सिक्के वाले डॉ. आर. सी. ठाकुर के साथ अंतरंग भेंटवार्ता और महिदपुर दर्शन  

डॉ. रामचंद्र ठाकुर के अनुसार पुण्यसलिला नर्मदा, क्षिप्रा, चम्बल, गंभीर व कालीसिंध नदियां सिक्कों के रूप में पुरातात्विक वैभव उगलती  आई हैं

कर्तव्यपरायणता के संस्कार उनकी धमनियों में बाल्यावस्था से ही संचारित हो ही रहे थे। इस कार्य को भी उन्होंने पूर्ण निष्ठावान होकर किया साथ ही साथ सिक्कों के प्रति अपनी अभिरुचि में भी नए आयामों को संस्पर्श करते गए। कालिदास अकादमी में सर्वप्रथम व्यापक स्तर पर आयोजित सफल प्रदर्शनी ने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई। ठाकुर साहब हंसकर बताते हैं तत्कालीन नोडल अधिकारी डॉ मोहन गुप्त ने उनसे प्रदर्शनी के समापन दिवस पर कहा था आज से तुम्हारे पास हमारे लिए समय निकाल पाना असंभव हो जायेगा लिखकर रख लो। उनकी बौद्ध कालीन सिक्कों तथा मुहरों को जब साँची में श्रीलंका के राष्ट्राध्यक्ष और जापान के प्रतिनिधिमंडल की सराहना मिली तो उनके हौसलों को मानो पंख लग गए। यहाँ तक की उन्होंने अपनी अर्जित धन राशि को भी सिक्कों की सम्पदा की अभिवृद्धि में लगाया। वे चाहते थे कि उज्जैन के गढ़कालिका क्षेत्र से प्राप्त होने वाली दुर्लभ मुद्राओं और सिक्कों को उज्जैन के बाहर नहीं जाने दिया जाये सिक्कों के प्रति बाहरी व्यापारियों की लालसा ने उन्हें इसके निमित्त और उकसाया। ठाकुर साहब यह भी नहीं चाहते थे कि उनके क्षेत्र के सिक्कों और अत्यावश्यक पुरातात्त्विक वैभव को विदेशी आकर ले जाएं। इसके लिए उन्होंने नाना जतन किये। क्षिप्रा नदी और नर्मदा के कछारी क्षेत्रों में धूलधुआं प्रजाति के लोगों द्वारा धनोपार्जन की दृष्टि से सिक्कों को खोदकर निकालने की प्रक्रिया में स्वयं साझीदार बने उनसे शिष्टाचार व्यवहार बढ़ाया और उनके संरक्षक बन गए। स्थिति ऐसी निर्मित हुई कि चाहे धूलधुआं जाति के लोग हों या महिदपुर के अन्य रहवासी जिसे जो अनमोल सिक्का, मुहर अथवा अन्य उपादानों की प्राप्ति हुई  वह डॉक्साब के द्वार पर दस्तक देने लगा। उन्होंने सिक्के ही नहीं एकत्रित किये वरन् प्राचीन अतिमहत्त्व के बरतनों और पांडुलिपियों का भी अच्छा ख़ासा जमावड़ा संगृहीत कर लिया।  वे पुस्तकमयी ज्ञान के कायल नहीं रहे, ठाकुर साहब कहते हैं विद्या तो वह है जो अनुभवों से आये और मस्तिष्क में सीधे बैठ जाए। यह उनके संस्थान की स्थापना का उद्देश्य भी है। यहां चलते-फिरते सहस्त्रों वर्षों के इतिहास को आत्मसात करना सुलभ होता है। संस्थान में शोधार्थियों के निवासित रहने के लिए सुविधा-संपन्न कक्षों की भी व्यवस्था है। मुद्राशास्त्र के अभ्यार्थी उनके साथ शोधकार्य करते हैं उनका बात को कहने, बतलाने और समझाने का वैशिष्ट्य, उनकी प्रभाव ऊर्जा सामने वाले के मनोमस्तिष्क में बैठता जाता है। सिक्कों को व्याख्यायित करने की उनकी अपनी बोधगम्य शैली है जो  छात्रों को अपनी सी लगती है। उन्होंने पुस्तकें लिखीं पर प्रकाशकों के पीछे नहीं भागे। गंभीर संगोष्ठियों में सम्भाषी बने, नपा-तुला बोला, गंभीर बुद्धिजीवियों के सहायतार्थ सदैव तत्पर रहे।

क्षिप्रा का चौड़ा पाट, गंभीर नदी, डॉ. रामचंद्र और डॉ. सुधा ठाकुर

अब सवाल था इतनी मात्रा में सिक्के उन्हें मिलते कहां से हैं, ठाकुर साहब ने बताया कि वर्षों से हमारी पुण्यसलिला नर्मदा, क्षिप्रा, चम्बल, गंभीर व कालीसिंध नदियां सिक्कों के रूप में पुरातात्विक वैभव उगलती  आई हैं। उन्हें खंगालना सिक्के के संग्राहकों का काम होता है। कन्नी, थाली व नागफनी लिए कालू और राजू उनके साथ नदियों से स्वर्ण धातु के निर्गमन की प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं। कालू के पिता और दादा भी ठाकुर साहब के परिवार के लिए नदी धोने का काम करते रहे हैं। क्षिप्रा को वे सोना उगलने वाली नदी अभिहित कर विशुद्ध निष्क और स्वर्णसुधा निर्गमित करने का सम्पूर्ण मालवा में एकमात्र माध्यम बताते हैं। जागीरदारी ठसक उनके पहनावे में भले ही दिख जाये, पर उनके स्वभाव में नहीं दिखती। हमें जो दिखी वो  केवल अद्भुत स्मरण शक्ति थी जो अनेक उक्तियों के माध्यम से यथासमय बातचीत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रही। पान सड़े, घोड़ा अड़े, विद्या बिसर जाये, अंगारे पर बाटी जले कहो भाई क्या राय कहकर वे फिराव (पुनरावृत्ति) की आवश्यकता जताते हैं और कड़ियाँ जोड़ते हुए कथन को घुड़साल तक ले जाते हैं। कभी उनके घुड़साल में बीसियों घोड़े होते थे जो दशहरे पर होने वाली घुड़दौड़ों में सम्मिलित होकर पुरस्कार अर्जित करते थे। महिदपुर में ही पले-बढे ठाकुर साहब ने अपनी पुश्तैनी ज़मीन पर घुड़सवारी सिखाने के लिए एक स्कूल भी खोला था। महिदपुर में बकौल उनके अश्वगोष्ठों की बहुतायत थी इसलिए पूरे महिदपुर के घरों में ओटले ऊँचाई लिए बनाये गए दिखते हैं जिनसे अश्वारोहण सुगमता से हो जाया करता था। यही नहीं अश्वों की पीठ पर सोने-चांदी के तार वाली कलात्मक जिन (काठी) बनाने वाले जीनसाजों (जीनगरों) के अनेक परिवारों की यहाँ बसाहट थी। 22 पुस्तकों के रचयिता और अश्विनी शोध  संस्थान की स्मारिकाओं के सर्वेसर्वा डॉक्साब की कभी 200 बीघा भूमि डेलची, बंजारी, कढ़ाई, भसाड़ी, बड़ला, भूरेला, सिंहदेवला, ईसनखेड़ी, ठगवाड़ी इत्यादि गाँवों में हुआ करती थी। महिदपुर की अति मूल्यवान 10 बीघा भूमि उन्होंने विद्युत विकास विभाग को जनहितार्थ  भेंट कर दी थी। उनके साथ औपचारिकता का कोई अंतराल आप नहीं अनुभव कर पाएंगे। ऐसा एक बार नहीं बारम्बार अनुभव होता रहेगा। ठाकुर साहब मानते हैं कि सर्वजनहितार्थ संकल्प को कोई ताकत डिगा नहीं सकती। ऐसा नहीं है कि इस क्षेत्र में उन्होंने कभी धोखा नहीं खाया, खाया ऐसा भी नहीं कि विध्वंसतोषियों ने उनके भावी स्वप्नों को ध्वस्त नहीं किया, किया, पर उन्होंने इन सबकी  परवाह नहीं की। निषेधाज्ञा के चलते ठाकुर साहब के यहाँ लोगों की  आवक-जावक नहीं के बराबर थी। सुधा जी के हाथों का सुस्वादु भोजन कर मन किया महिदपुर गाँव का परिभ्रमण कर लिया जाये। डॉक्साब अड़े रहे, कहने लगे शहर में उपद्रवियों  ने उत्पात मचा रखा है, अश्रु गैस छोड़ी जा रही है, दो समुदाय आमने सामने आ गए हैं फिर कभी देख लेना। हम भी अपने अभिलक्षित कार्यक्रम से टस से मस नहीं हुए। अब तक हम उनके उदारचेता स्वाभाव को भलिभांति समझ चुके थे। कुछ मान-मनौव्वल के बाद वे तैयार हो गए, अनमने मन से वे बोले तुम तो पूरी झांसी की रानी हो, चलो!!!

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Comments

  1. rajendra kumar malviya says:

    अति सुंदर, मनोहारी वर्णन। आपकी लेखनी में सचमुच एक जादू है दीदी।

  2. बंशीधर बंधु3 says:

    अश्वनी शोध संस्थान के मूल्यवान पुरातात्विक महत्व के सिक्कों को लेकर ऐतिहासिक वैशिष्ट्य को बख़ूबी समेटा है।
    आपकी दृष्टि संपन्नता को नमन।

  3. Mahendra Singh Jat says:

    महिदपुर की पुरातत्व धरोहर और सौंर्दर्य का अद्भुत वर्णन आपने अपनी लेखनी से बख़ूबी किया है ! धन्यवाद

  4. नारायण व्यास,भोपाल says:

    बहुत बहुत बधाई बहुत अच्छी भेँट वार्ता बनाई हैं। धन्यवाद। ठाकुर जी हमारे पुराने मित्र हैं।

  5. Dr Kailash Chandra Pandey, Mandsaur says:

    Very nice. Thanks

  6. O P Mishra, Bhopal says:

    Excellent projection of a person who deserves.mahidpur was ancient site from early period.i visited that place in 1980with Dr v s wakankar,later for my Tagore national fellowship.dr thakur have good collection af antiquities,coins from different dynasties.i must thank to Disha Mishra who have taken this task to permits cultural heritage of Madhya pradesh.intreviews of Dr Thakur and dr.j n dube gives complete information about the collections,historical background of that area, Ujjain historic city.she covered more information than what a person needs for his knowledge.being a scholar she is covering all most of the unknown area of m p .so .thanks to Dr Thakur and Disha from whom I collected such academic informations.

  7. एस के अवस्थी ,दिल्ली says:

    दिशा क्या ख़ूब लिखती हो भाई

  8. Rahul kumar says:

    Bhut hi sundar ramneek varnan

  9. ललित शर्मा, महाराणा कुम्भा इतिहास अलंकरण (राज.) says:

    महिदपुर (मालवा) के मुद्रा संग्राहक डॉ. श्री आर.सी. ठाकुर जी का एक सामुख्य साक्षात्कार रोड मैप Expert श्रीमती दिशा जी शर्मा ने प्रस्तुत कर बड़े महत्व का कार्य सम्पादित किया है।

    साक्षात्कार में ठाकुर जी की जीवन साधना, सेवा तथा उनके विराट संग्रह के दर्शन हुए। मुझे लगता है डॉ. वाकणकर की उदात्त परंपरा में उन्होंने बहुत बड़ा काम किया। आहत, मौर्य से लेकर परमार वंश के अकूत सिक्कों का संग्रह और विवरण देना, यह अद्भुत बात है। मेरा विनम्र आग्रह है श्री ठाकुर जी प्रमाणिक तौर पर विक्रमादित्य की प्रचलित स्वयं की मुद्रा का प्रदर्शन करें तो विक्रमादित्य का इतिहास महत्व पुष्ट होगा तथा उन्हें पृथक से इस विशाल मुद्रा संग्रह पर ग्रन्थ प्रकाशित करने चाहिए। मालवा के शिलालेखों, मुद्राओं, मूर्तियों पर पृथक से कोई एकाग्र ग्रंथ देखने में नहीं आया। श्रीमती दिशा जी से अपेक्षा है ऐसे साक्षात्कार से वे हमें सदैव लाभान्वित कर माँ भारती के वरद पुत्रों के दर्शन करवाती रहेंगी।