राजा विक्रमादित्य की बहन सुन्दराबाई का गांव सुन्दरसी

यात्रा का प्रारम्भ : भोपाल से सुन्दरसी पहुँच मार्ग में अखंड सनातन सत्य सी ग्राम्य संस्कृति

कभी-कभी अनजाने ठिकानों को हेरना (ढूँढना) बहुत भला लगता है, है न!! इसीलिए  मुँह अँधेरे सूरज के जागने से पहले  इस बार हम श्यामपुर चांदबढ़ से होते हुए SH 41 मार्ग पर छतनारे बबूल के हट्टे-कट्टे वृक्षों के बीच से निकलकर  मालवांचल के गाँवों में अखंड सनातन सत्य सी ग्राम्य संस्कृति और तोतों-मोरों वाले भव्य नैसर्गिक विलास को निहारते हुए आगे बढ़े जा रहे थे। शाजापुर जिले के अंतर्गत आने वाला सुन्दरसी कस्बा हमारी गंतव्य स्थली था। हमने सुन रखा था ईसवी की प्रथम सदी में उज्जैन के राजा रहे मुकुटमणि वीर विक्रमादित्य की बहिन सुन्दराबाई का विवाह तब के सुंदरगढ़ और आज के सुंदरसी  के राजा भगवत सिंह से हुआ था। भारतीय जनमानस के विश्वास्य लोक सम्राट विक्रमादित्य के बहनापे से सम्बंधित कहे-अनकहे इतिहास को टौरने (पता लगाने) का मन लिये हम घर से निकले थे। मार्ग में पहले अनमनी सी पारवा नदी मिली, विंध्य पर्वत श्रृंखलाओं से प्रगटी चम्बल में समागमित होने जा रही पार्वती नदी की बारी भी आई, मालवा की उर्वर धरा में डग-डग रोटी, पग-पग नीर वाली उक्ति का दिग्दर्शन करते हुए हम आगे 752 सी राष्ट्रीय राजमार्ग पर सुन्दरसी की ओर बढ़े जा रहे थे। । मन मंथन में रत था।  पुरातन 16 महाजन पदों में से एक अवन्ति जनपद के महत्तर अंश रहे  मालवा के पश्चिमी मुख्यद्वार कहलाने वाले  जिला  शाजापुर की धरा उज्जैन के राजा विक्रमादित्य, मौर्य काल, शुंग काल, चष्टन वंशीय शक क्षत्रपों, हूणों, औलिकरों, मौखरियों के अतिरिक्त  गुप्त काल,  हर्ष काल, सातवाहन , प्रतिहार और परमारकाल के वैभविक प्रमाणों से परितोषित क्षेत्र रही  । कभी दक्षिण से उत्तर का व्यापारिक पथ इसी भू-भाग से होकर गुजरता था। अशोक ने भी उज्जैन से विदिशा के मध्य गमनागमन हेतु इसी भूखंड को उपयुक्त जाना था।

भोपाल से सुन्दरसी के पहुँच मार्ग में पारवा, पार्वती और काली सिंध नदियाँ

बांवरि ब्राह्मण के 16 शिष्य यहीं से पथगामी होकर दक्षिण स्थित प्रतिष्ठान (पैठन) से श्रावस्ती पहुँचे थे। शेरशाह सूरी के शासनकाल में भी जिन चार प्रमुख मार्गों की निर्मिति हुई थी, उनमें से एक मार्ग इसी शाजापुर जिले से होकर गया था। मालवा तो देश का चौराहा रहा, कभी दक्षिण-पश्चिम पर विजय प्राप्त करने का पथ भी यहीं हुआ करता  था। विन्ध्यपर्वत शृंखलाओं की तलहटी में डूँगरियों से घिरी उर्वरा भूमि, स्वास्थ्यप्रद जलवायु और नदियों से अभिसिंचित यह धरणी सभी नरेशों को आकर्षित करती रही। दूसरी सदी ई. तक अवन्ति के नाम से कीर्तित रहे इसी भू-भाग को सातवीं आठवीं शताब्दी में मालवा के रूप में पहचान मिल चुकी थी। हमने शाजापुर  जिले की ऐतिहासिक भौगोलिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने की मंशा लिए उज्जैन के वरिष्ठ पुराविद डॉ. रमण सोलंकी जी से सम्पर्क साधा।

मन को जरा सी ढील दो कितना गुनने बुनने लगता है, है न !! मार्ग के दोनों ओर का लोक जीवन पल-पल छिन छिन तनावहीन शान्ति का अनुभावक बनाए जा रहा था। शाजापुर जिले की शुजालपुर तहसील के देवगूलर से गुलर, पानखेड़ी से पान, खजुरियाँ से खजूर, मकोड़ी से मकई, निपानिया धाकड़ से नीम और खंखराखेड़ी से खांखरे कब के गायब हो चुके थे। मार्ग में  पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले से आये आम्रपाली और सुवर्णरेखा के बारामासी पौधे लिए गाँव-गाँव फेरी लगाते लोग दिखाई दिए। हमने रोककर उनसे जाना कि हर साल पश्चिम बंगाल से चालीस लोगों का जत्था  300 रूपए मूल्य वाले ऐसे तीन हजार पौधों को  धान के अवशिष्ट या बिचाली खोड़ (बंगाली भाषा) में बाँधकर मध्यप्रदेश के इस भू-भाग में पौधों की नई किस्मों का  प्रदाता बनता  है । ये हमारे लिए निजूठी जानकारी थी। सोचा आप तक पहुंचा दें। भोपाल से 130 किमी दूर  खिलती हुई धूप में गाँव बच्चों की भांति उमगने लगे थे। खजूर और खाखरा के वृक्षों वाले क्षेत्र में छोटी बुआ खेड़ी, भतीजी खेड़ी, चाचा खेड़ी, मकोड़ी, सखेड़ी में हेल-मेल भरे भावों को समझते हुए हम मातृवत्सला के अखंड प्रवाह सी काली सिंध नदी के मुहाने पर आ खड़े हुए थे, जिस पर अधूरा बना एक पुल विकास की बाट जोहे खड़ा था। कालिदास के मेघदूत में दशार्ण और अवन्ती जनपद की सीमाओं का निर्धारण करने वाली वराहमिहिर द्वारा स्मृत हुई कृष्णासिंधु अर्थात काली सिंध नदी सूने उजड़े किनारों के बीच शनैः शनैः चम्बल नदी में मिलने की अकुलाहट लिए सरक रही थी।

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Comments

  1. बंशीधर बन्धु, ज़ेठरा जोड़ says:

    बहुत ही रोचक, तथ्य परख और महत्वपूर्ण। बधाई!

  2. Varsha Nalme, Ajmer says:

    Thanks maam…aadha pd liya ..bahut sunder matter n pics 👌💐💐💐😊

  3. ललित शर्मा, झालावाड़, राज. ('महाराणा कुम्भा इतिहास' अलंकरण) says:

    -पुरोवाक-

    भोपाल की सांस्कृतिक अस्मिता और लोक संस्कृति से अभिप्रेरित पत्रकार दिशा अविनाश शर्मा द्वारा एक लम्बे अरसे से मध्य प्रदेश की कई ऐसी लोकसंस्कृति धारोहरों पर ऐसा अनछुआ कार्य किया जा रहा है जिसके माध्यम से अनेक तथ्य व सांस्कृतिक पक्ष प्रकाश में आ रहे हैं।

    हाल ही में उन्होनें शाजापुर जिले के परमारकालीन सुन्दरसी ग्राम में स्थित महाकाल मंदिर तथा अन्य मंदिरों की लोक संस्कृति का चित्रण जिस प्रकार अपने परिश्रम से खींचा वह आश्चर्यचकित कर देने वाला है। उन्होंने सुन्दरसी की कथा, इतिहास के साथ विक्रमादित्य की अनुजा सुन्दरबाई के वृतान्त के साथ उस क्षेत्र के ग्रामीणों, बुद्धिजीवियों, कवियों के साक्षात्कार लेकर इस महत्ता को प्रमाणित किया है। दिशा शर्मा ने इसी के साथ चित्रों के माध्यम से पुरातत्व की दुर्लभ मूर्तियों, मंदिर, स्थापत्य के साथ स्थानीय ग्रामीण, पथ, सघन वन तथा ग्रामीण आवास का ऐसा जीवन्त चित्रण किया है मानो यहाँ की संस्कृति हमसे संवाद करने को तत्पर हो। उनके इस कार्य को महसूस कर यहाँ कहा जाना सटीक होगा कि- भारत की सच्ची लोक संस्कृति के दर्शन हमें सुन्दरसी जैसे ग्रामों में ही दिखायी देते हैं। सद् प्रयास हेतु हृदय से अभिवादन।

  4. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी बहुत ही सुंदर औ मनोहरी वर्णन है, आपकी लेखनी का जवाब नही है, सीधे मन मस्तिष्क पर प्रभाव डालती है।। इतिहास के गर्व से निकाल कर फिर एक बार एक ऐतिहासिक सत्य से सभी अनभिज्ञ लोगो को अवगत कराने के लिए धन्यवाद।।

  5. रामाराव जाधव सुन्दरसी says:

    धन्यवाद मैडम जी हम सभी गाँव वाले आभारी हैं आप के।

  6. Indra Dikshit, Pune says:

    To much scope in Archaeology. Best wishes to U. Nice research papers.

  7. O P Mishra, Bhopal says:

    I have read the complete text and videos ,photographs related to sundarsi ancient site in Malwa region.raman Solanki and Prashant Puranikji are the scholar’s in that region.puranshahgal also give informative.your report on this topic needs no comment.excellent matter .regarding this arealocal folk songs are also be quite impressive.photographs are to be in the photo archives.now no serious scholars moving for such academic researches.thank you very much for your field work and taking interviews of the very senior citizens.you are adding new chapters in archaeology, social areas,art,architectures and religious fields.once again thank you very much for taking interest.

  8. देवेंद्र प्रजापति, सुन्दरसी says:

    जय श्री महाकाल

    आपके द्वारा भूत भावन महाकाल की नगरी सुन्दरसी (सुंदरगढ़) के अवन्ति के राजा विक्रमादित्य की बहन सुंदराबाई जिनका विवाह सुंदरगढ़ के राजा भगवत सिंह से हुआ था एवं उज्जैन में जितने भी मंदिर थे उतने मंदिर ग्राम सुन्दरसी (सुंदरगढ़) में बनाए गए, विक्रमादित्य की बहन सुंदराबाई रोज सुबह महाकाल मंदिर एवं अन्य मंदिरों में दर्शन करने जाती थीं, यह सभी जानकारी आपके द्वारा बड़ी ही सुन्दर सटीक सरल भाषा के प्रयोग के साथ वर्णित की गई है। इससे हमारी नई पीढ़ी को ज्ञान प्राप्त होगा एवं इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त होगी।

    इससे मैं आपको सहृदय प्रणाम करता हूँ।

    “जय श्री महाकाल”

  9. राम प्रसाद ' सहज ' शुजालपुर says:

    रोचक, श्रेष्ठ व संग्रहणीय ।
    ‘साहसिक कदम ‘
    ‘हार्दिक बधाई’
    👌✍️👌

  10. Umesh Pathak says:

    ब्रह्माण्डीय यात्रा में हमें कब कहाँ जाना होगा यह निर्णय तो उसके निर्माता और नियन्ता के हाथ में ही होता है। पर यात्रा के अनुभव को उस मार्ग के विश्राम स्थलों के सहयात्रियों के साथ साझा किया जाता है। ज्ञानवृद्ध सहयात्री अपने अनुभवों से अग्र गमक जनों के लिए पथ प्रदर्शक होते हैं। आदरणीय बहन श्रीमती दिशा अविनाश शर्मा भोपाल भी एक ऐसी सहयात्री हैं जो अपनी मार्ग दैन्दिनी (रोड डायरी) सृज कर वर्ण, ध्वनि, व चित्र पिपासुओं को सुरम्य सुखद उद्यान उपलब्ध करती हैं। उनका सुन्दरसा (सुन्दरसी) यान्त्रिक ग्रन्थ (ब्लाग) वन्दनीय व नमनीय है। विक्रमादित्य के काल से अब तक के अनगिनत सृजनधर्माओं के कर-चिन्हों व ध्वनियों के संग्रहीत और संयोजित कर रामायण रघुवंश, रामचरितमानस या कामायनी जैसा सृजन दिशा बहन आपने दिया है। इसमें इतिहास, साहित्य, संगीत और कला (नैसर्गिक दृश्य) सब कुछ समाहित हैं, इसलिए यह एक महाकाव्य है। तथा भारत भूमि के महाप्रतापी नृप विक्रमादित्य को श्रद्धावनत पुष्प गुच्छ हैं। मेरे जैसे अनुजों औद इतिहास, साहित्य, संगीत व कला अनुशीलकों को आपका लेखनीय वरद हस्त सदैव शारदीय व वासन्तिक रहे इन्हीं कामना व भगवान धरणीधर व माता गंगाजी से प्रार्थना के साथ।

    आपका अनुज,
    उमेश पाठक
    वासन्तीय नवरात्रि प्रतिपदा, वि0सं0 2077
    मौ0 चैदहपौर महीधर्राचन खडगगिरिमठ
    पो0 सोरों सूकरक्षेत्र
    जनपद- कासगंज उ0प्र0

  11. बालकृष्ण लोखण्डे, भोपाल says:

    रचियेता द्वारा तथ्यों परक अनुशोधों की तह परत दर परत स्थलों की अनुश्रुतियों/किंवदंतियों पर ही नहीं प्रमाणों को अपनी श्रृशुधा शांत करने के संकल्प में यथासंभव भ्रमणशील को नमन्ति स्वीकार हो।

  12. दिनेश झाला, शाजापुर says:

    🙏🏻🙏🏻 आपके द्वारा सम्पादित कार्य अत्यंत सराहनीय हैं। साधुवाद ।

  13. नारायण व्यास says:

    देखा और सुना। बहुत अच्छा शोध हैं एक सामान्य व्यक्ति भी समझ सकता है। सौलंकी जी ने जिस स्तूप के विषय मे उल्लेख किया है, कभी भविष्य मे मैं कभी देखने जाऊँगा। धन्यवाद

  14. Pirtam Singh Rathod says:

    बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार