राजा भोज का भोजपुर, आशापुरी और ढांवला में परमारकालीन मंदिर

bhopal bhojpur raja bhoj

आकाश उनके केश और दिशाएं उनके वस्त्र हैं ऐसे विलासमयी शिव के स्वरूप् को व्याख्यायित करता है भोजपुर का विशाल स्थापत्य

भोजपुर मंदिर से उत्तर दिशा में अनेक जलधारियाँ और अलंकृत शिलाखंड मिलते हैं जिसे ध्यान में रख कर पुराविद यहां एक वृहद शिल्प शाला की विद्यमानता बताते हैं  उनके अनुसार राजा भोज की भावी योजना के अन्तर्गत इस क्षेत्र में अनेक शैव मंदिरों की स्थापना हेतु कई शिल्पज्ञ कार्यरत रहे होंगें। हमने भोजपुर के पास मेंदुआ ग्राम की चट्टानों पर भी अनेक जलाधारियां देखी थीं। पुराशास्त्रियों का आकलन है कि ये जलाधारियां यहां स्थित चट्टानों से ही बनायी गयीं। पाशुपत संप्रदाय के प्रधानक्षेत्र रहे भोजेश्वर मंदिर के मधुछत्र में स्थापित लकुलीश की प्रतिमा यह प्रमाणित कर रही थी कि यहाँ कभी पाशुपत संप्रदाय का बोलबाला रहा होगा, मधुछत्र की प्रत्येक कली में उत्कीर्ण  रूद्राक्ष मालाधारी लकुलीश पाशुपत संप्रदाय से संबंद्धता दर्शा रहे थे, कहते हैं गजनवी द्वारा सोमनाथ पर आक्रमण से पूर्व ही भोज ने वहाँ काष्ठ का मंदिर बनवाया था इसलिए वह महमूद की कार्रवाई से बहुत आहत हुआ था कहा तो यह भी जाता है कि वह महमूद पर आक्रमण के लिए उद्धत हुआ जिसकी भनक लगते ही महमूद सिंध की ओर भाग खड़ा हुआ था। महमूद के सोमनाथ पर आक्रमण से समस्त शैवोपासक नरेश तिलमिला गये थे और उन्होंने भारी मात्रा में शैव शिल्पों की सर्जना की। यह अनुमान भी लगाया गया कि भोजपुर का यह भव्य प्रासाद सोमनाथ की चुनौती के फलस्वरूप अस्तित्व में आया , भोज के शासन के दौरान मालवा में ही नहीं बल्कि समीपवर्ती प्रदेशों में पाशुपत से जुड़े विशाल शैव मठ स्थापित हुए रणोद(ग्वालियर ) में विद्वानों को ऐसे मठ मिले हैं जहाँ के मठाधिपति पुरन्दर प्रधान परमतांत्रिक थे। निःसंकोच हम कह सकते हैं कि राजा भोज पाशुपत सम्प्रदाय का अनुयायी था वैसे उस काल में कपालिकों का प्रभाव पूरे मालवा पर था यहाँ यह भी ग़ौर करने योग्य है कि पश्चिम भारत के सोमनाथ में भी ११ वीं सदी में पाशुपत का प्राबल्य था, उज्जैनी के मठ भी इसी श्रेणी में आते हैं विद्वानों के अनुसार इस प्रकार के एतद्विषयक मंदिर अब बहुत कम रह गए हैं। परम शिव भक्त राजा भोज के ताम्रपत्रों का आरंभण भी शिवस्तुति से ही हुआ करता था।
जयति व्योमकेशोऽसौयः सर्ग्गाय विभूर्ति ताम्।
ऐन्दवी शिरसा लेखां जगदबी  जांकुराकृतिम्।। 
तन्वन्तु वः स्मरारातेः कलयाण मनिवशं जटाः।
कल्पान्त समयोद्दा  मत दिद् वलयपिंगलयः।।    परमार लेखों की शिव स्तुति

यद्यपि साक्ष्याभाव के कारण कई प्रश्न अभी उत्तर की बाट जोह रहे हैं। एक यक्ष प्रश्न जो मन को कचोट रहा था, वह था मंदिर की अपूर्णता सम्बन्धी! क्या समयाभाव के कारण मंदिर अपूर्ण रह गया या फिर भोज के समकालीन पाटण के शासक भीमदेव प्रथम सोलंकी (1022-1063) के समय में महमूद गजनी के ई. 1026 में सोमनाथ मंदिर में आक्रमण कर ध्वंसात्मक कार्रवाई करने से क्षुब्ध भोज द्वारा सैन्य व धन धान्य सहायता करने के कारण अर्थाभाव के चलते मंदिर की निर्मिति अपूरणीय ही रह गयी। जो भी हो भारतीय दर्शन में शिव की परिकल्पना अत्यंत काव्यमय है वे कालातीत हैं और कालाध्यक्ष हैं आकाश उनके केश और दिशाएं उनके वस्त्र हैं ऐसे विलासमयी शक्ति के स्वरूप् को व्याख्यायित करता है विशदता लिए हुए भोजपुर का विशाल स्थापत्य।संभावना है कि समीपवर्ती प्रदेशों में यहीं से शिवालयों के निमित्त जलाधारियां प्रेषित की जाती रही होंगी। यहां की पहाड़ी पर प्राचीन खदान के भी साक्ष्य मिलते हैं। निःसंदेह भोजपुर का शिव मंदिर किसी विशालित देव रथाकृति सी दिखने वाली उदात्त व उत्कृष्ट संरचना है जिसे देख कर ऐसा लगता है मानो देवता अभी-अभी रथ  से उतर कर गए हों, मानों यह कह रहा हो द्वापर की अठारह अक्षौहिणी सेना, त्रेता के धनुष सब कुछ समाप्त हो जाता है, बस नहीं मिटता तो अस्तित्व महादेव के मंदिर का, वह काल के भाल पर एक उज्जवल तिलक सृदश सदैव शोभायमान रहता है। भारतीय वाडगमय् में शिव के साथ सत्य और सुन्दरम् जुड़ा है सत्य का अर्थ ही है शाश्वत्ता और सुन्दरम् का रंजकता। मानव साधना के केंद्र रहे इस पुण्य धाम में माथा टेक अखण्ड आनंद से आपूरित बाहर निकलकर हम, हम नहीं रह गये थे शिवमयी विराटता में खो चुके थे।

साक्षात्कार – डॉ. नारायण व्यास, वरिष्ठ पुराविद
इतिहास पुरुष राजा भोज का मालवा ही नहीं समग्र देश कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए क्यों स्मरण करता है यह जानने के लिए हमने उज्जैन निवासित सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ भगवतीलाल राजपुरोहित जी से संपर्क साधा। हमने डाॅ. भगवती लाल राजपुरोहित जी से परमारकालीन राजा भोज के व्यक्तित्व और कृतिव पर प्रकाश डालने का आग्रह किया। राजा भोज से संदर्भित साहित्यिक तथा अभिलेखीय आधारों की विवेचना के पश्चात डॉ राजपुरोहित मानते हैं कि राजा भोज का राज्य कैलास पर्वत से लेकर मलय पर्वत तक और उदयगिरि से अस्ताचल तक व्याप्त था।राजा भोज पर ग्रन्थ के रचयिता भगवतीलाल जी बताते हैं कि गौड़ (बंगाल) से दक्षिणापथ तक भोज के राज्य की सीमाएँ साहित्य में मिलती हैं ताम्रपत्रों से उनके कोंकण पर विजय की पुष्टि होती है मराठवाड़ा के भिल्लम तृतीय को अधीन करने वाले राजा भोज से संबंधित तेरहवीं सदी की नाटिका पारिजातमंजरी के अनुसार उन्होंने परमवीर गांगेय राजा को परास्त कर गांगेय भंगोत्सव मनाया था जिससे कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली वाली कहावत अस्तित्व में आई प्रबन्ध चिंतामणि में उद्धृत अंश के अनुसार राजा गांगेयदेव द्वारा अपमानित राजा मुँज के प्रतिकार स्वरूप यह घटना घटी थी। राजा भोज की दानशीलता के क़िस्सों से तो इतिहास भरा पड़ा है भोज के समकालीन काव्यप्रकाश राजतरंगिणी में भी उनकी उदारता की चर्चा मिलती है काव्यप्रेमी भोज के बारे में तो डॉ राजपुरेहित के अनुसार यहाँ तक कहा गया कि अभिभूत होने पर वे अक्षर अक्षर पर एक लाख तक लुटा डालते थे प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ ।उव्वट धनपाल,अमितगति,हलायुध,चित्तप आदि उनकी सभा के पाँच सौ विद्वानों में से श्रेष्ठ विद्वान माने गये हैं। ऐसा कहा जाता है कि श्यामलादण्डक स्त्रोत के रचनाकार कवि पुरान्तक को १००१ ई में एक सौ ग्राम प्रदान किये थे। समरांगण सूत्रधार उनकी शिल्प संबंधी जानकारियों का समन्वय है जिसको आधार बनाकर ही भोजकाल में ग्राम,पुरी,खेट,कर्वटक,दुर्ग का निर्माण किया गया।इस रचना में आठ परमाणुओं का एक त्र्यस्त्ररेणु,इसका आठ गुना बाल के अग्र भाग के बराबर,आठ बालाग्र के बराबर एक लिक्षा लीख,आठ लीख के बराबर एक यूका जूं ,आठ यूका के बराबर एक यव जौ,आठ जौ के बराबर एक अंगुल बारह अंगुल के बराबर एक वितस्ति बलिश्त,दो बलिश्त का एक हाथ,दो हाथ का एक किष्कु पच्चीस हाथ का एक प्राजापत्य,छब्बीस मुष्टि का एक धनु,सत्ताइस धनु का एक ग्रह,चार हाथ का एक धनु,दण्ड,आठ दण्ड का एक रज्जु,दो सहस्त्र हाथ का एक कोस,चार कोस का एक योजन,दस हांथ का एक बांस,दो केस का एक निवर्तन बताया गया है। नगर के सात भेद निगम,स्कन्धावार,द्राणक कुब्जक,पट्टण शिविर,वाहिनीमुख जो राजा के भोग हेतु निर्धारित किये गये थे ।सामान्य नगरों में कार्मुक विश्वेश,भद्र सर्वतोभद्र,प्रस्तर,पद्मा,स्वस्तिक,चतुर्मुख,श्री प्रतिष्ठा,नगरी बलिदेवपुर आदि बताये गये हैं राजा भोज ने राजा जिसमें रहे उसे राजधानी निरूपित किया था उनके द्वारा नगर के तुल्य कर्वट बनाने की अनुशंसा की गयी उससे कम गुणों वाला निगम उससे छोटा ग्राम और उससे न्यूनतम गुणों वाला ग्राम कल्प कहा गया तृण की कुटिया वाली पुलिन्दों का निवास पल्ली कहलाया छोटी बस्ती पल्लिका नगर के अतिरिक्त सभी जनपद कहलायें नगरों को जोड़कर राष्ट्र कहलाये गये। राजा भोज पर अनेक शोधारित ग्रन्थ लिखने वाले वयोवृद्ध डॉ भगवतीलाल राजपुरोहित के अनुसार समरांगण सूत्रधार में राजा भोज ने नगर दुर्ग को घेरती परिखा बनाकर उसमें स्वच्छ पानी की प्राप्ति के लिए मछलियाँ और कछुए छोड़े जाने कमल से जल शोभा बढ़ाने की आज्ञा भी दी थी। त्रिभुवन नारायण उपाधिधारी राजा भोज (परमार काल 1010 ई. से 1055 ई.) ने अपने शिल्प ग्रन्थ में ईंट बनाने, चयविद्या (चुनाई) यंत्रकला, भूमि के प्रकार, दारूकर्म (लकड़ियों का चयन) लेख्य जात (लेपकर्म) संबंधी विस्तृत वृहद जानकारियां दी थीं। चुनाई के 20 गुण अभिहित करते हुए राजा भोज निर्दिष्ट करते हैं कि चुनाई सदैव सुविभक्त, बराबर, सुन्दर, चौकोर, असंभ्रान्त, अपीड़ित, अकुब्ज, अविनाशी, अन्यवर्हित, अनुत्तम, अन्तरंग, अनुद्वत्त, असंदिग्ध, सुप्रतिष्ठ सुसंधि, अजिह्वा, सुपाश्र्व, ऋजु अन्त, संधि सुश्लिष्ट समान खण्ड होनी चाहिए। यहीं नहीं सूत्र, वसूली और घन छैनी इत्यादि यंत्रों का भी वे उल्लेखन करते चलते हैं। जनोचित भवन विन्यास वाली राजा भोज की समरांगणसूत्रधार कृति में चार पटलों औपोद्धाातिक, सामान्य, पुरनिवेश, भवन निवेश में विभक्त शास्त्र प्रतिपादित किया गया है।

साक्षात्कार – डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित, वरिष्ठ इतिहासकार

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Comments

  1. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी सादर प्रणाम एवं चरणस्पर्श,
    दीदी सर्वप्रथम तो ये कहूँगा कि आप बहुत ही सुंदर लिखती है, आपकी शुद्ध और प्रवाहमान हिंदी मुझे सतत ही आपके आलेख पढ़ने को व्याकुल बनाती है। दीदी राजा भोज के बारे आप अपने अगले लेख में कुछ और अनसुना अनकहा ज़रूर बताइए जो आज तक लोगो को नही पता है। सभ्यता और संस्कृति को सहेजने का आपका ये प्रयास बहुत ही सराहनीय है। बस दीदी अंत मे आपसे इतना ही कहूँगा की आप हमें “द रोड डायरी” के माध्यम से भूले बिसरे इतिहासिक तथ्यों से अवगत करती रहें।

  2. O P Mishra says:

    Mamji, thank you very much for taking a lots of interest in heritage.now you putting a path for future generation.ashapuri was my dream project as well Vishakha Ka BHI.you have quoted Sanskrit text and original references which a symbol of serious scholar.i am proud of your researches.bhojpur temple ashapuri are the centre of the paramaras.interviews of the scholars are their own.infuture disclaimer must be in your blogs.dhabla and devbadla you please visit in different angle.you please thanks to commissioner archaeology for keen interest.letus see the future for ashapuri.thanks to you and your driver for moving even in remote

  3. नारायण व्यास says:

    आपने बहुत बढ़िया लिखा ,शब्दों का चयन और वाक्य विन्यास भी अच्छा है विशेष रूप से भरा समन्दर लिख कर जो आपने इस विषय को उठाया है वह नया है
    नारायण व्यास

  4. वीरेन्द्र सिंह says:

    भोजपुर मंदिर व आशापूरी मंदिर के बारे में लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा। मुझे पहले एक बार भोजपुर जाने का व दर्शन करने का अवसर मिला है परन्तु दर्शन के पश्चात मन में अनेक सवाल आने लगे और वहां के पुजारी व आम लोगों की बातें सुनकर और कौतूहल बढ़ गया था ।मन्दिर कि वास्तु कला व निर्माण के बारे मे आप के लेख से मन्दिर से जुडी अनेक जिज्ञासा के उत्तर अपने आप मिल गये,परन्तु एक यक्ष प्रश्न का उत्तर अभी भी शेष रह गया है कि वह मन्दिर आखिर अधुरा क्यो रह गया ।साथ ही आपने वहा पर आशा पूरा देवी से जुडी अनेक जिज्ञासा का आपने बहुत ही सुन्दर रूप शमाधान कर दिया है ।परन्तु सबसे विशेष बात पर आपने ध्यान दिया जो कोई नहीं देता है वह हैं उसके आस पास के क्षेत्र मेंफैले व बिखरे हुए अनेक मन्दिरों के अवशेष जो हमारी समृद्ध संस्कृति को चिख चिख कर बता रहे हैं इससे ये भी पता चलता है आज ये जैसे जंगल और सुनसान स्था न में दिखाई दे रहा है वह कभी बहुत ही सुंदर और व्यवस्थित रूप से बसा हुआ समृद्ध नगर रहा होगा जो समय के थपेडों से उजड़ गया मगर जो वहां वर्तमान में है उसे सरकार और जनता दोनों को सहेजना और सुरक्षा के लिए आगे आना चाहिए ।

  5. Rajesh Dixit says:

    इतिहासको चालना देनेके लिहाजसे यह ब्लॉग्ज उपयुक्त है…आपकी संशोधन पद्धती एवं सादरीकरण बढिया है…आपने इस ब्लॉगमे हमारा उल्लेख किया है – शुक्रिया…

  6. आभा शर्मा says:

    प्रिय दिशा जी,
    एक बार फिर थोड़े विलम्ब के बाद आपका चरवैती पवित्र ब्लॉग पढ़ा जिसमें आपने भोजपुर जैसे प्राचीन पवित्र मंदिर को राजा भोज सहित अपने पाठकों को कण-कण से अवगत कराया। हम और हमारा परिवार वहाँ दर्शन करने एक-दो बार जा चुके हैं पर इतना विस्तार हम लोग भी करने में असमर्थ हैं। आपने तो जैसे पाठकों को साक्षात वहाँ खड़ा कर दिया, सबको शिवमय बना दिया। मंदिर के साथ राजा सहित वो जानकारियाँ जो शायद हमारे पास थी हीं नहीं आपने नारायण व्यास जी से भी जो प्रश्न पूछे वो रही सही हमारी और आपके और पाठकों की जानकारी पूरी कर रहे थे। चरवैती के हर ब्लॉग में आपने जैसे अपनी आत्मा डाल दी।

    मैंने आपके ब्लॉग द्वारा चरवैती की ज्यादातर यात्राएँ कीं। आपने जैसे यात्रा के साथ हमें उस शहर, वहाँ के भोजन, वहाँ की आबो-हवा, वहाँ की मिट्टी की सौंध, मंदिर का साक्षात विवरण किया। मैंने अभी तक इतना दिलचस्प पवित्र ब्लॉग नहीं पढ़ा। सिर्फ लिखना ही काफी नहीं है, पाठकों को यह दिखाना भी ज़रूरी है कि मेरी यात्रा में आप कहीं भी धूमिल नहीं हों। हर यात्रा चरवैती आपके लिए है। जो आपने किया आपका ब्लॉग पढ़कर अपने आप होठ ॐ नमः शिवाय का जाप करने को आतुर हो जाते हैं। आप ऐसे ही चरवैती हमारे लिए लिखती रहें। आपको बहुत बहुत आशीर्वाद, प्यार और शुभकामनाएँ। मुझे आपके साथ अगली यात्रा का इंतज़ार है।