लोक धारणा : राजा विक्रमादित्य के पिता राजा गन्धर्वसेन की गन्धर्वपुरी

राजा विक्रमादित्य

भविष्य महापुराण के प्रतिसर्ग नामक चतुर्थखण्ड में कलयुग राजवर्णन नामक उपाख्यान में यह वर्णित है कि 3710 कलि में प्रमर नामक राजा ने छः वर्ष राजय किया। पिता के समान पद वाला उसका पुत्र देवापि उसके बाद देवदूत और फिर गंधर्व सेन 50 वर्ष राजा के पद पर आसीन रहा। उसके पुत्र शंख ने तीस वर्ष राज किया उसके राज्याभिषेक के बाद वह वनगमन पर गया। इन्द्र द्वारा भेजी गयी वीरमती नामक देवनारी से गन्धर्व सेन को पुत्र हुआ। आकाश से पुष्प वर्षा हुई 12 दुन्दुभियां बजीं, सुखद वायु प्रवाहित हुई। कलियुग आने पर तीन हजार वर्ष पूर्व होने पर शकों के विनाश के निवाराणार्थ शिव जी की आज्ञा से उत्पन्न बालक विक्रमादित्य पांच वर्ष की आयु में तपस्यारत हुआ। सदाशिव के शिवदृष्टि नामक गण ने ही विक्रमादित्य के रूप में अवतार लिया था। बारह वर्षों तक कठिन तपत्या करने पर दिव्य नगरी अम्बावती में श्री सम्पदा लौटी बत्तीस मूर्तियों वाला दिव्य सिंहासन शिवजी द्वारा प्रदत्त हुआ और स्वयं पार्वती ने रक्षणार्थ वैताल को भेजा। राजा ने महाकालेश्वर में देवों के देव माहादेव की पूजा करने धर्मसभा बनाने, वेद-वेदांग में पारंगत ब्राह्मणों को निमंत्रण देकर विधि सम्मत धर्म गाथाएं सुनने का भी वर्णन पुराण में मिलता है। आज का विक्रम संवत जिसे मालव व कृत संतव भी कहते है।

डॉ भगवतीलाल राजपुरोहित वरिष्ठ इतिहासकार, उज्जैन

2069 वर्ष पहले विदेशी शकों (मलेच्छों) पर विजय के उपलक्ष्य में विक्रमादित्य द्वारा प्रारंभ किया गया था। वरिष्ठ इतिहासकार डाॅ. जे एन दुबे जी के मतानुसार महेन्द्रादित्य / गंधर्वसेन / गर्दभिल्ल का पुत्र विक्रमादित्य दीर्धायु था। उनकी 135 वर्ष 7 मास 10 दिन 15 घण्टी 6 घंटे आयु थी। काल गणना में उनके शासन काल की अवधि 60 या 86 या 97 से 100 वर्षों तक भिन्न-भिन्न आंकी गयी है। गर्दभिल्ल के नाम पर ही गर्दभिल्ल वंश का नाम पड़ा। गंधर्वी विद्या का ज्ञाता होने के कारण ही वह गर्दभिल्ल नाम से जाना गया। उसकी सभा में गायकों का प्राचुर्य था। गर्दभी विद्या में भी संगीत का तीसरा ग स्वर गर्दभ का माना गया है अनुमान है कि गंधर्वसेन अथवा गर्दभिल्ल ही उसका विशेषज्ञ था। कालिदास ने एक गंधर्व आयुध का उल्लेख किया है जिससे जीव हिंसा किये बिना ही विजय सुनिश्चित की जा सकती थी। न चारिहिंसा विजयश्च हस्ते (रघुवंश सर्ग पांच) गर्दभिल्ल द्वारा भी गर्दभी ध्वनि से अहिंसा द्वारा शत्रु को परास्त करने का सूत्रपात करने की कथा मिलती है। कहा जाता है कि विक्रमादित्य ने भी काठ की तलवार से और भ्रभंग (भौहों के इशारे से) शत्रु पर विजयी पायी थी। सिंहासन बत्तीसी में ‘अहिंसक विजय’ की चर्चा मिलती है। परमारवंशी गर्दभिल्ल की पत्नी का नाम वीरमती, सौम्यदर्शना व मदन रेखा मिलता है। विक्रमादित्य के पिता गर्दभिल्ल/गधर्वसेन/गर्दभवेश में गंधर्व/महेन्द्रादित्य थे ऐसा लिखा मिलता है।

डॉ रमेश यादव पुरातत्व विशेषज्ञ, भोपाल 

कुल मिला कर इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि विक्रमादित्य और गर्दभिल्ल में संबंध था यद्यपि पुरातत्वविद् डाॅ. रमेश यादव उज्जयिनी के शासक गर्दभिल्ल पर शकों के आक्रमण तदोपरांत विक्रमादित्य द्वारा शकों के उन्मूलन को ऐतिहासिक घटना के रूप में स्वीकारते तो हैं पर वे विक्रमादित्य और गर्दभिल्ल/गंधर्वसेन के संबंधों की साक्ष्यों के आधार पर पुष्टि नहीं करते। पुरातत्व शास्त्रियों के कथ्य से इतिहासकार सहमत नहीं दीखते।

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Comments

  1. O P Mishra says:

    Wow! Well written and finely executed. You proved that Gardbhilla was Vikramaditya’s father. You are on the footsteps of Mrs devala Mitra DGA SI. Taking forward the interest in the field of art culture,and archaeology.
    Congratulations!

  2. दिनेश झाला says:

    काफी समय बाद आपकी गन्धर्वपुरी पर रचना पढने के बाद बहुत आनंद आ गया धन्यवाद आभार।
    -दिनेश झाला शाजापुर ।🙏🏻🙏🏻👏👏

  3. Shyam says:

    दीदी नमस्कार.केसर बाई के लोकगीत मे आनंद आ गया आपके द्वारा हमे कई सारी एतिहासिक जानकरी प्राप्त हुई आपका आभार.आपको बधाई.

  4. वीरेंद्र सिंह says:

    ऊँ नमः शिवाय आपका नया ब्लाग पढ़ कर अति प्रसन्नता हुई परन्तु उससे अधिक जिज्ञासा बढ़ गयी गन्धर्व पुरी के बारे में एक ऐसे प्रतापी राजा और वंश के बारे में जिन्होंने परमार वंश की नीव रखी जिनका साम्राज्य मध्य भारत से दक्षिण भारत तक फैला हुआ था जिनके वंशज एक महान सम्राट विक्रमादित्य हुए तो दूसरे राजा भर्तृहरि जिन्होने हिन्दू धर्म का मार्ग दर्शन किया, सबसे बड़ी बात जो आपके शोध से सामने आयी कि किस प्रकार पहले के इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के साथ घोर अन्याय किया है आपने जिस तरह से पूरी प्रमाणिकता के साथ तथ्यों को सामने लाने का प्रयास किया है शायद इससे आने वाले समय में भारत का प्राचीन इतिहास पुनः एक बार ऐसे ही शोध के साथ देश दुनिया के सामने लाने की आवश्यकता है, आज की जो युवा पीढ़ी जिसको अपने गौरव शाली इतिहास को ना तो बताया गया और ना तो दिखाया गया ऐसे छात्रों के लिए आपका ये लेख किसी अमूल्य खजाने से कम नहीं हैं पर मेरा उन छात्रों से भी निवेदन है कि वे आपका लेख सिर्फ पढ़े नहीं बल्कि गंधर्वपुरी आकर स्वयं अवलोकन भी करे ।इतिहास में प्रामाणीकता सिर्फ किताबों के अन्दर नहीं बल्कि भारत के लोककथाओं में व लौकक्तियो में भी भरे पड़े हैं । जिसको ये पश्चिमी मानसिकता वाले इतिहासकारों ने बड़ी चालाकी से नकारने की कोशिश की । मेरे विचार से आपका ये लेख राजपूत वंश में परमार वंश को और अधिक गहराई से जानने में सहायक सिद्ध होगा ।गंधर्वपुरी को सरकार को विश्व धरोहर स्थल व पर्यटक स्थल घोषित करना चाहिए जिससे भारतीय अपने गौरव शाली इतिहास को जान सके व राज्य का भी आर्थिक विकास हो ।

  5. कमलेश बुन्देला says:

    अति सुन्दर जानकारी
    कमलेश बुन्देला

  6. दयाराम सिरोलिया says:

    बहुत ख़ूब दीदी
    दयाराम सिरोलिया देवास