पंजाब की लोकनाट्य नकल चमोटा शैली, लोक नृत्य, और मालवा का कबीर गायन

पंजाब का लोक नृत्य, लोकनाट्य शैली, चमोटा, मालवा, कबीर, गायन, धर्म और संस्कृति

श्री हरदयाल सिंह थुही से यह भी पता चला कि गोरा हों या जगतार और भिन्दर ये सभी पहले लोकविधाओं के मंच पर नृत्य से संबंद्ध रहे हैं और आज भी आवश्यकतानुसार गाँवों में आयोजित होने वाले बीनबाजा प्रदर्शन और रामलीलाओं में नृत्य करते हैं। कभी राजस्थान के रजवाड़ों और सामंतों के प्रशस्तिगान गाने वाले ये लोग अपनी लोक गायकी के कारण ही लोकचर्चित रहे हैं जिनसे पंजाब का लोकमानस तत्परता से तादात्म्य स्थापित कर लेता है। बहुधा चमोटा लोक शैली में प्रेम की गंभीरता और उदात्तता का स्थान नहीं होता मूल कथा के बीच-बीच में अवसर पाते ही लोक कलाकारों की मनः स्थिति संवादात्मक हो जाती है जिसमें गांव की समस्याओं, जमींदार और किसानों के संबधों के खट्टे-मीठे अनुभवों को निचोड़ होता है। मनोरंजन के उद्देश्य से होने वाले चमोटा प्रदर्शन में दो व्यक्तियों का पारस्परिक संवाद लोक को गुदगुदाता है।

शब्दों को परखने, ढालने और टांकने की कला में निपुण विदूषक हंसी ठठ्ठे में सामाजिक व राजनैनिक व्यवस्था पर कटाक्ष करता है। श्री हरदयाल सिंह थुही जी बताते हैं कि कर्ज में डूबा किसान, शोषण, उत्पीड़न, दारिद्रय, अभाव और राजनैतिक हस्तक्षेप वाले जीवन के उजले-धूसर पक्ष को हास परिहास में समेटते विदूषक के शब्द तीर की तरह हृदय के भीतर धंसते जाते हैं। चमोटा शैली का यही विशेषता है। विदूषक जिसे पाछू पुकारा जाता है को हर संवाद की समाप्ति पर चमोटा अर्थात चमड़े की एक संरचना से आगू द्वारा प्रहार किया जाता है। कहीं-कहीं आगू को रंगा और पाछू को बिगला या बिगरैंया भी कहते हैं। चमोटा से उत्तपन्न सटाक की तीव्र ध्वनि पर दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट से सभागार गूंजता है। बेंत और लावणी शैली का आलम्बन लेकर की गई चुहलबाजी दर्शकों को हंसाती है। हीर-रांझा की प्रेमकथा के मध्य भी बेड़ी के ठेके को लेकर चौधरी और बिदूषक का प्रहसन आता है। जिसमें अंततः जीत निम्न वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे विदूषक की ही होती है। यद्यपि लोक कल्पना के पंखों पर बैठ कर विचरण करने वाला मसखरा यानि विदूषक कहीं-कहीं ढील बरतते हुए अमर्यादित हो जाता है पर यह लोकाभिव्यक्तियाँ हैं। लोक संस्कृति में पले-पुसे विदूषक से शास्त्रीयता की अपेक्षा भी तो नहीं की जा सकती। श्री हरदयाल सिंह थुही से यह भी ज्ञात हुआ कि व्यवस्थाओं पर चोट करता चमोटा वर्तमान में चमड़े के स्थान पर रबड़ का बनाया जा रहा है। पंजाब के मालवा के अतिरिक्त दोआबा और माझा क्षेत्रों में भी चमोटा शैली के अखाड़े विद्यमान हैं पर उनकी प्रस्तुतियों में लोकांग का अभाव परीलक्षित होता है। डीजे का उपयोग कर भीड़ एकत्रित करने वाले अखाड़ों से अलग फकीर मोहम्मद खां के परिवार ने अपने अकृत्रिम लोक गीतों से अपनी पृथक पहचान बनायी है।

पंचपटिया अर्थात् पंचकलाओं (गायन, वादन, नृत्य, संवाद और अभिनय) में निपुणता रखने वाले लोक कलाकार ही नक़ल चमोटा शैली के लोकनाट्यों में सम्मिलित होने की पात्रता रखते हैं। पुरूष द्वारा अभिनीत महिला पात्रों की भूमिकाओं के लिए नृत्य में पारंगत होना अनिवार्यता मानी जाती है। श्री हरदयाल सिंह थुही के अनुसार हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में तो यह विद्या विशेष लोकप्रिय है पर भारत में अपने विशुद्ध रूप में यह विलुप्त होने के कगार पर है इसी लिए पंजाब संगीत नाटक अकादमी इसके संरक्षण और संवर्धन में सक्रिय व सजग है। इसमें बेंत और लावणी शैली में उठाये जाने वाले मिसरों की मिठास रोंगटे खड़े कर देती है। टकसाली पंजाबी भाषा से अलग मलवई बोली में जनानी को तीमी और सी को ती उच्चरित किया जाता है। अपनी पहली प्रस्तुति में पाकिस्तान स्थित ननकाना साहिब न जा पाने की वेदना बेंत तथा लावणी छंद वाली लोकगायकी में उतार कर नकल मण्डली ने दर्शको के हृदय को संस्पर्श कर दिया।

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Comments

  1. दयाराम सारोलिया says:

    बहुत बहुत साधुवाद आपको

  2. हरदयाल सिंह थुही says:

    मैड़म दिशा जी, हमारी मंडली की ओर से भोपाल में जो लोकनाट्य नकल  चमोटा  शैली में ‘हीर रांझा ‘ की पेशकारी की गई उसकी आपने जो समीक्षा की है वो काबले तारीफ है। किसी दूसरे प्रदेश की लोक कला के बारे में इतनी गंभीर समीक्षा हर किसी के वस की बात नहीं होती।  छोटी से छोटी बात को भी आपने पकड़ा है। इसके लिए आपका हारदिक धन्यवाद।

    हरदयाल सिंह थुही

  3. जगजीत says:

    बहुत रोचक जानकारी
    जगजीत

  4. सिंगारा सिंह says:

    अति उत्तम
    सिंगारा सिंह