भूले बिसरे खेल-खिलौने वाला माटी शिल्प शिविर

बच्चों में मैत्री भाव जगाते खेलों के सर्जनकर्ताओं के क्रम में अगला नाम था भागीरथ प्रजापति, खजुराहो का जिन्होनें गेड़ी, घोड़ा गाड़ी, चंगा पाँव, गोल-गोल रानी कित्ता-कित्ता पानी, चपेटा, रेहट, ढबुआ जैसे खेलों को मिट्टी से बनाकर अपनी रचनात्मक प्रतिभा का परिचय दिया था। मिट्टी को पाँवों से रौंदकर उसमें लस पैदा कर, लौंदा बनाकर, चाक पर रखकर उँगलियों और हथेलियों से आकृतियाँ गढ़ने, वाले इन कुम्हारों ने अब तक हंडिया, घड़ा, गगरी, सुराही, दिया, दिउली, आदि बनाये थे। धूप खाये उपादानों को अग्नि का आव्हान कर आंवा (भट्टी) में तपाने के बाद, मृदा कल्पित आकार ले पाई थी । कुम्हारों से हमन पता चला कि  माटी को मूर्त रूप देते समय रुंधी मिट्टी से शिल्प आकार नहीं ले पाते इसलिए माटी की नमी को धूप में सुखाकर पानी के साथ मचाया जाता हैं। घोड़े की लीद, पिसा कागज़, कोयले की राख और बारीक कटी सन के साथ सनी मिट्टी से सिरजे मृणमय शिल्प मन को पहले भी लुभाते रहे हैं और आज भी लुभा रहें हैं, जितनी अधिक चिकास वाली मिट्टी होती है, उतनी ही मूर्तियाँ पक्की होंती हैं, ये लोग ऐसा मानते हैं। मृण्मूर्तियों की श्रृंखला में हर कुम्हार का माटी शिल्प अलग-अलग रूप ग्रहण करके सामने आता जा रहा था । हमने पाया कि यहाँ आये अधिकांश कुम्हारों के शिल्पों में बाहरी सौंदर्य के स्थान पर विषय आधारित आन्तरिक सौंदर्य का प्राखर्य  था। घोड़ा मात्र घोड़े का आकार लिए था तो बैल, बैल का रूपाकार लिए, लेकिन बहुतेरे गूढ़ार्थ लिए विद्यमान था। प्रायः  रूपविधान में  परिवर्धन व परिष्कार करने से बचते यहां आये कुम्हारों ने रूढ़िगत आकारों में परिवर्तन तो किये पर  परम्पराओं के अनुगामी बनकर भी अपनी मौलिक सृजनात्मकता के साथ पूरा न्याय भी किया। इन चक्रधरों के कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा करनी होगी।

छत्तीसगढ़ के राज्य पुरस्कार प्राप्त भीखा राणा के पंडाल में कोंडा अंचल के आदिवासी खेलों की झलक मिली। माड़िया जनजाति द्वारा खेतों में फसल की कटाई के बाद होने वाले पारम्परिक नृत्य में पक्षियों के परों से सजावट वाली मुखाकृतियाँ धारण कर मांदरी नृत्य करने वाले आदिवासी समाज, कुशल आखेटक रहे तीरंदाजों के, निसर्ग आश्रित जनजाति जीवन के दिग्दर्शक बने हम आगे बढ़ते रहे तो राजस्थान के पोखरण क्षेत्र से आये शिल्पियों के बनाये शिल्प हस्ताक्षरों को देख पाँव ठिठक गये। लूणा राम और नारयण राम के पोखरण की लूण वाली माटी से बने पारम्परिक खेलों वाली पंक्तियों में रखे शिल्प शैलीगत मित्रता लिए सामने थे।

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