लोक धारणा : राजा विक्रमादित्य के पिता राजा गन्धर्वसेन की गन्धर्वपुरी

राजा विक्रमादित्य

डॉ भगवतीलाल राजपुरोहित वरिष्ठ इतिहासकार, उज्जैन

गंधर्वपुरी की ऐतिहासिकता से संदर्भित अनेक किव दन्तियाँ प्रचलन में हैं इतिहास कार अपने-अपने तर्कों के आधार पर मालव जाति के शासक गंधर्व सेन को ही विक्रमादित्य का पिता बताते हैं डॉ राजबलि पाण्डेय और डॉ एस के द्विवेदी ने अपने शोध में साहित्यिक साक्ष्यों के आधार पर यही कहा है। इतिहासकारों का मत है कि ईसवीपूर्व मालवा का आधिपत्य अवंति प्रदेश पर था। महेन्द्रादित्य के बाद उसका पुत्र विक्रमादित्य सिंहासनरूढ़ हुए जिन्होंने शक, हूण, कम्बोज, पवन और तुषारों को पराजित कर विशाल राज्य की स्थापना की भगवान महावीर के निर्वाण के 470 वर्ष पश्चात् 58 ईसवी पूर्व नवीन विक्रम संवत का सूत्रपात किया। भौगोलिक दृष्टि से संरक्षित गंधावल को राजा गंधर्वसेन जिन्हें गर्दभिल्ल और कहीं महेन्द्रादित्य पुकारा गया संकट काल के लिए यह भू-भाग उपयुक्त जानकर शकों से पराजय के उपरांत उज्जैन के निकट पूर्वोत्तर दिशा में पलायन करना पड़ा था। गंधर्वपुरी से ही शक्ति संचित कर विक्रमादित्य ई.पू. 57 में शकों को पराजित कर पाया। प्राचीन साक्ष्यों की अनुउपलब्धिता के चलते इतिहासकारों में मतमतान्तर पाया जाता है
इतिहास साक्षी है कि विक्रमादित्य ने पिता की पराजय के प्रतिशोध स्वरूप 96 शक सामन्तों को देश छोड़ने को विवश कर दिया था। वरिष्ठ इतिहासकार सुप्रज्ञ डाॅ. भगवतीलाल राजपुराहित जी ने अपने मालवा की संस्कृति और विक्रमादित्य संबंधी ग्रन्थ में गन्धर्व सेन को ही विक्रमादित्य के पिता के रूप में समीकृत किया है

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Comments

  1. O P Mishra says:

    Wow! Well written and finely executed. You proved that Gardbhilla was Vikramaditya’s father. You are on the footsteps of Mrs devala Mitra DGA SI. Taking forward the interest in the field of art culture,and archaeology.
    Congratulations!

  2. दिनेश झाला says:

    काफी समय बाद आपकी गन्धर्वपुरी पर रचना पढने के बाद बहुत आनंद आ गया धन्यवाद आभार।
    -दिनेश झाला शाजापुर ।🙏🏻🙏🏻👏👏

  3. Shyam says:

    दीदी नमस्कार.केसर बाई के लोकगीत मे आनंद आ गया आपके द्वारा हमे कई सारी एतिहासिक जानकरी प्राप्त हुई आपका आभार.आपको बधाई.

  4. वीरेंद्र सिंह says:

    ऊँ नमः शिवाय आपका नया ब्लाग पढ़ कर अति प्रसन्नता हुई परन्तु उससे अधिक जिज्ञासा बढ़ गयी गन्धर्व पुरी के बारे में एक ऐसे प्रतापी राजा और वंश के बारे में जिन्होंने परमार वंश की नीव रखी जिनका साम्राज्य मध्य भारत से दक्षिण भारत तक फैला हुआ था जिनके वंशज एक महान सम्राट विक्रमादित्य हुए तो दूसरे राजा भर्तृहरि जिन्होने हिन्दू धर्म का मार्ग दर्शन किया, सबसे बड़ी बात जो आपके शोध से सामने आयी कि किस प्रकार पहले के इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के साथ घोर अन्याय किया है आपने जिस तरह से पूरी प्रमाणिकता के साथ तथ्यों को सामने लाने का प्रयास किया है शायद इससे आने वाले समय में भारत का प्राचीन इतिहास पुनः एक बार ऐसे ही शोध के साथ देश दुनिया के सामने लाने की आवश्यकता है, आज की जो युवा पीढ़ी जिसको अपने गौरव शाली इतिहास को ना तो बताया गया और ना तो दिखाया गया ऐसे छात्रों के लिए आपका ये लेख किसी अमूल्य खजाने से कम नहीं हैं पर मेरा उन छात्रों से भी निवेदन है कि वे आपका लेख सिर्फ पढ़े नहीं बल्कि गंधर्वपुरी आकर स्वयं अवलोकन भी करे ।इतिहास में प्रामाणीकता सिर्फ किताबों के अन्दर नहीं बल्कि भारत के लोककथाओं में व लौकक्तियो में भी भरे पड़े हैं । जिसको ये पश्चिमी मानसिकता वाले इतिहासकारों ने बड़ी चालाकी से नकारने की कोशिश की । मेरे विचार से आपका ये लेख राजपूत वंश में परमार वंश को और अधिक गहराई से जानने में सहायक सिद्ध होगा ।गंधर्वपुरी को सरकार को विश्व धरोहर स्थल व पर्यटक स्थल घोषित करना चाहिए जिससे भारतीय अपने गौरव शाली इतिहास को जान सके व राज्य का भी आर्थिक विकास हो ।

  5. कमलेश बुन्देला says:

    अति सुन्दर जानकारी
    कमलेश बुन्देला

  6. दयाराम सिरोलिया says:

    बहुत ख़ूब दीदी
    दयाराम सिरोलिया देवास