देश का एकमात्र संस्कृत वृंद (बैण्ड) और आदिशंकराचार्य की रचनाएँ

ब्रह्म सत्यस्य सत्यम् यही भारतीय आस्थावादी दृष्टिकोण – स्वामी मुक्तानंद पुरी

देश के हृदय स्थल मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के जनजातीय संग्रहालय में आयोजित शंकर व्याख्यानमाला के अन्तर्गत भक्ति आंदोलन में संतों की वाणी में अद्वैत दर्शन विषयक उद्बोधन में आदरणीय स्वामी मुक्तानंद पुरी जी ने परमतत्व से उद्भूत सृष्टि का पर्यवसान् भी उसी में निहित है कहकर संत रैदास तुलसी, सूरदास, कबीर, संत दादू दयाल और गुरु ग्रन्थ साहिब में निरुपित  विराट ब्रह्म की विश्व व्यापक संकल्पना को दोहराया। कार्यक्रम का आयोजन आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास ने किया था।
सम्मान्य स्वामी मुक्तानंद पुरी जी ने कहा कि मध्यप्रदेश की धरती का महात्म्य इतना अधिक है यहीं श्री कृष्ण को उज्जैन में अपने गुरू संदीपनि का सानिध्य मिला और आदि शंकराचार्य को ओकारेश्वर में गुरू गोविंद पाद का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। उन्होंने बताया कि संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम की वाणी भी परम तत्व में ब्रह्म और आत्मा की एकता घोषित करती है। ब्रह्म सत्यस्य सत्यम् यही भारतीय आस्थावादी दृष्टिकोण है। उन्होंने आचार्य शंकर द्वारा विवेक चूड़ामणि में प्रतिपादित मोक्ष की प्राप्ति हेतु भक्ति ही प्रशस्त मार्ग है को सरल शब्दों में व्याख्यायित किया। भक्ति प्रेम है अमृत स्वरूपा है। उन्होंने शंकर को परम भक्त बताते हुए शुद्ध चेतन की अवधारणा को भी समझाया। अपने संभाषण का समापन स्वामी जी ने यह कहकर किया कि जब तक सूर्य और चांद देदीप्यमान हैं तब तक शंकर का अमिट प्रभाव विद्यमान रहेगा।

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  1. मेरी यात्रा : दिशा जी की लेखनी

    अद्भुत आलेख; आज भी ऐसे पत्रकार हैं, जो किसी विषय का इतना सूक्ष्म अध्ययन और विश्लेषण कर पाते हैं और उसे उतनी ही सुन्दर भाषा में पिरो पाते हैं। श्रीमती दिशा जी का बहुत आभार, जो आपने एक टेलीफोनिक इंटरव्यू के लिए इतनी प्रतीक्षा की क्योंकि मेरी बहुत दिलचस्पी नहीं होती इंटरव्यू देने में। क्योंकि बहुत से पत्रकार बिना किसी रिसर्च किए ही मेरा साक्षात्कार चाहते हैं। परंतु आपने हमारी प्रस्तुतियाँ भी देखीं, अध्ययन किया, फिर साक्षात्कार लिया और अन्त में इतनी सुन्दर शब्दावली में उसे गढ़ा।

    सादर।