पश्चिम बंगाल की लोक नाट्य शैली “भवानी जात्रा” में महिषासुरमर्दिनी

चतुरदंत गजारूढ़ वज्रपाणि पुरन्दरः ।
सचिपतिस्थ धातव्य नानावरण: भूषित: ।।

यह श्लोक देव राज इंद्र के इंद्रलोक में प्रवेश के समय प्रयुक्त किया गया।आदित्यह्रदयस्त्रोतम के चौथे और सोलहवें पाठ के श्लोकों का यथास्थिति प्रयोग किया गया ।

आदित्य हृदयं पुण्यं, सर्वशत्रु विनाशनम्‌ ।

जयावहं जपं नित्यं, अक्षयं परमं शिवम्‌ ।।

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः।।,

महिषासुर संग्राम में भवानी जब थकान का अनुभव करती हैं तब वें देवाधिदेव महादेव द्वारा प्रदत्त अमृत का पान करती हैं  उस समय जिस श्लोक का उच्चारण करती हैं उसका भी जात्रा में समुचित प्रयोग हुआ।

गर्जः गर्जः शंङ्ग मोड़: मधुयावत् पिवाम्यहं ।
मायत्वीव: हततत्रयीव: गर्जेशंतराशु देवता ।।

इन श्लोकों के साथ लोक नाट्य का शास्त्रीय पक्ष उजागर हुआ।

रंगमंच की दुनिया से लम्बे समय से जुड़े शुभोजीत रवीन्द्रनाथ टैगोर और मेघनाथ भट्टाचार्य के नाटकों का प्रस्तुतीकरण करते रहे हैं। अपनी माँ श्रीमती सुप्रिया हलदर के साथ  रवींद्र संगीत और शास्त्रीय संगीत का अनुशीलन कर चुके शुभोजीत छुटपन से ही बंगाल की जात्राओं में संगीत चर्चक के रूप में सम्मिलित होते रहे ।संस्कृत श्लोकों से देवी की अराधना प्रतिदिन करने वाले बंगाली समुदाय के कारण शुभोजीत के अनुसार संस्कृत के क्लिष्ट संवादों के प्रस्तुतिकरण में उन्हें और उनके सहकलाकारों को किंचित समस्या नहीं आयी। यद्यपि इससे पहले माता शीतला की प्रस्तुति में बांग्ल भाषा के प्रयोग का इच्छित प्रतिसाद न मिल पाने के कारण व्यथित शुभोजीत ने इस लोकनाट्य की प्रस्तुति में हिंदी के सरल शब्दों का प्रयोग किया। हमने कार्यक्रम की समाप्ति पर शुभोजीत हलधर से पश्चिम बंगाल की ‘जात्रा’ लोकनाट्य शैली के संदर्भ में चर्चा की उन्होंने बताया कि जात्रा से तात्पर्य है संकीर्तन यात्राओं के माध्यम से लोकधर्मी लोकोपयोगी विचारों को लोकलीलाओं के रूप में लोकरंजन की दृष्टि से लोकमन को उपलब्ध कराना। इस लोकनाट्य शैली के उद्भव को लेकर प्रमाणिक साक्ष्य नहीं मिलने से यह कब प्रचलन में आई यह बता पाना शुभोजीत के लिए कठिन था लेकिन इतना तो निश्चित है कि वेद, उपनिषद और पुराण की मौखिक या वाचिक परंपरा ही लिखित साहित्य के मूल में रही हैं।लम्बे तथा कथा प्रधान लोकगीतों के तत्काल बाद लोकनाट्य का आविर्भाव हुआ ,एक प्रकार से लोकगीतों में वर्णनात्मकता जब मात्र वाचिक न रहकर आंगिक हो गई तब नाट्य शैली का सूत्रपात हुआ।पहले तो नाटक का स्वरूप गीतात्मक ही रहा फिर काव्यात्मक होते हुए गधात्मक हो गया   शुभोजीत और उनकी संस्था फरवरी से अगस्त तक कोलकाता  में आयोजित ऐसी ही जात्राओँ में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती है।

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Comments

  1. डॉ शैल श्रीवास्तव ,गीतांजलि कॉलेज,भोपाल says:

    दिशा जी आपके द्वारा लिखा गया ये ब्लॉग बहुत ही बढ़िया हे एकदम सटीक। आपको धन्यवाद की आपने हम सबको पश्चिम बंगाल के इस लोक नाट्य शैली “भवानी जत्रा” से परिचित कराया।
    वीडियो देखने पर आपकी लेखनी उसके साथ चलती नजर आईं। भाषा में तारतम्य कहीं भी टूटता नहीं हे। मां महिषासुर मर्दिनी के क्रोध का संपूर्ण वर्णन बहुत ही सुंदर किया गया हे। अंत में ,
    एक संदेश भी प्रतीत होता है कि सब रिश्तों में मां का स्थान सबसे ऊंचा हे।

  2. शुभोजीत हलदर says:

    Thank u so much ma’am…
    Bahot accha laga…
    Bahot i accha lika ma’am
    Thank u ma’am thank u so much….🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻💐

  3. राम जूनागढ़ says:

    Cભવાની જાત્રા કા પરિચય સુંદર તરીકે સે કરવાને કે લિએ ધન્યવાદ. લોકકલાઓકે બારેમે આપને પુખ્તા જાનકારી પ્રાપ્ત કરકે પીરસી હૈ.
    યા શકિત સર્વ ભૂતેષુ માતૃરુપેણ સંસ્થિતા,
    નમ : તસ્યૈ , નમ : તસ્યૈ , નમ : તસ્યૈ.