देश का एकमात्र संस्कृत वृंद (बैण्ड) और आदिशंकराचार्य की रचनाएँ

संस्कृत की शाश्वतता को युवाओं तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम है ध्रुवा संस्कृत वृंद(बैंड)

कार्यक्रम के दूसरे चरण में डाॅ. संजय द्विवेदी के निर्देशन में ध्रुवा संस्कृत वृंद(बैंड) ने अपनी अभिनव प्रस्तुतियों से दर्शकों को अत्यानंद की स्थिति में ला दिया। संस्कृत वांडगमय से निकली ऋग्वेद की ऋृचाओं, आदिशंकराचार्य के श्लोकों, बहुश्रुत रचना भज गोविन्दम और गणेश वंदना जैसी कर्णप्रिय सांगीतिक रचनाओं ने हृदय को तरंगित कर दिया।  द्विवेदी जी की अगुवाई वाले संस्कृत बैण्ड ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। पारंपरिक अनुष्ठानिक परिधान धारी तबले पर स्वप्निल बागुल, वायलिन पर यशवंत राव, बांसुरी पर राकेश सातनकर, कीबोर्ड पर सागर,  गिटार पर विजय गौर, अकोस्टिकड्र्म पर सनी शर्मा,  सहगायक पीयूष पौराणिक, ज्ञानेश्वरी और वैभव संतोरे ने अपने-अपने कौशल से सुनने वालों को यह जतलाया कि साहित्य का मुख्य कार्य तो द्रवण ही है फिर चाहे वह श्रवण से हो या दर्शन से।

हमने उत्सुकतावश संस्कृत भाषा के उन्नयन के निमित्त बने विश्व के एकमात्र संस्कृत बैण्ड के संस्थापक डाॅ. संजय द्विवेदी से बात कर जानकारी ली। उन्होंने हमें बताया कि ध्रुवा एक विचार है पीढ़ी अंतराल को पाटने का, संस्कृत एक ऐसी भाषा है जिसकी सत्ता कभी समाप्त नहीं हो सकती उसकी इसी शाश्वतता को युवाओं तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम है ध्रुवा। ऐसे समय में जब युवा राष्ट्र भाषा हिंदी को अपनाने से कतरा रहे हों डॉ द्विवेदी संस्कृत को नए आयाम देने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देते है।

यावत् भारत वर्ष स्यात् यावतः विन्ध्य हिमाचलै।

यावत् गंगा व गोदा च तावदेव ही संस्कृतम्।

भारतीय संस्कृति दर्शन और संस्कारों की पुनः प्रतिष्ठा के लिए कृत संकल्पित डाॅ. द्विवेदी से हमने ध्रुवा नामकरण के संदर्भ में जानकारी चाही तो ज्ञात हुआ कि द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व रचित नाट्यशास्त्र के आचार्य भरतमुनि के स्वरों से संस्कारित निबद्ध पदों अथवा गीतों को ध्रुवा की संज्ञा दी गई थी। उस काल में वर्ण अलंकार और लय के परस्पर समन्वय का आश्रय लेकर बने ध्रुवा गान तथा जाति गान ही प्रचलित हुआ करते थे। राग गान की परंपरा की निष्पत्ति  बहुत बाद में हुई।  नाट्यशास्त्र में गायन, वीणा वंशी-मृदंग इत्यादि वाद्यों का समवेत प्रदर्शन कुतप कहलाया और यही कुतप ही ध्रुवा बैण्ड का मूलाधार बना। अब तक 250 से अधिक सफल प्रस्तुतियां दे चुके डाॅ. द्विवेदी के संस्कृत प्रेम को लेकर प्रश्न करने पर यह विदित हुआ कि अपने बाल्यकाल से ही द्विवेदी संस्कृत अध्यापक पिता से संस्कृत में वार्तालाप किया करते थे। उनकी संस्कृत के प्रति मोहासक्ति तदनन्तर भी रही।  सागर स्थित डाॅ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय से एम ए संस्कृत में प्रावीण्य सूची में स्थान और प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी के मार्गदर्शन में संगीत शास्त्र में पी.एच.डी. उपाधि अर्जित करने के उपरान्त उन्होंने ग्वालियर घराने के अग्रणी गायक सज्जन लाल ब्रम्हभट्ट  और पं. कुमार गन्धर्व जी की वरिष्ठ शिष्या  प्रो. मीरा व्ही राव जी से शास्त्रीय संगीत की बारिकियां सीखीं। राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान भोपाल में समन्वयक के पद पर सेवारत रहे डाॅ. द्विवेदी ने अपने कौशल्य का परिचय देते हुए अभिज्ञान शाकुंतलम, विक्रमों व वर्शियम, उत्तररामचरितम, मालतीमाधवम्, मृच्छकटिकम, प्रसन्नराघवम, मध्यमव्यायोग, हास्यचूडामणि, प्रबुद्ध रौहिणेयम्, प्रेमपीयूषम्, कनुप्रिया, मशकधानी आदि नाटकों के संगीत निर्देशन का दायित्व संभाला।

एन.एस.डी. दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय भारगम और विश्व वेद सम्मेलन, राष्ट्रीय कौमुदी महोत्सव जैसे प्रतिष्ठित कार्यक्रमों में उनकी प्रतिभा को विशेष सराहना मिली। संगीत शास्त्र और नाट्य शास्त्र से जुड़े अनेक प्रतिष्ठापूर्ण सम्मानों और पुरस्कारों से पुरुस्कृत  डाॅ. द्विवेदी की कलायात्रा अबाधित जारी रही। डाॅ. द्विवेदी ने संस्कृत साहित्य की कालजयी रचनाओं श्रीशिवपंचाक्षरस्तोत्रम् (आद्यशंकराचार्य), नर्मदाष्टकं, गङ्गाष्टकम (आद्यशंकराचार्य),  तव न जाने ह्रदयं (महाकवि कालिदास) के अतिरिक्त प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी जी की गीताधीवरं नौकां स्वकीयां तारय, परामये धीवर हे! और श्रीनिवास रथ जी की जय-जय मध्यप्रदेश जय हे! की भी प्रस्तुति दी।  उनका मानना है कि संगीत और संस्कृत पूरक हैं संगीत यदि मध्यमा है तो संस्कृत वैखरी (वैदिक मन्त्रों  के जाप  के प्रकार) है। इसी लिए वे संस्कृत को संगीत की राग रागिनियों के साथ सम्मिश्रित कर जन- जन का गान बनाने के लिये प्रयासरत रहें हैं। हमने देखा उनकी अनुभूतियां जब मुखरित होती हैं तब सार्थक प्रभाव छोड़ती हैं इसलिए भी क्योंकि वे नाट्य शास्त्र में पारंगत हैं वे मंच पर से ही सामने बैठे दर्शकों से संवाद स्थापित कर पाते हैं।

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Comments

  1. मेरी यात्रा : दिशा जी की लेखनी

    अद्भुत आलेख; आज भी ऐसे पत्रकार हैं, जो किसी विषय का इतना सूक्ष्म अध्ययन और विश्लेषण कर पाते हैं और उसे उतनी ही सुन्दर भाषा में पिरो पाते हैं। श्रीमती दिशा जी का बहुत आभार, जो आपने एक टेलीफोनिक इंटरव्यू के लिए इतनी प्रतीक्षा की क्योंकि मेरी बहुत दिलचस्पी नहीं होती इंटरव्यू देने में। क्योंकि बहुत से पत्रकार बिना किसी रिसर्च किए ही मेरा साक्षात्कार चाहते हैं। परंतु आपने हमारी प्रस्तुतियाँ भी देखीं, अध्ययन किया, फिर साक्षात्कार लिया और अन्त में इतनी सुन्दर शब्दावली में उसे गढ़ा।

    सादर।