राजा भोज का भोजपुर, आशापुरी और ढांवला में परमारकालीन मंदिर

bhopal bhojpur raja bhoj

राजा भोज जिसने भारतीय आस्थावादी संस्कृति का संरक्षण ही नहीं किया बल्कि 104 देवालयों की स्थापना की

राजा भोज की सवर्तोमुखी प्रतिभा सरस्वती कंठाभरण,राजा मार्तण्ड,राजा मृगांकरण,विद्वजनवल्लभ,कीर्तिकौमुदी,सुकृतसंकीर्तन,प्रबन्धचिन्तामणि,भोजप्रबंध इत्यादि ग्रंथों में झलकती है। राजा भोज की लिखी  समरांगणसूत्रधार और युक्तिकलपतरू अभियांत्रिकीय दृष्टि से सर्वोत्तम रचनाएं हैं। समरांगणसूत्रधार में वे मंदिर को ईश्वर की देह और आवास मानते हैं।
शाश्वतम् सुन्दरतम
वास्तु उपयुक्तम् च तद्भवंत शरीर साधनं धर्म
वास्तुक्षेत्र , सुयन्तृकम् योगःकर्मसु कौशलम्
मानक वास्तुकौशलम्।
यों तो मालवा परमारवंश प्रभावक क्षेत्र रहा है  परमार वंश की अनेक शाखाओं में विभक्ति को लेकर जिनमें बागड़ (राजस्थान) चन्द्रावती (आबू) और मालवा में जिसमें वैरिसिंह, सीयक, मुंज, भोज, उदयादित्य, नरवर्मन का नाम प्रमुखता से लिया जाता रहा है उनमे भी उद्भट विद्वान धर्म दर्शन-नीति ज्योतिष, साहित्य, संगीत, शिल्प औषधी और १०४ गीत प्रबन्ध, वास्तु पर 84 ग्रन्थों के रचनाकार,  राजा भोज परमारवंश के सर्वाधिक शक्तिशाली कीर्तिमान धारापति कहलाये। उन्होंने साहित्य का संवर्धन ही नहीं किया अपितु भारतीय आस्थावादी संस्कृति का संरक्षण भी किया और 104 देवालयों की स्थापना की और शैव अनुयायियों के साथ भोजपुर क्षेत्र में  निवासित भी रहे। कुष्ठ रोग से मुक्ति के उपरान्त इस परम् शिव भक्त ने प्रतिपूजित होकर प्रभावोत्पादक भोजपुर मंदिर को ऐसे प्रतिस्थापित किया जिसका प्रकीर्तन चतुर्दिश होने लगा। राजा भोज युद्धवीर ही नहीं दानवीर भी थे। मंदिर की पूर्णता पर उन्होंने  ब्राह्मणों को सोना-चांदी तथा गऊदान भी किया। इतिहासकार लिखते हैं उनके दरबार से याचक कभी खाली हाथ नहीं लौटे, यहां तक कि गंभीर आर्थिक संकट के समय जब उनके मंत्री वत्सराज ने उन्हें चेताते हुए यह सन्देश लिख कर भेजा

बुरो समै कद आ पड़े कोई सकै न जान
बुरा समै न जन्ता कीड़ी संचय धान

राजा भोज उसकी मंशा को भांप गए फिर भी उन्होंने अपनी दान वृति जारी रखी और उसे लिख कर सन्देश भेजा कि

धन संचया कोई होवसी हाथ करण री रेख
इत्त बांटू उत्त धण वधे लिखियो विधाता लेख  (विधाता ने कर्ण जैसी धन रेखा दी है जितना बांटूगा उतना ही बढ़ेगा )

1011 ई से 1046 ई के बीच 8 ऐसे अभिलेख मिलते हैं जिनमें उनके दान कर्मों की जानकारी मिलती है।

जल प्रबंधन की वास्तु युक्ति प्रजाहितैषी राजा भोज को सम्राट विक्रमादित्य के समकक्ष लाती है

राजा भोज के जल प्रबंधन की वास्तु युक्ति प्रजाहितैषी थी जो उन्हें सम्राट विक्रमादित्य के समकक्ष लाती है। चन्द्रगुप्त मौर्य की सुदर्शन झील की भांति राजा भोज को झीलों के निर्माता के रूप में भी जाना जाता है। ऐसी धारणा है कि ‘भोजसर झील’ जो राजा भोज द्वारा संयोजित थी यहीं कहीं स्थित थी जो  17 मील लम्बी 7 मील चौड़ी थी इस क्षेत्र में वर्तमान में 360 ग्राम बसे हैं। ऐसा भी विश्वास है कि भोजपुर ग्रीष्मकालीन पट्टन के रूप में विकसित किया गया था। आज भी यहां की निवासी गोंड  जनजाति दो खड़े और एक आड़े प्रस्तर खण्ड को भोज की नौका से जोड़कर देखती है और बताती है कि नौका में राजा भोज भीम बैठिका से भोजपुर तक की जल यात्राएं किया करते थे। अब तो आप समझ ही गए होंगे तालों में भोपाल ताल और सब तलैया कहने वाले ऐसे ही नहीं कह गए।

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Comments

  1. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी सादर प्रणाम एवं चरणस्पर्श,
    दीदी सर्वप्रथम तो ये कहूँगा कि आप बहुत ही सुंदर लिखती है, आपकी शुद्ध और प्रवाहमान हिंदी मुझे सतत ही आपके आलेख पढ़ने को व्याकुल बनाती है। दीदी राजा भोज के बारे आप अपने अगले लेख में कुछ और अनसुना अनकहा ज़रूर बताइए जो आज तक लोगो को नही पता है। सभ्यता और संस्कृति को सहेजने का आपका ये प्रयास बहुत ही सराहनीय है। बस दीदी अंत मे आपसे इतना ही कहूँगा की आप हमें “द रोड डायरी” के माध्यम से भूले बिसरे इतिहासिक तथ्यों से अवगत करती रहें।

  2. O P Mishra says:

    Mamji, thank you very much for taking a lots of interest in heritage.now you putting a path for future generation.ashapuri was my dream project as well Vishakha Ka BHI.you have quoted Sanskrit text and original references which a symbol of serious scholar.i am proud of your researches.bhojpur temple ashapuri are the centre of the paramaras.interviews of the scholars are their own.infuture disclaimer must be in your blogs.dhabla and devbadla you please visit in different angle.you please thanks to commissioner archaeology for keen interest.letus see the future for ashapuri.thanks to you and your driver for moving even in remote

  3. नारायण व्यास says:

    आपने बहुत बढ़िया लिखा ,शब्दों का चयन और वाक्य विन्यास भी अच्छा है विशेष रूप से भरा समन्दर लिख कर जो आपने इस विषय को उठाया है वह नया है
    नारायण व्यास

  4. वीरेन्द्र सिंह says:

    भोजपुर मंदिर व आशापूरी मंदिर के बारे में लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा। मुझे पहले एक बार भोजपुर जाने का व दर्शन करने का अवसर मिला है परन्तु दर्शन के पश्चात मन में अनेक सवाल आने लगे और वहां के पुजारी व आम लोगों की बातें सुनकर और कौतूहल बढ़ गया था ।मन्दिर कि वास्तु कला व निर्माण के बारे मे आप के लेख से मन्दिर से जुडी अनेक जिज्ञासा के उत्तर अपने आप मिल गये,परन्तु एक यक्ष प्रश्न का उत्तर अभी भी शेष रह गया है कि वह मन्दिर आखिर अधुरा क्यो रह गया ।साथ ही आपने वहा पर आशा पूरा देवी से जुडी अनेक जिज्ञासा का आपने बहुत ही सुन्दर रूप शमाधान कर दिया है ।परन्तु सबसे विशेष बात पर आपने ध्यान दिया जो कोई नहीं देता है वह हैं उसके आस पास के क्षेत्र मेंफैले व बिखरे हुए अनेक मन्दिरों के अवशेष जो हमारी समृद्ध संस्कृति को चिख चिख कर बता रहे हैं इससे ये भी पता चलता है आज ये जैसे जंगल और सुनसान स्था न में दिखाई दे रहा है वह कभी बहुत ही सुंदर और व्यवस्थित रूप से बसा हुआ समृद्ध नगर रहा होगा जो समय के थपेडों से उजड़ गया मगर जो वहां वर्तमान में है उसे सरकार और जनता दोनों को सहेजना और सुरक्षा के लिए आगे आना चाहिए ।

  5. Rajesh Dixit says:

    इतिहासको चालना देनेके लिहाजसे यह ब्लॉग्ज उपयुक्त है…आपकी संशोधन पद्धती एवं सादरीकरण बढिया है…आपने इस ब्लॉगमे हमारा उल्लेख किया है – शुक्रिया…

  6. आभा शर्मा says:

    प्रिय दिशा जी,
    एक बार फिर थोड़े विलम्ब के बाद आपका चरवैती पवित्र ब्लॉग पढ़ा जिसमें आपने भोजपुर जैसे प्राचीन पवित्र मंदिर को राजा भोज सहित अपने पाठकों को कण-कण से अवगत कराया। हम और हमारा परिवार वहाँ दर्शन करने एक-दो बार जा चुके हैं पर इतना विस्तार हम लोग भी करने में असमर्थ हैं। आपने तो जैसे पाठकों को साक्षात वहाँ खड़ा कर दिया, सबको शिवमय बना दिया। मंदिर के साथ राजा सहित वो जानकारियाँ जो शायद हमारे पास थी हीं नहीं आपने नारायण व्यास जी से भी जो प्रश्न पूछे वो रही सही हमारी और आपके और पाठकों की जानकारी पूरी कर रहे थे। चरवैती के हर ब्लॉग में आपने जैसे अपनी आत्मा डाल दी।

    मैंने आपके ब्लॉग द्वारा चरवैती की ज्यादातर यात्राएँ कीं। आपने जैसे यात्रा के साथ हमें उस शहर, वहाँ के भोजन, वहाँ की आबो-हवा, वहाँ की मिट्टी की सौंध, मंदिर का साक्षात विवरण किया। मैंने अभी तक इतना दिलचस्प पवित्र ब्लॉग नहीं पढ़ा। सिर्फ लिखना ही काफी नहीं है, पाठकों को यह दिखाना भी ज़रूरी है कि मेरी यात्रा में आप कहीं भी धूमिल नहीं हों। हर यात्रा चरवैती आपके लिए है। जो आपने किया आपका ब्लॉग पढ़कर अपने आप होठ ॐ नमः शिवाय का जाप करने को आतुर हो जाते हैं। आप ऐसे ही चरवैती हमारे लिए लिखती रहें। आपको बहुत बहुत आशीर्वाद, प्यार और शुभकामनाएँ। मुझे आपके साथ अगली यात्रा का इंतज़ार है।