देश का एकमात्र संस्कृत वृंद (बैण्ड) और आदिशंकराचार्य की रचनाएँ

डॉ द्विवेदी से चर्चा में यह भी पता चला कि एक ओर सतत् पांचों वर्षों तक उनके द्वारा परिकल्पित संस्कृत नाटक को संस्कृत नाट्य महोत्सव में विजेता होने का गौरव मिलता रहा दूसरी ओर अपार सफलता भी उन्हें परितुष्ट नहीं कर पा रही थी। देव वाणी संस्कृत के पुनरूत्थान के लिए दृढ़संकल्पित डाॅ. द्विवेदी के मन में विचारों का अन्तरद्वंद चल रहा था। संघर्ष के पार ही भविष्य है यह सोच कर वे अवसाद की स्थिति में भी दृढ़ता से खड़े रहे बल्कि अपनी कल्पना और आकांक्षा को विस्तार भी देते रहे, कुछ नया करने की चाहना ही ध्रुवा की संस्थापना का कारण बनी।  सृजन के क्षणों में हर सर्जक इस प्रश्न से दो चार होता ही है कि वह जो सर्जना कर रहा है उसका उद्देश्य क्या है। कला के क्षेत्र में कोई विधान अंतिम नहीं होता सो उन्होंने  ध्रुवा बैण्ड के माध्यम से नयी उदीयमान प्रतिभाओं का चयन किया जो वृन्द के आकार लेने के लिए आवश्यक भी था। ऐसे ही बसंत पंचमी के पुनीत दिन चार वर्ष पूर्व ध्रुवा बैण्ड की सृष्टि हुई। हरदा, टिमरनी के यशवंत राव, सारणी के राकेश और रायसेन के विजय गौर उनसे जुड़े। उनकी जीवन संगिनी ज्ञानेश्वरी भी वृंद का हिस्सा बनीं। छोटे शहरों से संगीत की पृष्ठभूमि वाली प्रतिभाओं को चुन कर उन्हें माँजने का कार्य डाॅ. द्विवेदी ने स्वयं किया। दक्ष प्रतिभाएं उनके अनुसार प्रारम्भ में संस्कृत बैंड के भविष्य के प्रति सशंकित हो कर बैंड से जुड़ने से बचती रहीं, दमोह जिले के हटा में हुई परवरिश ने डॉ द्विवेदी को छोटे शहर के प्रतिभा सम्पन्न युवाओं से जोड़ा। वे मानते हैं कि संस्कृत भी नगरों की उपज नहीं है एकांत वन में प्रकृति के प्रांगण में तपस्वियों की साधना का प्रतिफल है संस्कृत अतः वाद्य मण्डली में गावों के युवाओं को प्राथमिकता दी गई। अर्थ संकट से जूझते बैंड को संघर्ष काल में संस्कृत भाषा की दुरूहता को लेकर भी समस्याओं का सामना करना पड़ा, लेकिन धीरे-धीरे सफलता के साथ-साथ युवा वाद्यकार सहभागी बनते गये। आरंभ में दिल्ली के कॅनाट प्लेस और प्रगति मैदान के मुक्ताकाशी मंच पर बिना पारिश्रमिक लिए संस्कृत रचनाएं सुनाई जो दर्शकों को विशेष रास भी आईं। प्रचारोदिृष्ट कार्य से दूरी बरतने वाले डाॅ. द्विवेदी ने इस दिशा में भी ध्यान दिया। उन्होंने भोपाल स्थित अलियांस फ्रांसेस फ्रांसिसी संस्थान से लेकर भारत भवन के अंतरग सभागार में होने वाली हर सांगितिक प्रस्तुतियों का सूक्ष्मातिसूक्ष्म अवलोकन किया। दर्शकों की नब्ज टटोली, उनके मानस को समझा और फिर संस्कृत बैंड में उसी के अनुरूप सुधार किये। भारतीय मूल वाद्यों के साथ पाश्चात्य वाद्यों के वादक सम्मिलित किये गए।  इतने परिमार्जनों के उपरान्त भारतीय भाषाओं की जननी देवी गुणों से संम्पन्न संस्कृत जब डाॅ. द्विवेदी का कंठहार बनकर निस्सृत हुई तो सभी को अपनी सी लगने लगी। संस्कृत भाषा की ध्वनियों के अतुलित प्रभाव ने युवाओं को भी आकर्षित किया। पश्चिमी पाश्चात्य संगीत और भारतीय शास्त्रीय संगीत का अद्भुत सामंजस्य ‘फ्यूजन’ कर भारतीय राष्ट्रीयता की पोषिका संस्कृत युवा दर्शकों के कानों तक पहुंची। यही ध्रुवा का उद्देश्य भी था। वर्तमान में फ़िल्मी गीतों के संस्कृतीकरण की प्रक्रिया को अनुचित ठहराते हुए डॉ द्विवेदी  कहते है कि संस्कृत साहित्य तो इतना समृद्ध है की दस जीवन कर्म भी मिल जाएं तो उस गरिमामय साहित्य को समग्रता के साथ नहीं प्रस्तुत किया जा सकता। संस्कृत के संबध में  हमारे मनीषियों ने सत्य ही कहा  है:-

अमृतं मधुरं समयक् संस्कृतं हि ततोदधिकम्।

देवभाष्यमिंद यस्मात् देवभाषेति कथ्यते।

संसार की सबसे प्राचीन भाषा के माधुर्य, गाम्भीर्य और सौंदर्य का रसास्वादन कराती डाॅ. द्विवेदी की साधना को देखकर यही कहा जा सकता है कि उनकी संस्कृत साधना विरल है, जीवन की अनेकानेक कटुताएं और विषमताएं सहते हुए भी वे प्रसन्नचित्त सृजन कर्म योगी की भांति लगे हुए हैं। सर्वकालिक और सर्वभौमिक संस्कृत को पुनर्नव स्वरुप देने वाले उनके प्रयासों की जितनी प्रशंसा की जाये वह कम ही होगी।

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Comments

  1. मेरी यात्रा : दिशा जी की लेखनी

    अद्भुत आलेख; आज भी ऐसे पत्रकार हैं, जो किसी विषय का इतना सूक्ष्म अध्ययन और विश्लेषण कर पाते हैं और उसे उतनी ही सुन्दर भाषा में पिरो पाते हैं। श्रीमती दिशा जी का बहुत आभार, जो आपने एक टेलीफोनिक इंटरव्यू के लिए इतनी प्रतीक्षा की क्योंकि मेरी बहुत दिलचस्पी नहीं होती इंटरव्यू देने में। क्योंकि बहुत से पत्रकार बिना किसी रिसर्च किए ही मेरा साक्षात्कार चाहते हैं। परंतु आपने हमारी प्रस्तुतियाँ भी देखीं, अध्ययन किया, फिर साक्षात्कार लिया और अन्त में इतनी सुन्दर शब्दावली में उसे गढ़ा।

    सादर।