छोटी टेकाम के गोंड चित्रों में गूलर, महुआ, सरई और साजा के पेड़

ये तो आप भी मानेंगे कि प्रकृति के साहचर्य में पली-पुसी जनजातीय चित्रकला में परम स्वाभाविकता, सहजता और सरलता दृश्यमान होती है, कृत्रिमता का इसमें लेशमात्र भी स्थान नहीं होता। भोपाल स्थित जनजातीय संग्रहालय की लिखंदरा दीर्घा में गोंड बहुल डिंडौरी जिले के गाँव सनपुरी के अरण्यगामी संस्कृति के बिम्ब देखने का सौभग्य प्राप्त हुआ। रचनाकर्म में डूबी हुई चितेरी श्रीमती छोटी टेकाम हमें अपने गूढ़ार्थ लिए मौलिक कला संसार के साथ वहीं मिल गयीं। उनके स्वाभाव की निश्छलता ऐसी थी मानो किसी प्रशांत नदी में अपना प्रतिबिम्ब निहार रहे हों। लेकिन साक्षात्कार के दौरान ज्यों-ज्यों उनके विचार सामने आते गए लगा नदी मानो सहस्त्रों जलधाराओं के साथ प्रबल वेग से प्रवाहमान हो। अपनी माटी से अगाध लगाव रखने वाली श्रीमती टेकाम के चित्रों में श्रमसाध्य जनजातीय जीवन की फुरक है । कल्पना की उड़ान तो  है पर जमीन कहीं छूटती नहीं दिखती। श्लाका शीर्षक से आयोजित उनकी प्रदर्शनी में रेखाएँ हैं, रेखाओं का उलझाव है, रंग हैं, रंगों में विलक्षणता है। वन में विचरने वाले पशु पक्षी, वृक्ष वनस्पति, गाँव , कृषि ,संस्कार, संस्कृति, सभी उनके चित्रों के विषय बने हैं। श्रीमती टेकाम बताती हैं कि गोंड संस्कृति में प्रकृति चित्रण का विशेष महत्व है। विदाई के समय  फड़की पक्षी से संबंधित मंगलगीत, बारात की अगुवाई वाले हिरण गीत, गोंड समुदाय में शादी ब्याह की अवसर पर सरई की टहनियों से निर्मित मंडप की छत्रछाया में बड़ादेव की आराधना में गाये जाने वाले गीत उनकी स्मृतियों में गहरे पैठे हुए हैं ,वे बताती हैं कि वन्यजीवों के चित्रांकन की पृष्ठभूमि में ग्राम गीत और ग्राम परिवेश है और है निश्छल जनजातीय जनमन जो हर परिस्थिति में आनंद की चाहना लिए जीता  है। ग्राम उनकी वाणी में नहीं, मस्तिष्क में नहीं, हृदय में विराजमान है। या यूँ कह लें शहरी जीवन की करवटों का अवलोकन करने के बाद भी उनकी चित्रकला गाँवों का मोह नहीं छोड़ पाती है। सहायत्व, सारंग और सामोद उन्हें बहुत भाता है। एकाकी जीवन से दूरी बरतते हुए वे सामूहिकता को महत्व देती हैं। आठवीं कक्षा तक पढ़ीं श्रीमती टेकाम ने रामसिंह उर्वेति जैसे शीर्षस्थ गोंड चित्रकार से गोंड चित्रकला की बारीकियाँ सीखी हैं। बीते 15 वर्षों से देश के अलग अलग शहरों मुंबई हैदराबाद बेंगलोर मैसूर की प्रतिष्ठित दीर्घाओं में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकीं  श्रीमती टेकाम के कैनवास पर साजा भी है, महुआ भी है, गूलर और सरई के वृक्ष भी हैं तो उनके तले झुण्ड में उछलते-कूदते हिरन, गब्दू हाथी, शेर, लकड़बग्घे, गाय-बैल , चिंचियाते पंछी और सैला नृत्य करती महिलाओं का समूह भी है। बारहसिंगा कहीं गुलाबी है तो कहीं  हरा, कारण यह कि रंग उन्हें बहुत प्रभावित करते हैं रंगों से मनोभावों को उतारती उनकी सृजनधर्मिता कैनवासों के  माध्यम से संवाद स्थापित करती है।  आध्यात्मिक अवधारणााओं और मिथकों  पर आधारित  जनजातीय चित्रकला उन्हें  विषय से इतर नहीं जाने देती पर  हाल के दिनों में उन्होंने आस्ट्रेलियाई कंगारुओं को भी अपनी गोंड कला में  चित्रित किया है। विदेशी चित्रकारों के सम्पर्क में आने  और व्यावसायिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु यह वांछनीय भी था, कंगारुओं ने तो उनके परिवार के जीवनयापन  की राह आसान कर दी। हाथो-हाथ बिकते गए कंगारू रेखाचित्रों की मांग ने उन्हें नई -नई संभावनाएं तलाशने के लिए  अभिप्रेरित किया, कई विदेशी क्रेता-विक्रेता उनसे जुड़ते गए, कई व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की भीतें उनकी कृतियों से सज-संवर गयीं। काली देवी की अराधक श्रीमती टेकाम प्रतिदिन माँ की अर्चना के बाद ही श्वेत-श्याम अथवा चटकदार रंगों वाली गोंड चित्रकारी में रत होतीं  हैं। वे स्वयं को ही आगे देखने की हामी नहीं हैं बल्कि मानती हैं कि जितना जड़ों का मिट्टी में होना और मिट्टी में नमी का होना आवश्यक है उसी प्रकार वे भी अपने क्षेत्र के जनजातीय चित्रकारों को आगे देखना चाहती हैं। वे बताती हैं कि डिंडौरी जिले में बहुत से ऐसे गोंडी चित्रकार हैं जिनकी ऊर्जा मूल रूप से जनजातीय जनजीवन के चित्रण में खपने के उपरांत भी अचर्चित रह जाती है,  उचित संसाधनों के अभाव में न तो कला के संरक्षक और न ही व्यवसायी उन तक पहुँच पाते हैं। इस वर्ष को गोंड कला वर्ष घोषित किए जाने के सरकार के निर्णय की वे मुक्त कण्ठ से प्रशंसा करती हैं और चाहती हैं कि सरकारें इस ओर ध्यान दें जो अभावग्रस्त जीवन उन्होंने जिया है वो उनके क्षेत्र विशेष के लोगों के हिस्से में  कभी नहीं आये ।

                          गोंड चित्रकार छोटी टेकाम की सहजाभिव्यक्तियाँ

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