गुजरात की भवाई लोकनाट्य शैली, राजस्थान की मांगणियार गायकी

नर्म-मर्म और हास्य कर्म में निम्नस्तरीय फूहड़ता के प्रचलन का गुजरात की लोकनाट्य शैली में सर्वथा अभाव रहता है। बीच-बीच में भवाई कला में नट विशेष आकर्षण स्वरूप नृत्य करते हुए साड़ी से मोर और कबूतर बनाने की परिपाटी का भी प्रस्तुतीकरण करते हैं हमने देखा भवाई लोक नाट्यकला के मंचन से संबंद्ध इस मण्डली के अधिकांश कलाकार उम्रदराज हो चुके हैं फिर भी  इस प्रदर्शनकारी कला का मोह नहीं त्याग पा रहे हैं। भले ही पूरी रात चलने वाले लोकनाट्य से मात्र 5000 रूपये उनकी मण्डली को पारिश्रमिक के रूप में मिलता रहे वे अपने पूर्वजों की इस अद्वितीय कला को जीवंत रखने के अभिलाषी हैं। अन्यत्र खेती और मजदूरी करने वाले ये लोककलाकार शादी, तीज त्यौहार के अवसर पर अपने रसिकता भरे कार्यक्रमों से गांवों में मनोरंजन करते रहेंगें। भवाई का एक और अन्य आकर्षण है उसकी पात्रोचित रूपसज्जा। ये कलाकार आज भी पारंपरिक परिधान और रंग सज्जा सामग्री प्रयुक्त करते हैं।

स्त्री पात्रों की सजावट हेतु महिलाओं की आभूषण प्रिय प्रवृत्ति और श्रृंगारपरक वेशभूषा पहनी जाती है। जिसे किसी अन्य लोकनाट्य से अपेक्षाकृत अनेक बार बदलने का भी क्रम निरंतर चलता रहता है। पारंपरिक कुंकुम के प्रयोग से लालिमा, काजल से कालिमा,  बोदार पत्थर को घिसकर मुंह पर आलेपन कर गोरा रंग कर लिया जाता है। जिसमें आधुनिक पाउडर लिपस्टिक और ब्लशर का कोई स्थान नहीं होता। कुंकुंम को ही गीला कर होंठों की लाली बनाली जाती है। स्वयं को हट्टा कट्टा दिखाने वाला पात्र डील डौल को विकराल बनाने के लिए रूई की गादी व गूदड़े का प्रयोग कर लेता है। ये सभी पात्र घुंघरू बांधकर ही मंच पर आते है। भवाई भजने (रूप भरने) की कला है।  सांगीतिक और साहित्यिक पृष्ठभूमि वाले ब्राह्मणों द्वारा जनित, पालित व पोषित इस कला को भारद्वाज गोत्रीय सिद्धपुर के यजुर्वेदी औदिच्य ब्राह्मण असाइत ठाकर ने प्रतिष्ठा दिलाई। इतिहास साक्षी है कि ऊंझा ग्राम के हेमा पटेल की पुत्री गंगा के शील की रक्षा हेतु बादशाही जमाने में उनके साथ भोजन करने पर जाति से बहिष्कृत कर दिये गये असाइत से तरगला (गाना-बजाना) करने वाली नायक जाति का  प्रार्दुभाव हुआ। असाइत ने 365 भवाई वेशों की सजृना की जिसमें अम्बे मैया की अराधना संग्रहीत है। गुजरात के सौराष्ट्र में एक कथा प्रचलित है कि असाइत एक पुरोहित था। जिसने एक कणबी लड़की को विधर्मी के घर से मुक्त करा कर उससे विवाह किया था।

अछूता से विवाहोपरान्त सामाजिक दण्डस्वरूप जात बाहर कर दिये गये असाइत ने पौरोहित्यकर्म के स्थान पर अभिनयन गायन के माध्यम से उदरपूर्ति करना प्रारंभ कर दिया और यही से भवाई का सूत्रपात हुआ।  उनके रचित 365 वेशों में से कच्छ जैसल, हरिश्चन्द्र तारामती, राजा भृतहरी, आलड़ देवरों, कृष्णलीला, कजोड़ा बीको, जसमा ओडण,  सिसोदिया, झंडो तेजण, पुरबियो आदि आज भी श्री प्रकाश हरिलाल पैजा जी की मण्डली द्वारा खेले जा रहे हैं। लोकाश्रय प्राप्त इस कला के संदर्भ में जानने के लिए हमने प्रकाश पैजा जी से संपर्क साधा उन्होंने बताया कि भवाई में चार महीनें घर से बाहर रहकर परंपराओं का अनुशीलन दृढ़ता के साथ करने की परिपाटी है जो आज के युवाओं को रास  नहीं आती इसलिए यह कला लुप्त प्राय हो रही है। मन बहलाने के लिए गीत, नृत्य, अभिनय के माध्यम से कथा प्रवाह को आगे बढ़ाने वाली इस लोक विधा में रंगसज्जा और वेशभूषा की सामग्री का आधिक्य  होता है, जिन्हें ट्रक भर कर पहुंचाया जाता है।

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