लोकरंजन में शिव – राजस्थानी कूचामणि ख्याल, बघेली गीत, निमाड़ी गणगौर नृत्य

लोकरंजन में शिव

लोकतत्वों की विद्यमानता लिए लोककाव्य जो सहृदय श्रोताओं को हिलराते व दुलराते हैं उनमें जो लोकत्व है वहीं उन्हें लोक चर्चित बनाता है। लोक शब्द ऋग्वेद और अथर्ववेद में भी दिव्य और पार्थिव दो अर्थों में अर्थापित हुआ हैं ब्राह्मण ग्रन्थों के अतिरिक्त भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में भी लोक धर्म प्रवृत्ति का उल्लेख मिलता है। ग्राम्य जीवन की सहज-सरल रसमाधुरी में सिरजे लोककाव्य में क्षेत्र विशेष के सांस्कृतिक, सामाजिक,पारिवारिक परिवेश की लोकाभिव्यक्ति होती है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तानांतरित होती रहती है।
बहुधा लोकसंस्कृति के संवाहक लोकगीतों और लोक अख्यायिकाओं में देवी-देवताओं के प्रति लोक मानस की अटूट आस्था परिलक्षित होती है। उसमें भी विशेष रूप से सृष्टि संहार के प्रणेता मंगलमय शिव तो पूर्ण श्रद्धा से विराजे दिखते हैं। प्राकृतिक प्रकोपों से रक्षणार्थ पूजित शिव आध्यात्मिक साधना करने वाले तत्वज्ञानी से लेकर जन-जन के परमाराध्य हैं उनके प्रति तीव्र आसक्ति लोक मन में उपजती है, लोक भावों के रूप में लोकधुनों में ढलकर लोकगायकों के कंठ से निस्रत होकर लोकरंजन का माध्यम बनती है।
ऐसे ही आयोजन के दर्शक बनने का हमें सुअवसर मिला सोचा आपसे साझा करूं। भोपाल स्थित जनजातीय संग्रहायल के सभागार में राजस्थानी लोक नाट्य शैली कूचामणि ख्याल में निबद्ध भक्त पूरणमल का मंचन हुआ। भक्तवत्सल भगवान शिव के परम भक्त पूरणमल की विषयवस्तु सियालकोट के राजा शंखभाटी और उनकी दो पत्नियों पद्मावती और लूनादेय के आस पास घूमती है। सौतेली मां लूनादेय ईष्यावश पूरण मल की शिवभक्ति की परीक्षाएं लेती रहती है। खेल के अंत में षडयंत्र रचकर वह पूरणमल की हत्या करवा देती है। पुत्रवियोगी मां का करूण विलाप मां पार्वती को द्रवित कर देता है और वे सच्चिदानंद परमेश्वर से पूरणमल को जीवन दान देने का अनुनय निवेदन करती हैं फलस्वरूप  महेशान अपने भक्त को जीवितवस्था में ला देते हैं। हत्यारी लूनादेय दण्ड की अधिकारी होती है। मूल कथा को कूचामणि ख्याल दल श्री दयाराम भाण्ड और उनके साथियों ने शेर, दोहे, छप्पय, सोरठ और बाइस मात्राओं वाले कवित्त के साथ लोकगीतों में ऐसी निपुणता से पिरोया यों लगा मानों राजस्थानी लोकसंस्कृति की अजस्त्र लोकधाराएं सभागार में सतत प्रवाहमान हों गई हों।

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Comments

  1. सुरेश अवस्थी says:

    काफी शोध और गहन अध्ययन के बाद लिखा गया है यह आलेख। लोककाव्य और लोकनाट्य का अद्भुत सम्मिश्रण दिखा नाट्य प्रस्तुतियों में।
    उत्तम ब्लॉग
    साधुवाद।

  2. Pratishrut says:

    अद्भुत! भारत को जानने के लिये एक जीवन कम है ।

  3. संजय महाजन says:

    बहुत ही सुंदर है।
    संजय महाजन

  4. रोशनी प्रसाद मिश्रा says:

    🙏🌷🙏सुन्दर आलेख
    रोशनी प्रसाद मिश्रा

  5. कौशिके राजेंद्र says:

    बहुत ही सुंदर और विशेष पूर्ण लेखन

  6. O P Mishra says:

    Excellent article on shiva as depicted through cultural performances.shiva history starts from pre history to the modern times.you have explain in detail through religional languages.you must continue with other gods and goddesses.badhai jaldi road dairy ke liye..thanks.
    O P Mishra, Bhopal

  7. वीरेन्द्र सिंह says:

    लोक रन्जन में भगवान शिव के ऊपर आपका लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा ,मंचन में राजस्थानी-भाषा में भगवान शिव और पार्वती जी से दर्शक को जोडने का सात्विक प्रयास बहुत ही सराहनीय है आज के इस व्यस्त और कलयुगी जीवन में आपका एक प्रयास प्रशंसनीय है ।