गुजरात की भवाई लोकनाट्य शैली, राजस्थान की मांगणियार गायकी

लहरिया, गोरबंद, हिचकी, केसरिया, निंबूड़ा, लोकगीत लंगा भी गाते हैं पर उनके यजमान मुसलमान धर्म को मानने वाले होते हैं। गफ्फूर खां जी से इस संबंध में हुई चर्चा के आधार पर हम यह अन्तर समझ पायें। जागरण में कृष्ण, राम, सीता, मीरा और कबीर के निर्गुण भजनों से रसवर्षा करने वाले गफ्फूर खां बताते हैं कि उनकी देवी वंदना जागी जागी जोती जगदम्बा की जागी और गणेश जी के महाराज गजानन आओ जी मंडले में रंग बरसाओं जी किसी भी कार्यक्रम की प्रारंभिक प्रस्तुतियां होती हैं। सोरठ, सारंग, सूब, मांड, पूरिया, बुदवास के सहजाकर्षण और घण्टों के प्रतिदिन के रियाज़ से आवाज का लचीलापन मांगणियारों के स्वरों को उठान देते हैं मांगणियारों ने यों तो बालीवुड के अनेक चिरपरिचित गीत गाये है पर गफ्फूर खां इसके विपरीत परंपरागत यजमानी में अपने गीतों को सुनाना श्रेयस्कर समझते हैं। समाज की महिलाएं भी गीत गाती हैं पर अपने भक्तिधारा से ओत प्रोत व संस्कार गीतों को रजवाड़ों और अपने आश्रयदाता राजपूतों के घरो में बैठकर ही सुनाती हैं। गफ्फूर खां बताते हैं कि हमारे यहां बच्चा होते साथ ही सुर में रोता है। निजीस्तर एक शिक्षण संस्थान के माध्यम से बच्चों के राजस्थानी वाद्यवृन्दों और लोकगीतों का प्रशिक्षण दे रहे गफ्फूर खां के अनुसार हर मांगणियार की शिराओं में संगीत प्रवाहित होता है।

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