ग्रामीण पर्यटन :उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य की बहन सुन्दरा का गांव सुन्दरसी परमारकालीन वैभविक प्रमाणों से परिपूर्ण

शाजापुर संग्रहालय की परमारकालीन प्रतिमाएँ और उज्जैन के जयसिंहपुरा जैन संग्रहालय में सुन्दरसी  की जैन प्रतिमाएँ 

लौटे तो मार्ग में विचारों का सोता बहने लगा हमने शाजापुर और उज्जैन के संग्रहालयों में संगृहीत शैव, वैष्णव और शाक्त परम्पराओं का भी पर्यवलोकन किया । सुन्दरसी शैव, वैष्णव, शाक्त प्रतिमाओं के अतिरिक्त जैन कलाशिल्प का भी समृद्ध केंद्र रहा था अतः हमने उज्जैन के जयसिंहपुरा में स्थित जैन दिगंबर पुरासंग्राहलय में सहेजी गयीं सुन्दरसी की मूर्तियों और शिल्पखंडों का आलोकन किया। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की तीन प्रतिमाएँ यहां चवरधरी युगलों सहित भव्यता लिए हुए प्रदर्शित थीं । पद्मासन में ध्यानस्थ पार्श्वनाथ की एक अन्य प्रतिमा जिनके शीश पर सप्तफणि सर्प की नाग मौली का अंकन था संग्रहालय की दीर्घा में ध्यानाकृष्ट करने वाली प्रतिमाओं में सम्मिलित थी। अष्टप्रतिहार्य युक्त पार्श्वनाथ की तीसरी प्रतिमा के दाएँ बाएँ मृदंग वादक आकाशगामी गंधर्वों का शिल्पांकन था। ये  सभी प्रतिमाएँ सुन्दरसी के भिन्न भिन्न क्षेत्रों से प्राप्त हुई थीं । कुन्द-कुन्द ज्ञानपीठ इंदौर के प्रबंधक और जैन संग्रहालय के संरक्षक डॉ. अरविन्द कुमार जैन मार्गदर्शन में हमें  जैन प्रतिमाओं को समझने में सुविधा हुयी।उन्हीं से विदित हुआ कि सुंदरसी से अवाप्त प्रतिमाओं में पांच तीर्थंकर प्रतिमाएं तो ऐसी  हैं जिनके वक्ष पर लाछन नहीं है , श्वेत संगमरमर की तीर्थंकर पुष्पदंत की प्रतिमा 13वीं सदी की थी  ,पद्मासन में विराजे तीर्थंकर की इस प्रतिमा के पादपीठ पर उनका लाछन मकरअंकित था। तीर्थंकर श्रेयांसनाथ की पीठिका पर गैंडे का लांछन था। हरे बैसाल्ट की एक अन्य तीर्थंकर अरहरनाथ की मूर्ति कायोत्सर्ग मुद्रा में थी। कायोत्सर्ग मुद्रा में ही तीर्थंकर पार्श्वनाथ की नौवीं सदी की मूर्ति भी दीर्घा में सहेजी गयी थी। जिनके शीर्ष पृष्ठ पर विशाल सप्त नागफण मौली व कुंडली का शिल्पांकन था। काले दानेदार पाषाण खंड पर निर्मित तीर्थंकरआदिनाथ पद्मावस्था में ,काले बलुआ पाषाणखण्ड से निर्मित 12वीं सदी के तीर्थंकरआदिनाथ  की प्रतिमा परमारकालीन जिनाकृतियों में शिल्प सौष्ठव की पराकाष्ठा प्रदर्शित कर रहीं  थीं। शाजापुर के राज्य पुरातत्व संग्रहालय में भी इसी प्रकार जैन कला का प्रतिनिधित्व करती अतुल्य प्रतिमाओं का संग्रह था । जिला पुरातत्व संग्रहालय की निधियों में सुन्दरसी से प्राप्त बारहवीं शताब्दी की उमा महेश्वर की प्रतिमा जिसके रथिका बिम्ब पर कार्तिकेय और गणेश का शिल्पांकन विलक्षण था , 11वीं सदी की लाल पाषाण से निर्मित सुर सुंदरी की प्रतिमा में एक शिलाखंड पर शिलोत्कीर्ण सुरसुन्दरी की लावण्यमयी देहयष्टि ,कटिसूत्र और मौक्तिक माला का जितनी सूक्ष्मता से अंकन किया गया था वह अनुपम था  दो मूर्तियों वाली इस प्रतिमा में सिद्धहस्त  शिल्पियों की रचनाधर्मिता के सम्यक दर्शन हो गए ,ग्यारहवीं सदी की गरुड़वाही विष्णु की गतिचारी रूप में प्रभावोत्पादक प्रतिमा जिसके प्रभामंडल के दांयी ओर  ब्रम्हा और बांयी ओर शिव का शिल्पण ,मालाधारी गंधर्वों पैरों के समीप द्विभंग मुद्रा में दो परिचायक  दर्शनीय थे , काले पाषाण से निर्मित ललितासन में विराजी लम्बोदर प्रतिमा, 12वीं सदी का नायिका चतुष्टिका स्तम्भ सुंदरसी से लाकर शाजापुर में सुरक्षित रखी गयीं प्रतिमाओं के बीच नेत्रों को विस्फारित करने के लिए पर्याप्त था अलंकरणों से सुसज्जित द्विभंगी मुद्रा में चार नायिकाओं के हस्त में कमलनाल और पैरों के पास शिल्पित अनुचर अद्भुत थे,गज लक्ष्मी शिल्पखंड के आलोकन ने परमार नृपों की सुदीर्घ प्रतिमा आकल्पन परम्परा के वैशिष्ट्य से साक्षात्कार करा दिया कला की उत्कृष्टता दर्शाता गजलक्ष्मी का बारहवीं सदी का शिल्प खंड अप्रतिम था कमल पर विराजित चतुर्हस्ता देवी गजलक्ष्मी का जलाभिषेक करते गजराज,परिचायिकाएँ आभूषणों से सुशोभित शोभायमान थीं । दीर्घा में सेतखेड़ी से प्राप्त वह दुर्लभ शिलालेख भी प्रदर्शित था जिसके माध्यम से पश्चिम मालवा में शक क्षत्रप शासकों की विद्यमानता का सर्वपर्थम रहस्योद्घाटन संभव हो पाया था,अतीत में  नए स्वर्णिम पृष्ठों को समाविष्ट करने वाले शिलालेख के निकट कौशम्बी जनपद की मुद्राएं ,नागशासकों की ताम्रमुद्राएँ ,मालव गणराज्य की लघु ताम्र मुद्राएं ,शिव प्रकार के सिक्के, विदिशा जनपद की मुद्राएं ,कुषाण काल  की ताम्रमुद्राऎं और जिष्णु नामक शासक की पांचवी सदी की ऐसी मुद्रा जिस पर शंख का टंकण था ,को प्रदर्शित किया गया था । पुलिस लाइन के गांधी सभागार में स्थित संग्रहालय के रखरखाव के दायित्व निर्वहन करने वाले श्री दामोदर नागर जी ने हमें सुन्दरसी और शाजापुर जिले से प्राप्त पुरा सम्पदाओं की ब्यौरेवार जानकारी दी और यह भी बताया कि उन्होंने गाँव-गाँव जाकर पूरे  मनोयोग से इन प्रतिमाओं को संग्रहित करने में किस प्रकार महती भूमिका निभाई थी।

शाजापुर संग्रहालय की निधियाँ, उज्जैन स्थित जयसिंहपुरा जैन संग्रहालय में संग्रहित सुन्दरसी की जैन प्रतिमाएँ

एक गांव को मन में बैठाकर लौट रहे थे जेठरा जोड़ पर शुजालपुर मंडी के साहित्यकार रामप्रसाद सहज जी और सुप्रसिद्ध लेखक वंशीधर बंधु जी मिल गए। सड़क पर ही चाय पर चर्चा हुई। बंधु जी ने भी सुन्दरसी पर कई आलेख लिखे हैं बातों बातों में जेठरा जोड़ से कोई 8 किमी दूर गाँव डूंगलाय गांव की महिलाओं द्वारा लोक में सुदर्शित वीर विक्रमादित्य के मालवी गीत गाने की जानकारी क्या मिली कुतूहली मन फिर घूम गया संध्या का हाथ समेटने का क्रम जारी था।डूंगलाय बहुत दूर नहीं था।बंधु जी को साथ लिए हम डूंगलाए की ग्रामीण सड़क पर बढ़े जा रहे थे।

डूंगलाय गांव की महिलाओं ने सुनाई राजा विक्रमादित्य और संकटमोचन बहन की लोकगाथा 

 

पथनिदर्शक बंधु जी जेठरा मार्ग से डूंगलाय के बीच स्थित एक टेकरी की ओर अंगुल्यादेश करते हुए बताते चल रहे थे गांव वालों से उन्होंने है कि वनवासियों और गहलोतों के बीच आपसी टकराव के परिणामस्वरूप साढ़े 12 गाँव गहलोतों को प्राप्त हुए थे। गांव का अहोभाग्य है कि  मध्य भारत के पहले प्रधानमंत्री लीलाधरजी जोशी डूंगलाय गांव के ही रहवासी थे। मालवा के इस भू-भाग में विंध्यांचल पर्वत श्रृंखलाओं की छितराहट कहीं-कहीं दिख रही थी। यहाँ की गेहूँ, ज्वार, चना, अरहर का उत्पादन करने वाली उर्वरा धरा पर मिट्टी की सौंधी परत को तोड़कर कसमसाकर बाहर निकले अरुणांकुर, शरद की गीली सर्द हवाओं में धुले-पुछे लग रहे थे।उन्नत खड़े अलवा, खजूर, नीम, आम, भोलीम और बबूल की तीनों प्रजातियों के बिरवों वाली दृश्यावलियाँ मन को लुभा रहीं थीं। अतिक्रमण विहीन पगडंडियाँ हमें धनगर (पाल) और मेवाड़ा बहुल 800 जनसँख्या वाले गाँव डूंगलाय लेकर आई थीं। नेवज नदी से अभिसिंचित धरा पर रमाकांता गोस्वामी, मीनाबाई विश्वकर्मा, लीला बाई, सागर बाई, मेवाड़ा, मनीषा माहेश्वरी, चतरबाई, मीना बाई मिलीं दिया बाती के समय ग्रामीण स्त्रियां मंदिर में एकत्रित होकर प्रायःकीर्तन करती हैं यह हम अच्छी तरह जानते थे इसलिए भागे भागे उनका ठिकाना ढूंढा।  मेवाड़ा गहलोत बहुल डूंगलाय गाँव की महिलाओं द्वारा गाये लोकप्रसिद्ध राजा विक्रमादित्य सम्बन्धी गीत ने ऐसा खिंचाव था जिसे अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता केवल अनुभूत किया जा सकता है। लोकप्रस्तुति में विक्रमादित्य के प्रति लोक का उछाह और बहिन के स्नेह का करूं संयोग था, गाथा अलावती और भलावती नामक विक्रमादित्य की दो रानियों से सम्बंधित थी जिनसे अभी तक हम अनभिज्ञ थे। आपके सुभीते के लिए लोकगाथा का सार बता देते हैं कामरुदेश से दो भँवर जोगी खेल तमाशा प्रदर्शित करने के लिएआते हैं। रानियों को उनके आने की भनक लगती है ,दासी को भिजवा कर रानियाँ भंवर जोगियों को महल में आने का न्यौता देती हैं। भंवर जोगी इसी अवसर की ताक में रहते हैं। वे विक्रमादित्य से मिलने की इच्छा व्यक्त करते हैं। संयोग से राजा विक्रमादित्य नगर भ्रमण के उपरान्त काल भैरव चबूतरे तक पहुंचे होते हैं जहाँ अनहोनी की आशंका से काल भैरव उनका मार्ग अवरोधित कर देते हैं। वे उन्हें आगाह करते हैं कि महल में भंवर जोगी बैठे हैं। राजा विक्रमादित्य काल भैरव से कहते हैं कि यदि उनकी बात सही निकली तो वे काल भैरव के मंदिर का निर्माण कराएँगे अन्यथा समूल नदी में विसर्जित कर देंगे। उन्हें अपनी रानियों पर पूर्ण विश्वास था कि उनकी अनुपस्थिति में रानियाँ भंवर जोगी को महल में बुलाने का दुस्साहस कतई नहीं कर सकतीं। कालिका माता, हरसिद्धि माता और बाबा महाकाल की चेतावनियों को अनसुना करते हुए राजा विक्रमादित्य महल में प्रविष्ट होते हैं जहाँ भंवर जोगियों को पाकर उन्हें सत्यता का भान होता है।लोकगाथा आगे कहती है कि भंवर जोगी अभिमंत्रित किए कंकर  विक्रमादित्य की ओर उछाल देते हैं,परिणामस्वरूप  वे श्वान बन जाते हैं। श्वान रुपी विक्रमादित्य मोचन बहन के घर पहुँचते हैं। भंवर जोगी भी पीछा करते हुए वहाँ आ धमकते  हैं पर संकटमोचन बहन के कहने पर कि उसने पंद्रह किताबें पढ़ी हुई हैं 10 किताबें पढ़ने वाले भंवर जोगी भाग खड़े होते हैं । बहन भाई को दूध पिलाती है। तंत्र विद्या से वह स्वयं चील बन जाती है और भाई को मिट्ठू बना देती हैं। वे दोनों ताम्बवर नगरी पहुँचते हैं। वहाँ की राजकुमारी का मन मिट्ठू में रम जाता है। एक दिन मिट्ठू को नहलाने धुलाने के क्रम में उसके गले में बँधा धागा टूट जाता है और वह विक्रमादित्य में परिवर्तित हो जाता है। राजकुमारी को विक्रमादित्य मायावी बहन की कथा सुनाते हैं। वहाँ से निकलने के पश्चात् विक्रमादित्य को माली मिलता है। वह माली के साथ रहकर पुष्पसेवा करने लगते हैं। ताम्बावार नगरी के राजा अपनी बेटी के विवाह हेतु स्वयंवर आयोजित करता है, हथिनी को वरमाला सौंपकर योग्य वर के गले में माला डालने को कहा जाता है। तीनों प्रायोजनों में हथिनी राजा विक्रमादित्य को ही योग्य वर के रूप में चयनित करती है। भंवर जोगियों को जब इसकी भनक लगती है तो वह दोनों रानियों को लिए वहाँ पहुँच जाते हैं और खेल दिखाना प्रारम्भ कर देते हैं और ताम्बावार नगरी के राजा से जमाईसा को लिवा लाने का निवेदन करते हैं। नवविवाहिता राजकुमारी राजा के प्राण नथ में छिपाकर खाली चोला पालकी के साथ भिजवा देती है। भंवर जोगी नथ मांगने लगते हैं। अबकी बार राजकुमारी हार में प्राणों को छिपा देती है। भंवर जोगी हार की मांग कर देते हैं। राजकुमारी हार तोड़कर जमीन पर फेंक देती है, सारे मोती बिखर जाते हैं। भंवर जोगी दोनों रानियों को मुर्गा बनाकर जल्दी-जल्दी मोती चुगने का आदेश देते हैं। चील बानी मोचन बहन अपने भाई की रक्षार्थ वहाँ पहुँच जाती है, उसे पाकर भंवर जोगी नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। बहन भाई को पुनर्जीवित कर देती है। भाई बहन के पैर छूता है। उसके कहने पर भाई विक्रमादित्य द्वारा महाकाल, हरसिद्धि और भैरव मंदिर बनावाए जाते हैं। रामघाट पर तीन सोने की सीढ़ियाँ बनवाईं जाती हैं। इस सुखवंती लोकगीत के श्रवण मात्र से हमें उज्जैन के जनपदीय अतीत के दर्शन हो गये थे। इस सुखिया लोकगाथा में लोक की सहजता व सुघड़ता समाई हुई थी। लोक चुप्प नहीं रह सकता वह जब भी जिस रूप में बोलता है मात्र लोकानुरंजन ही नहीं करता बल्कि कई भेद खोलता है हमें यह भली भांति समझ आ गया था।इतिहास भले ही कागज़ की लेखी पर ध्यान धरता हो लोक तो पीढ़ियों का अनुसरण कर लोकनायकों पर आस्था रखता है उन्हें ईश्वर मानकर पूजता है।ऐसा कोई देश नहीं, ग्राम नहीं, लोक नहीं, सभा नहीं, रात नहीं, दिन नहीं, जब और जहाँ विक्रमादित्य की प्रशंसा के गीत न गाये जाते हों। न स देशो न स ग्रामो न स लोको न सा सभा / न तन्नक्तं दिवं यत्र विक्रमार्को न गीयते।

गांव के गोबर से लिपे ओटलों, पेढ़ियों और आँगन में खड़िया से  ढीक देकर गेरू से बनाये गए मालवी लोकचित्रांकन मन को लुभा  रहे थे पर अँधेरा गहरा गया था। साथ लौटते हुए गांव के  टिमटिमाते प्रकाश और बाहर के घुप्प अँधेरे ने मोटर के भीतर बंधु जी और सहज जी के साथ बातें करने को उकसा दिया था बंधु जी बताने लगे जिस क्षेत्र में हम परिभ्रमण कर रहे हैं मूल रूप से शाजापुर जिले के इस भू-भाग  में मध्य क्षेत्रीय आर्वांत मालवी का बोलबाला रहा है। यही शुद्ध आदर्श मालवी भाषा है। डूंगलाय गाँव में शिक्षक के रूप में सेवाएँ देने वाले बन्धु जी ने मालवी साहित्य को अपनी लेखनी के पैनेपन से निरंतर समृद्ध किया है। हमने भी उनसे  मनहर मेदिनी मालवी भाषा के सन्दर्भ में अनेक प्रश्न कर डाले। आंचलिक भाषा के विशेषज्ञ बन्धु जी के अनुसार शाजापुर जिले में जो मालवी भाषा बोली जाती है उसमें हिंदी भाषा के कई शब्द प्रचलन में आते हैं। यह नागर मालवी का प्रभाव वाला क्षेत्र कहा जा सकता है। उन्होंने बताया कि मालवी  यहॉं व्याकरण के तटबंध तोड़कर अबाधित बहती है आवश्यकता पढ़ने पर अपनी बहन  निमाड़ी के समागम से भी नहीं हिचकती है। बंशीधर जी मालवी और निमाड़ी भाषाओं को सहोदरा बताते हुए स्पस्ष्ट करते जा रहे थे कि कि हिंदी का परन्तु मालवी में पण और निमाड़ी में पण ही कहलाता है। जितनी, जितरा और जेतरा हो जाता है। पीना/ पीणा/ पीणड, के/ के/ खड , नाली/ नाली/ नालई, अम्मा/ मा/ अम्अ, मेरी/ म्हारी/ म्हारी,औरत/  बैरां/ लुगई, पलंग/ खाट/ खाटला, रहा था/ रियो थो/ रेहयो थो, इधर/ इनंग/ इनखs,  है/ हे/ छे, मेरे लिए/ म्हारा सारू/ म्हारा लेण। ग्रामीण पर्यटन की दृष्टि से सुंदरसी से उत्तम कोई अन्य स्थान हो ही नहीं सकता। मध्य्प्रदेश पर्यटन विभाग को इस दिशा में प्रयास करने होंगे साथ ही पुरातत्व विभाग को भी यहां की पुरासंपदाओं के संरक्षण के प्रति सचेत और सतर्क होना होगा। इति

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Comments

  1. बंशीधर बन्धु, ज़ेठरा जोड़ says:

    बहुत ही रोचक, तथ्य परख और महत्वपूर्ण। बधाई!

  2. Varsha Nalme, Ajmer says:

    Thanks maam…aadha pd liya ..bahut sunder matter n pics 👌💐💐💐😊

  3. ललित शर्मा, झालावाड़, राज. ('महाराणा कुम्भा इतिहास' अलंकरण) says:

    -पुरोवाक-

    भोपाल की सांस्कृतिक अस्मिता और लोक संस्कृति से अभिप्रेरित पत्रकार दिशा अविनाश शर्मा द्वारा एक लम्बे अरसे से मध्य प्रदेश की कई ऐसी लोकसंस्कृति धारोहरों पर ऐसा अनछुआ कार्य किया जा रहा है जिसके माध्यम से अनेक तथ्य व सांस्कृतिक पक्ष प्रकाश में आ रहे हैं।

    हाल ही में उन्होनें शाजापुर जिले के परमारकालीन सुन्दरसी ग्राम में स्थित महाकाल मंदिर तथा अन्य मंदिरों की लोक संस्कृति का चित्रण जिस प्रकार अपने परिश्रम से खींचा वह आश्चर्यचकित कर देने वाला है। उन्होंने सुन्दरसी की कथा, इतिहास के साथ विक्रमादित्य की अनुजा सुन्दरबाई के वृतान्त के साथ उस क्षेत्र के ग्रामीणों, बुद्धिजीवियों, कवियों के साक्षात्कार लेकर इस महत्ता को प्रमाणित किया है। दिशा शर्मा ने इसी के साथ चित्रों के माध्यम से पुरातत्व की दुर्लभ मूर्तियों, मंदिर, स्थापत्य के साथ स्थानीय ग्रामीण, पथ, सघन वन तथा ग्रामीण आवास का ऐसा जीवन्त चित्रण किया है मानो यहाँ की संस्कृति हमसे संवाद करने को तत्पर हो। उनके इस कार्य को महसूस कर यहाँ कहा जाना सटीक होगा कि- भारत की सच्ची लोक संस्कृति के दर्शन हमें सुन्दरसी जैसे ग्रामों में ही दिखायी देते हैं। सद् प्रयास हेतु हृदय से अभिवादन।

  4. Rajendra Kumar Malviya says:

    दीदी बहुत ही सुंदर औ मनोहरी वर्णन है, आपकी लेखनी का जवाब नही है, सीधे मन मस्तिष्क पर प्रभाव डालती है।। इतिहास के गर्व से निकाल कर फिर एक बार एक ऐतिहासिक सत्य से सभी अनभिज्ञ लोगो को अवगत कराने के लिए धन्यवाद।।

  5. रामाराव जाधव सुन्दरसी says:

    धन्यवाद मैडम जी हम सभी गाँव वाले आभारी हैं आप के।

  6. Indra Dikshit, Pune says:

    To much scope in Archaeology. Best wishes to U. Nice research papers.

  7. O P Mishra, Bhopal says:

    I have read the complete text and videos ,photographs related to sundarsi ancient site in Malwa region.raman Solanki and Prashant Puranikji are the scholar’s in that region.puranshahgal also give informative.your report on this topic needs no comment.excellent matter .regarding this arealocal folk songs are also be quite impressive.photographs are to be in the photo archives.now no serious scholars moving for such academic researches.thank you very much for your field work and taking interviews of the very senior citizens.you are adding new chapters in archaeology, social areas,art,architectures and religious fields.once again thank you very much for taking interest.

  8. देवेंद्र प्रजापति, सुन्दरसी says:

    जय श्री महाकाल

    आपके द्वारा भूत भावन महाकाल की नगरी सुन्दरसी (सुंदरगढ़) के अवन्ति के राजा विक्रमादित्य की बहन सुंदराबाई जिनका विवाह सुंदरगढ़ के राजा भगवत सिंह से हुआ था एवं उज्जैन में जितने भी मंदिर थे उतने मंदिर ग्राम सुन्दरसी (सुंदरगढ़) में बनाए गए, विक्रमादित्य की बहन सुंदराबाई रोज सुबह महाकाल मंदिर एवं अन्य मंदिरों में दर्शन करने जाती थीं, यह सभी जानकारी आपके द्वारा बड़ी ही सुन्दर सटीक सरल भाषा के प्रयोग के साथ वर्णित की गई है। इससे हमारी नई पीढ़ी को ज्ञान प्राप्त होगा एवं इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त होगी।

    इससे मैं आपको सहृदय प्रणाम करता हूँ।

    “जय श्री महाकाल”

  9. राम प्रसाद ' सहज ' शुजालपुर says:

    रोचक, श्रेष्ठ व संग्रहणीय ।
    ‘साहसिक कदम ‘
    ‘हार्दिक बधाई’
    👌✍️👌

  10. Umesh Pathak says:

    ब्रह्माण्डीय यात्रा में हमें कब कहाँ जाना होगा यह निर्णय तो उसके निर्माता और नियन्ता के हाथ में ही होता है। पर यात्रा के अनुभव को उस मार्ग के विश्राम स्थलों के सहयात्रियों के साथ साझा किया जाता है। ज्ञानवृद्ध सहयात्री अपने अनुभवों से अग्र गमक जनों के लिए पथ प्रदर्शक होते हैं। आदरणीय बहन श्रीमती दिशा अविनाश शर्मा भोपाल भी एक ऐसी सहयात्री हैं जो अपनी मार्ग दैन्दिनी (रोड डायरी) सृज कर वर्ण, ध्वनि, व चित्र पिपासुओं को सुरम्य सुखद उद्यान उपलब्ध करती हैं। उनका सुन्दरसा (सुन्दरसी) यान्त्रिक ग्रन्थ (ब्लाग) वन्दनीय व नमनीय है। विक्रमादित्य के काल से अब तक के अनगिनत सृजनधर्माओं के कर-चिन्हों व ध्वनियों के संग्रहीत और संयोजित कर रामायण रघुवंश, रामचरितमानस या कामायनी जैसा सृजन दिशा बहन आपने दिया है। इसमें इतिहास, साहित्य, संगीत और कला (नैसर्गिक दृश्य) सब कुछ समाहित हैं, इसलिए यह एक महाकाव्य है। तथा भारत भूमि के महाप्रतापी नृप विक्रमादित्य को श्रद्धावनत पुष्प गुच्छ हैं। मेरे जैसे अनुजों औद इतिहास, साहित्य, संगीत व कला अनुशीलकों को आपका लेखनीय वरद हस्त सदैव शारदीय व वासन्तिक रहे इन्हीं कामना व भगवान धरणीधर व माता गंगाजी से प्रार्थना के साथ।

    आपका अनुज,
    उमेश पाठक
    वासन्तीय नवरात्रि प्रतिपदा, वि0सं0 2077
    मौ0 चैदहपौर महीधर्राचन खडगगिरिमठ
    पो0 सोरों सूकरक्षेत्र
    जनपद- कासगंज उ0प्र0

  11. बालकृष्ण लोखण्डे, भोपाल says:

    रचियेता द्वारा तथ्यों परक अनुशोधों की तह परत दर परत स्थलों की अनुश्रुतियों/किंवदंतियों पर ही नहीं प्रमाणों को अपनी श्रृशुधा शांत करने के संकल्प में यथासंभव भ्रमणशील को नमन्ति स्वीकार हो।

  12. दिनेश झाला, शाजापुर says:

    🙏🏻🙏🏻 आपके द्वारा सम्पादित कार्य अत्यंत सराहनीय हैं। साधुवाद ।

  13. नारायण व्यास says:

    देखा और सुना। बहुत अच्छा शोध हैं एक सामान्य व्यक्ति भी समझ सकता है। सौलंकी जी ने जिस स्तूप के विषय मे उल्लेख किया है, कभी भविष्य मे मैं कभी देखने जाऊँगा। धन्यवाद

  14. Pirtam Singh Rathod says:

    बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार

  15. Vinayak Sakalley says:

    Mam , your travel blog is amazing , it motivates the historians and travel bloggers literally influenced to visit such historical landmarks. It is the privilege of late King Vikramaditya who got a laureate author like you. After reading your blog the readers have a great eye for your alluring travel destinations photography. The video content of the historians like Rajpurohit sir of Ujjain is amazing amid your blog, You are a talanted writer who creates a great content. Very inspiring blog mam🙏🙏

  16. विशाल, मनावर says:

    चित्रात्मक और सरल🙏💐

  17. विशाल वर्मा says:

    अपने गौरवपूर्ण इतिहास के सत्य परिचित कराता आपका लेख। धन्यवाद

  18. रूपेश विश्वकर्मा, अमलार says:

    दीदी प्रणाम,
    सुन्दरसी के बारे में 7 भाग पढ़कर मन प्रसन्न हो गया।
    पुनः हार्दिक साधुवाद।

  19. अशोक पाण्डे, सिंगरोली says:

    Bahut achha rachnatmak Kary hai. Aap ki kalpna shakti anupam hai.

  20. बंशीधर ' बंधु ' शुजालपुर says:

    आदरणीय दीदी
    आपके इस मनोरम यात्रा वृत्तांत को दोबारा पढ़ने का अवसर मिला। इस बार भी एक नई दृष्टि और नए चिंतन का सूत्रपात हुआ। बार – बार जिज्ञासा होती है। बहुत कुछ अनजाना,अनछुई पुरातत्विक,ऐतिहासिक,सांस्कृतिक,धार्मिक और प्राकृतिक संपदा का रहस्य छुपा है इसमें।
    पुन:बधाई एवं शुभकामनाएं।

  21. डॉ एम सी शांडिल्य says:

    सम्मानीय प्रणाम
    अति सुन्दर पर्यटन, लेखन और सृजन

    आत्मीय शुभकामनाएँ!

  22. डॉ डमरूधरपति says:

    संस्कृति रक्षा , देश सुरक्षा

  23. डॉ डमरूधरपति says:

    श्रेष्ठ कार्य 👍👏🙏

  24. Ajay Khare says:

    Congratulations madam ! Beautifully written .
    the article makes it very clear that history and mythology are so intricately interwoven in India that it is difficult to sift history from mythology. It is interesting to know that people still cherish their traditions.

  25. डॉ के के त्रिवेदी, झाबुआ says:

    सुन्दरसी का नैसर्गिक सौंदर्य..प्राप्त पुरातात्विक मूर्ति-शिल्प.. और उसका गौरवमय इतिहास आपकी लेखनी से जीवंत हो उठा है।..यह अविस्मरणीय आलेख न केवल उस क्षेत्र के बाशिंदों को उपहार है,यह वर्तमान पीढ़ी को शोध के लिए प्रेरित करता रहेगा।..भूले-बिसरे ऐतिहासिक गौरव को आपने बड़ी ही सूक्ष्मता से अवलोकन-अध्ययन कर अहर्निश कठोर परिश्रम और अनुभव के साथ लिपिबद्ध किया है ।आप ऐसे ही अतीत की धरोहरों को उजागर कर लोक संस्कृति से आम आदमी को भारतीय अस्मिता से परिचित कराती रहे.. बधाई !

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