राजा भोज का भोजपुर, आशापुरी और ढांवला में परमारकालीन मंदिर

bhopal bhojpur raja bhoj

जलाधारी सहित 670 मीटर ऊंचाई लिए भोजपुर का शिवलिंग अन्य मंदिरों से भिन्न स्निग्धत्व वैशिष्ट्य लिए हुए

जलाधारी सहित 670 मीटर ऊंचाई लिए यह शिवलिंग अन्य मंदिरों से भिन्न स्निग्धत्व वैशिष्ट्य लिए हुए था। शिवलिंग इतना स्निग्धत्व लिये हुए था कि उसमें चेहरा स्पष्ट दिख जाए मौर्य काल में मूर्तियों को पॉलिश करने की परिपाटी रही थी, उत्तरवर्ती काल में यह प्रथा लुप्त हो गयी महाराजा भोज ने पुन: इसे प्रारम्भ किया ऐसा विद्वान मानते हैं। जलहरी सिंहासननुमा थी उत्तरभारतीय मूर्तिनिर्माण कला में इस तरह की सिंहासन रचना का प्रयोग तेरहवीं सदी तक मिलता है। डॉ नारायण व्यास के अनुसार इसका प्रणाल सामान्य मंदिरों की भांति ही है पर यहां यह गोमुखी न होकर मकर मुखी है। उन्होंने संभावना जताई कि ‘श्री’ नामक प्रमुख शिल्पी समूह मंदिर के निर्माण संबंधी कार्य में संलिप्त हो सकता है ऐसी जानकारी वास्तुखण्डों में उत्कीर्ण संरचनाओं से भी मिलती है। अनुमान है कि लगभग 1300 चिन्हांकन तथा 50 स्थापतियों संबंधी वृत्त, चक्र, त्रिशूल, स्वास्तिक, शंख आदि संकेत यहाँ उत्कीर्ण हैं।

साक्षात्कार – डॉ. नारायण व्यास, वरिष्ठ पुराविद

व्यास जी ने हमें मंदिर के पूर्वोत्तर कोने में विशाल शिलाफलकों को सुविधाजन्य ऊपर की ओर ले जाने हेतु एक ढालनुमा दीवार की होने की भी जानकारी दी जिससे भारी भरकम वास्तुखण्डों को ऊंचाई तक हाथियों अथवा श्रमिकों द्वारा ले जा पाना संभव हो पाता था। शिखर विहीन इस शिल्प की अद्वितीय कृति पर सूर्य की सुनहली किरणें अठवेलियां कर रहीं थी परिणाम स्वरुप शिवलिंगअग्निशिखा सा दैदीप्यामान था।शिवलिंग का विस्तार इतना था कि दो व्यक्ति भी इसे अपनी बाहों में बांधना चाहें तो भी नहीं बांध सकें, असीम को कौन बांध पाया है भला! हमने मन ही मन बुदबुदाया। वहां खड़ी प्रौढ़ा दर्शनार्थी और मंदिर के पूजनकर्ता के बीच का संवाद हमारे कानों में रह रहकर पहुँच रहा था। वह बड़बड़ा रही थी हमने तो सुना है कि यह मंदिर पांडवों ने बनाया है तो फिर क्यों कहते हैं कि इसे राजा भोज ने बनाया है। जितने मुँह उतनी बातें। भोजकृत राष्ट्रीय महत्व के भोजपुर मंदिर के सम्बन्ध में किवदंतियां है कि पांडवों के वनवास काल में इस भीमकाय मंदिर को एक दिन में भीम ने खड़ा कर दिया था पुरातत्वविद इसे सही नहीं मानते।

साक्षात्कार – डॉ. नारायण व्यास, वरिष्ठ पुराविद

लिंग और आधार पीठ की सौष्ठवपूर्ण समानुपातिक संरचना एक साथ दृढ़ताऔर सौम्यता का आभास करा रही थी। चौकोर जलाधारी 4.40 मीटर ऊँची थी।मातृ देवियां कार्तिकेय, वीरभद्र, गणेश, राम सीता, उदरमुखी यक्ष कलश कुम्भ और मिट्ट युक्त द्वार शाखाएं गगनचारी आयुध, वाद्य वृन्द और सर्प लिए चतुर्भुजी भार वाहक राजा भोज के शिल्प शास्त्र की गरिमामयी प्रस्तुति कर रहे थे।

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Comments

  1. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी सादर प्रणाम एवं चरणस्पर्श,
    दीदी सर्वप्रथम तो ये कहूँगा कि आप बहुत ही सुंदर लिखती है, आपकी शुद्ध और प्रवाहमान हिंदी मुझे सतत ही आपके आलेख पढ़ने को व्याकुल बनाती है। दीदी राजा भोज के बारे आप अपने अगले लेख में कुछ और अनसुना अनकहा ज़रूर बताइए जो आज तक लोगो को नही पता है। सभ्यता और संस्कृति को सहेजने का आपका ये प्रयास बहुत ही सराहनीय है। बस दीदी अंत मे आपसे इतना ही कहूँगा की आप हमें “द रोड डायरी” के माध्यम से भूले बिसरे इतिहासिक तथ्यों से अवगत करती रहें।

  2. O P Mishra says:

    Mamji, thank you very much for taking a lots of interest in heritage.now you putting a path for future generation.ashapuri was my dream project as well Vishakha Ka BHI.you have quoted Sanskrit text and original references which a symbol of serious scholar.i am proud of your researches.bhojpur temple ashapuri are the centre of the paramaras.interviews of the scholars are their own.infuture disclaimer must be in your blogs.dhabla and devbadla you please visit in different angle.you please thanks to commissioner archaeology for keen interest.letus see the future for ashapuri.thanks to you and your driver for moving even in remote

  3. नारायण व्यास says:

    आपने बहुत बढ़िया लिखा ,शब्दों का चयन और वाक्य विन्यास भी अच्छा है विशेष रूप से भरा समन्दर लिख कर जो आपने इस विषय को उठाया है वह नया है
    नारायण व्यास

  4. वीरेन्द्र सिंह says:

    भोजपुर मंदिर व आशापूरी मंदिर के बारे में लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा। मुझे पहले एक बार भोजपुर जाने का व दर्शन करने का अवसर मिला है परन्तु दर्शन के पश्चात मन में अनेक सवाल आने लगे और वहां के पुजारी व आम लोगों की बातें सुनकर और कौतूहल बढ़ गया था ।मन्दिर कि वास्तु कला व निर्माण के बारे मे आप के लेख से मन्दिर से जुडी अनेक जिज्ञासा के उत्तर अपने आप मिल गये,परन्तु एक यक्ष प्रश्न का उत्तर अभी भी शेष रह गया है कि वह मन्दिर आखिर अधुरा क्यो रह गया ।साथ ही आपने वहा पर आशा पूरा देवी से जुडी अनेक जिज्ञासा का आपने बहुत ही सुन्दर रूप शमाधान कर दिया है ।परन्तु सबसे विशेष बात पर आपने ध्यान दिया जो कोई नहीं देता है वह हैं उसके आस पास के क्षेत्र मेंफैले व बिखरे हुए अनेक मन्दिरों के अवशेष जो हमारी समृद्ध संस्कृति को चिख चिख कर बता रहे हैं इससे ये भी पता चलता है आज ये जैसे जंगल और सुनसान स्था न में दिखाई दे रहा है वह कभी बहुत ही सुंदर और व्यवस्थित रूप से बसा हुआ समृद्ध नगर रहा होगा जो समय के थपेडों से उजड़ गया मगर जो वहां वर्तमान में है उसे सरकार और जनता दोनों को सहेजना और सुरक्षा के लिए आगे आना चाहिए ।