर्यटन को ध्यान में रख कर गंधर्वपुरी एक देखने उपयुक्त स्थान है जहां पुरातत्व, इतिहास, ग्राम्य जीवन और मालवी संस्कृति की सुवास है।

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Comments

  1. O P Mishra says:

    Wow! Well written and finely executed. You proved that Gardbhilla was Vikramaditya’s father. You are on the footsteps of Mrs devala Mitra DGA SI. Taking forward the interest in the field of art culture,and archaeology.
    Congratulations!

  2. दिनेश झाला says:

    काफी समय बाद आपकी गन्धर्वपुरी पर रचना पढने के बाद बहुत आनंद आ गया धन्यवाद आभार।
    -दिनेश झाला शाजापुर ।🙏🏻🙏🏻👏👏

  3. Shyam says:

    दीदी नमस्कार.केसर बाई के लोकगीत मे आनंद आ गया आपके द्वारा हमे कई सारी एतिहासिक जानकरी प्राप्त हुई आपका आभार.आपको बधाई.

  4. वीरेंद्र सिंह says:

    ऊँ नमः शिवाय आपका नया ब्लाग पढ़ कर अति प्रसन्नता हुई परन्तु उससे अधिक जिज्ञासा बढ़ गयी गन्धर्व पुरी के बारे में एक ऐसे प्रतापी राजा और वंश के बारे में जिन्होंने परमार वंश की नीव रखी जिनका साम्राज्य मध्य भारत से दक्षिण भारत तक फैला हुआ था जिनके वंशज एक महान सम्राट विक्रमादित्य हुए तो दूसरे राजा भर्तृहरि जिन्होने हिन्दू धर्म का मार्ग दर्शन किया, सबसे बड़ी बात जो आपके शोध से सामने आयी कि किस प्रकार पहले के इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के साथ घोर अन्याय किया है आपने जिस तरह से पूरी प्रमाणिकता के साथ तथ्यों को सामने लाने का प्रयास किया है शायद इससे आने वाले समय में भारत का प्राचीन इतिहास पुनः एक बार ऐसे ही शोध के साथ देश दुनिया के सामने लाने की आवश्यकता है, आज की जो युवा पीढ़ी जिसको अपने गौरव शाली इतिहास को ना तो बताया गया और ना तो दिखाया गया ऐसे छात्रों के लिए आपका ये लेख किसी अमूल्य खजाने से कम नहीं हैं पर मेरा उन छात्रों से भी निवेदन है कि वे आपका लेख सिर्फ पढ़े नहीं बल्कि गंधर्वपुरी आकर स्वयं अवलोकन भी करे ।इतिहास में प्रामाणीकता सिर्फ किताबों के अन्दर नहीं बल्कि भारत के लोककथाओं में व लौकक्तियो में भी भरे पड़े हैं । जिसको ये पश्चिमी मानसिकता वाले इतिहासकारों ने बड़ी चालाकी से नकारने की कोशिश की । मेरे विचार से आपका ये लेख राजपूत वंश में परमार वंश को और अधिक गहराई से जानने में सहायक सिद्ध होगा ।गंधर्वपुरी को सरकार को विश्व धरोहर स्थल व पर्यटक स्थल घोषित करना चाहिए जिससे भारतीय अपने गौरव शाली इतिहास को जान सके व राज्य का भी आर्थिक विकास हो ।

  5. कमलेश बुन्देला says:

    अति सुन्दर जानकारी
    कमलेश बुन्देला

  6. दयाराम सिरोलिया says:

    बहुत ख़ूब दीदी
    दयाराम सिरोलिया देवास

    1. Rajendra Kumar Malviya says:

      दीदी आप बहुत अच्छा लिखती है, मैं आपका फैन हूँ और हमेशा आपके सारे लेख पढता हूँ। दीदी आपका बहुत अच्छा प्रयास है जो महाराजा विक्रमादित्य और उनसे जुड़े विभिन्न अनछुए पहलुओं को लोगो को बता रही है। दीदी गंधर्वपुरी और राजा गंधर्वसेन के बारे में पढ़कर बहुत अच्छा लगा, मानो इतिहास से महाराजा विक्रमादित्य, गंधर्वसेन और उनकी गन्धर्वनगरी को फिर से जीवंत कर दिया हो आपने दीदी।

  7. जितेंद्र सिंह सेंधव, तालोद says:

    दिशा जी शर्मा आपके द्वारा सोनकच्छ तहसील के ग्राम तालोद में आकर सूरजकुंड और माता सृष्टि देवी पर जो लेख लिखा है वहां गौरवशाली है आप आगे और इसी प्रकार प्रयास कर इसे पुरातत्व विभाग तक ले जाने का प्रयास करें।

  8. O p Mishra says:

    Good morning,I have read all about gandharvapuri,temple,sculptures,mythology,interviews othe locals,historian,archaeologist,these are excellent matter for new generations.new young archaeologist must see the survey of the sites.mam you have given the complete chronologies of this makes region.this main site was the famous for jainism, Hindu but no remains of buddhist.there are satisfied memorials which prove the late historic remains.if you have some yogini sculptures in talod,it will be a great for researcher.please see once again this site.without prove we can say the rare discoveries.please see the report of Cunningham volume, he might have written some thing.saptamatrikas are also a part of 64yoginis.wait for new evidences.thanks for sending this matter to me.