राजस्थान के चितौड़गढ़ के घोसुण्डा की कलगी तुर्रा शैली

राजस्थान

उन्होंने बताया कि ख्याल गायकी की परंपरा हसन बेग साहब से लेकर उनके पिता मिर्जा खाजू बेग साहब और उन तक पहुंचते-पहुंचते लगभग साढ़े चार सौ सालों का सफर तय करती आई है। अपने पूर्वजों द्वारा सौंपी गयी संगीत प्रधान लोकनाट्य शैली को निष्ठापूर्वक सहेजने वाले अगबर काग़ज़ी बताते हैं तुकनगीर और शाहअली दो दंगलबाज संतों ने लोक में पारस्परिक सौहार्द की संकल्पना से तुर्रा कलगी बैठकी ख्याल गायकी परंपरा का प्रवर्तन किया। जिनसे दो अखाड़ों का सूत्रपात हुआ। तुकनगीर और शाहअली के बैठकी दंगल से प्रसन्न होकर तत्कालीन शासकों द्वारा उन्हें तुर्रा और कलगी सम्मान के रूप में दी गयी। तुर्रा और कलगी राजा की पगड़ी पर सुशोभित होने वाले दो आभूषण रहे हैं तो इस प्रकार तुकनगीर तुर्रा के और शाहअली कलगी के संस्थापक कहलाये। तुर्रा में शिव और कलगी में पार्वती की प्रतीकात्मकता उभर कर सामने आयी। जाजम बिछाकर दो अखाड़ों के मध्य होने वाले काव्यात्मक शास्त्रार्थ लोकग्राह्य होने के कारण लोकप्रिय हुए। मिर्जा काग़ज़ी के अनुसार ख्याल गायकी की समता मूलक इस विद्या का यों तो आगरा के निकट प्रारंभण हुआ राजस्थान के मेवाड़ में तुर्रा के उस्ताद श्री चैनराम जी गौड़ और घोसुण्डा के कलगी उस्ताद मिर्जा खाजूबेग जी ने गीतबद्ध दंगलों को विस्तार दिया। जिसका प्रभाव यह हुआ कि राजस्थान के चित्तौड़गढ़ से सटे निम्बाहेड़ा करौली हिण्नडौन, भरतपुर, किशनगढ़ से होते हुए यह कला मध्यप्रदेश के मालवा अंचल में भी जन-जन तक पहुंची। तुकनगीर के अनुयायी भगवा ध्वज के साथ और शाहअली को मानने वाले हरी पताका के साथ शिव-शक्ति की प्रशंसा में कवित्त दोहे- चैपाई लिए आमने सामने हो गए। पुर्लिंग व स्त्रीलिंग के विभेद वाले तुर्रा में पुरूष अखण्ड ब्रम्हचारी तथा कलगी में नारी अक्षत कुंवारी की अवधारणा लिए ख्यालों की रचनाएं हुईं।

चंग या डफ के साथ-साथ शहनाई ढोल-पेटी और नगाड़े वाले संगतियां सम्मिलित हुए। मशाल के प्रकाश में रात-बिरात चलने वाली महफिलों में पारस्परिक कटाक्षों और व्यंगात्मक चुटकियों की भी वर्षा होने लगी। यह बात अलग है कि उनकी वाकपटुता कभी भी वाककटुता में नहीं बदली। चौक चौबारे गलियां मण्डियां ख्याली दंगलों की चर्चाएं होने लगीं। मिर्जा काग़ज़ी उदाहरण देकर बताते हैं-
कलगी- झण्डी झक मारे माणक चौक में तुर्रे वालों की तुर्रा तुम्हारा ब्रह्म है कलगी जनानी आप की
तुर्रा-   तुर्रे के संग भेज दो होगी मेहरबानी आपकी अगर नहीं भेजोगे तो होगी खराबी आपकी
कलगी- बाप की वो माने जिसके कि बाप हो बिन बाप का तुर्रा तुम्हारा तुर्रे वाले आप हो
तुर्रा-   तुर्रा तुम्हारा भ्रम है अकल करनी आपकी जनानी जननी को कहो बस यह नादानी आपकी
बेहूदा गर बका ऐसी दूंगा थापकी मिर्जा खोजूं का पट्ठा हूं धौंस नहीं तेरे बाप की (रदीफ काफिया)
आज महफिल में हूं कहने का मौका है।
अपनी मां को लेके जाओ किसने रोका है।

गीतों के माध्य से होने वाले दंगल में झाड़सई, मुंडावर, सिंधु मारवाड़ी, बहर तबील, बहरदून, चैअंग, तैअंग, दादरा अठंग, तिलोना, कहरवा के अतिरिक्त गजल, चूंदड़ी, छोटी कड़ी-बड़ी कड़ी, रसिया आदि रंगतों की प्रयुक्ति से जान डाली जाती है। असीर होना पड़ा है मुझको हुआ जो शहदा जो गुलबदन का बला का बुज़दिल का बाग़वान का बेरुख़ी का इस प्रकार से आठंग लिखा जाता है जिसमें आठ बार ब शब्द की पुनरावृत्ति होती है। स्वयं काग़ज़ी साहब ने भी गणपति वंदना लिखी है जिसमें न शब्द का पुनरावर्तन हुआ है
गणपति जय गजवदन
शुभ गुण सदन
यक रदन शुद
कारन करन
अति वेद्यतन
राखो प्रण तारन तरन
गुण ज्ञान घन
होके मगन टालो विघन
कहे जगजगन लई तब शरन
सखी-नमो गणपति सभी गजवन
शंभु सुत पार्वती नंदन
झलकता मस्तक पर चंदन
निरख छवि कहें संतन घन
नमों नित गुरू गणेश ज्ञानी
करो अकबर की इलम बानी
जाजम बिछाकर प्रतिदिन आयोजित होने वाली बैठकों में चंग के साथ गणेश जी और गुरू के सुमिरनों के साथ रिहर्सल होती हैं। मिर्जा काग़ज़ी गाकर बताते हैं हमारे यहां शास्त्रार्थ की परंपरा है

जैसे- शिव शक्ति का है जोड़ा वेदों में सार है।
सच पूछो तो तुर्रा कलगी का यार है
जाओ जिधर भी देखो मचा हाहाकार है।
अबला के संग अनीति और भ्रश्टाचार है।
तुर्रा हमारा ब्रह्म कलगी तुम्हारी माया
वेदों के लेख पढ़ लो मिट जायेगा भ्रम अब इस रंगमंच पर लड़ना बेकार है।
सच पूछो तो तुर्रा कलगी का यार है।

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Comments

  1. मिर्ज़ा अकबर says:

    आपने तो कमाल का लिखा है हम पर अहसान किया है हमारी कला को इतनी इज़्ज़त बख्शी है जो आपने किन शब्दों में आपका शुक्रिया अदा करूँ नहीं जानता पर ख़ूब लिखा है आपने ,हमारे फ़न को इससे फ़ायदा होगा यही उम्मीद है

  2. Rini says:

    बहुत सुंदर वर्णन।

  3. वीरेन्द्र सिंह says:

    भोपाल में राजस्थान से आये हुये कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किया गया प्रोग्राम का विडियो बहुत ही कमाल का लगा राजस्थान का ये लोकगीत एवं संगीत तो वैसे ही सबका मन मोह लेता है उसमें भी ये नयी कला राजस्थान की तुर्रा-कलगी बहुत ही रोचक है इस की जो प्रस्तुति की गई है वो बहुत ही कमाल की है दर्शक क्या पसंद करते हैं इस बात को समझ कर उसकी पसंद को अपने कला में शामिल करना ये इन कलाकारों की सबसे बड़ी विशेषता है जिस तरह से इन कलाकारों ने शुरूआत किया वह बहुत काबिले-तारीफ है, और आपने जो इनके उपर अपनी कलम चलाई है आपने ने चार चाँद लगा दिए हैं ।