लोक धारणा : राजा विक्रमादित्य के पिता राजा गन्धर्वसेन की गन्धर्वपुरी

राजा विक्रमादित्य

स्वर्णाभा वाले साँप की बाम्बी मंदिर परिसर में रखी अनेक खण्डित प्रतिमाएँ

तीन सादे भित्त कुडु से सुसज्जित कपोत, खुर, लता पत्रों से अलंकृत एक मध्य बंध से युक्त कुंभ, सादा अन्तर्पत्र, कलश रत्नों से सुशोभित अन्तर्पत्र मंदिर को भव्यता प्रदान कर रहे थे। पद्म से श्रृंगारित भूविन्यास लिए यह मंदिर, पंचरथ है। गर्भगृह के ललाट पर शिव की नौ आसीन प्रतिमाएं हैं। गर्भगृह की रथिकाओं में सर्वप्रथम समपाद में खड़ी पार्वती जी की प्रतिमा है। जिसके एकओर कार्तिकेय और दूसरी ओर गणेश जी का अंकन है। अन्यदेवकोष्ठ में चतुर्भुजी देवता जिसका शीर्ष गंर्धभ का है मध्य में आसीन हैं। मंदिर के बाहर समपाद में वामन प्रतिमा, वाहन महिष पर ललितासन में शनि प्रतिमा, अन्तराल में चतुर्भुज गणेश की आसीन प्रतिमा, साथ ही वास्तुखण्ड पद्म से अलंकृत वितानों के प्रस्तर खण्ड विशेष उल्लेखनीय हैं। पुराविशेषज्ञ इस मंदिर और परिसर में संरक्षित परमारिकालीन पुरावशेषों की बहुतायत को दृष्टिगत रखते हुए गंधर्वपुरी परमारकाल में कला की प्रमुख केन्द्रस्थली रही होगी ऐसा मानते हैं। कतिपय पुराशास्त्री गंधर्वसेन की गर्दभ सृदश प्रतिमा की विद्यमानता को परवर्ती राजपूत शासकों से जोड़कर देखते हैं।

अन्तराविन्यास में चतुर्दिक 7 फीट 11 इंच वर्गाकार राजा जी मंदिर में गर्दभ स्वरूपी गन्धर्व सेन की प्रतिमा वैजयती माल, अधोवस्त्र, कटिमेखला व उत्तरीय धारण किये हुए है जिनका दांया हाथ जंघा पर बांया उपर उठा है जिसमे चंवर हैं। इसके उपर दो मालाधार है। सिरपट्टी पर नवगृह अंकन है। बाई ओर ब्रह्मा और दाईं ओर शिव स्थापंन्न हैं। देवालय के भीतर त्रिशाखाद्वार वाले द्वार के नीचे द्वार रक्षक हैं। अर्धमण्डप की छत का वितान उछिप्त है जिसमें पुष्प की पांखुड़ियां अर्धमण्डप में दाई ओर ललितासन में गणेश प्रतिमा, अधिष्ठान पर निर्मित इस मंदिर में खुर, कुंभ, कलश, कपोतली, आदि बंधन हैं। जो लता रत्न, गागरक, जालकर्म और पुष्प अलंकरणों से शोभायमान हैं। देवालय के जंघा से उपर का भाग शिखर, सभामण्डप आदि अर्वाचीन निर्माण कार्य का परिणाम है। देवालय के बाहरी स्तम्भों पर देवकोष्ठों में चारों ओर नायिकाएं उत्कीर्ण है। इनके उपर स्तम्भ अष्टकोणिय हो गये हैं। जिससे दो बंधन हैं। प्रत्येक बंधन में आठ-आठ देवकोष्ठ हैं जिनमें शिव, ब्रम्हा, पार्वती, लक्ष्मी देवी देवताओं के अतिरिक्त कीर्तिमुख शिल्पाकिंत हैं। सबसे उपर भारवाहिकों के प्रकोष्ठ हैं। गंधर्वसेन मंदिर के दायी ओर आले में यम की प्रतिमा है जो अर्धपर्यकासन आसन में बैठे हैं।

गंधर्वसेन मंदिर के प्रवेश द्वार के बायीं ओर वामन ब्रम्हचारी की प्रतिमा (जो विष्णु के वामन अवतार रहे है जिन्होंने तीन पगों में सम्पूर्ण पृथ्वी नाप डाली थी)  महिष उनका वाहन है। दर्शन करके लौटे तो अहाते में हमें दो ऐसी निधनी महिलायें मिलीं जिनके लोक गीतों में राजा गंधर्वसेन के प्रति माथा नवाकर आश्वस्त होने के भाव दिखायी दिये। मंदिर से निकल कर पैदल चलते हुए नदी तक आने के मार्ग में मन इतिहास की परतें टटोल रहा था

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Comments

  1. O P Mishra says:

    Wow! Well written and finely executed. You proved that Gardbhilla was Vikramaditya’s father. You are on the footsteps of Mrs devala Mitra DGA SI. Taking forward the interest in the field of art culture,and archaeology.
    Congratulations!

  2. दिनेश झाला says:

    काफी समय बाद आपकी गन्धर्वपुरी पर रचना पढने के बाद बहुत आनंद आ गया धन्यवाद आभार।
    -दिनेश झाला शाजापुर ।🙏🏻🙏🏻👏👏

  3. Shyam says:

    दीदी नमस्कार.केसर बाई के लोकगीत मे आनंद आ गया आपके द्वारा हमे कई सारी एतिहासिक जानकरी प्राप्त हुई आपका आभार.आपको बधाई.

  4. वीरेंद्र सिंह says:

    ऊँ नमः शिवाय आपका नया ब्लाग पढ़ कर अति प्रसन्नता हुई परन्तु उससे अधिक जिज्ञासा बढ़ गयी गन्धर्व पुरी के बारे में एक ऐसे प्रतापी राजा और वंश के बारे में जिन्होंने परमार वंश की नीव रखी जिनका साम्राज्य मध्य भारत से दक्षिण भारत तक फैला हुआ था जिनके वंशज एक महान सम्राट विक्रमादित्य हुए तो दूसरे राजा भर्तृहरि जिन्होने हिन्दू धर्म का मार्ग दर्शन किया, सबसे बड़ी बात जो आपके शोध से सामने आयी कि किस प्रकार पहले के इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के साथ घोर अन्याय किया है आपने जिस तरह से पूरी प्रमाणिकता के साथ तथ्यों को सामने लाने का प्रयास किया है शायद इससे आने वाले समय में भारत का प्राचीन इतिहास पुनः एक बार ऐसे ही शोध के साथ देश दुनिया के सामने लाने की आवश्यकता है, आज की जो युवा पीढ़ी जिसको अपने गौरव शाली इतिहास को ना तो बताया गया और ना तो दिखाया गया ऐसे छात्रों के लिए आपका ये लेख किसी अमूल्य खजाने से कम नहीं हैं पर मेरा उन छात्रों से भी निवेदन है कि वे आपका लेख सिर्फ पढ़े नहीं बल्कि गंधर्वपुरी आकर स्वयं अवलोकन भी करे ।इतिहास में प्रामाणीकता सिर्फ किताबों के अन्दर नहीं बल्कि भारत के लोककथाओं में व लौकक्तियो में भी भरे पड़े हैं । जिसको ये पश्चिमी मानसिकता वाले इतिहासकारों ने बड़ी चालाकी से नकारने की कोशिश की । मेरे विचार से आपका ये लेख राजपूत वंश में परमार वंश को और अधिक गहराई से जानने में सहायक सिद्ध होगा ।गंधर्वपुरी को सरकार को विश्व धरोहर स्थल व पर्यटक स्थल घोषित करना चाहिए जिससे भारतीय अपने गौरव शाली इतिहास को जान सके व राज्य का भी आर्थिक विकास हो ।

  5. कमलेश बुन्देला says:

    अति सुन्दर जानकारी
    कमलेश बुन्देला

  6. दयाराम सिरोलिया says:

    बहुत ख़ूब दीदी
    दयाराम सिरोलिया देवास