लोकरंजन में शिव – राजस्थानी कूचामणि ख्याल, बघेली गीत, निमाड़ी गणगौर नृत्य

लोकरंजन में शिव

लोकतत्वों की विद्यमानता लिए लोककाव्य जो सहृदय श्रोताओं को हिलराते व दुलराते हैं उनमें जो लोकत्व है वहीं उन्हें लोक चर्चित बनाता है। लोक शब्द ऋग्वेद और अथर्ववेद में भी दिव्य और पार्थिव दो अर्थों में अर्थापित हुआ हैं ब्राह्मण ग्रन्थों के अतिरिक्त भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में भी लोक धर्म प्रवृत्ति का उल्लेख मिलता है। ग्राम्य जीवन की सहज-सरल रसमाधुरी में सिरजे लोककाव्य में क्षेत्र विशेष के सांस्कृतिक, सामाजिक,पारिवारिक परिवेश की लोकाभिव्यक्ति होती है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तानांतरित होती रहती है। बहुधा लोकसंस्कृति के संवाहक लोकगीतों और लोक अख्यायिकाओं में देवी-देवताओं के प्रति लोक मानस की अटूट आस्था परिलक्षित होती …

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