धार्मिक विहार – लोकास्था और लोकविश्वास की त्रिकोण यात्रा : नलखेड़ा माता, करेड़ी माता और भैंसवा माता

त्रिशक्ति स्वरूपिणी माँ बगलामुखी प्रातः काल कुमारी, मध्याह्न काल युवती और सायंकाल वृद्धरूप में दर्शन देती हैं, देवी बगलामुखी का नलखेड़ा में ‘स्वयंभू’ अवतरण

देवाधिदेव महादेव के यज्ञभाग प्राप्त करने की उत्कट इच्छातुर देवी के यज्ञ  को नष्ट करने  के लिए विकराल स्वरूप धारण कर लेने पर स्वयं महाकाल भी प्रकंपित हो गए थे। विकट हुंकार भरती देवी और उनके भयप्रद स्वरूप से भयक्रांत महादेव के मार्ग को अवरुद्ध करने के लिए देवी की अंगभूता दस देवियों का प्रकटीकरण हुआ उन्हीं में बगलामुखी और छित्रमस्ता विद्याएँ सम्मिलित हैं।श्री गायरी  बताते चल रहे थे कि त्रिशक्ति स्वरूपिणी माँ बगलामुखी प्रातः काल कुमारी, मध्याह्न काल युवती और सायंकाल वृद्धरूप में दर्शन देती हैं। हंस के आसन पर आरूढ़ प्रातः कालीन देवी कुमारी लोकभाविनी ब्रह्मरूपा गायत्री विष्णु के साथ भगिनी के रूप में अवतरित हुई हैं अतः यहां पूर्व में सर्वबाधा विनाशक गायत्री जाप ही किया जाता था। गृहकलह ,विवाहकर्ज ,शत्रुता ,धनहानि और व्याधियों के भंवरजाल में फंसी नांव को किनारे लगाने वाली गायत्री उपासना को ही श्रेयस्कर भी समझा जाता था।हमारे ठीक सामने गर्भगृह में सहस्त्रों सूर्य की प्रभा से आलोकित दैदीप्यमान देवी बगलामुखी का अर्चा विग्रह भैरुं के साथ प्रतिष्ठित था ,गभर्गृह के सामने स्थित कच्छप बलिपीठ पूर्ववर्ती बलिप्रथा का रहस्योद्घाटन कर रही थी।गायरी जी ने बताया कि यहाँ बलियाँ आज भी दी जाती हैं पर मंदिर परिसर से दूर किसी एकांतिक स्थान पर स्वेच्छा से बकरे की बलि देने वाले ग्रामवासी मनौती पूरी हो जाने पर श्रद्धावश यह कार्य करते हैं।परिसर में हम  सनातन अर्चन पद्धतीनुरूप नारियल चढ़ाकर षोडशोपचार पूजा कर देवी को मनाने वालों को ही देख पा रहे थे ।जगदम्बा ने जैसे सागर में निमग्न होते त्रिविक्रम को वट वृक्ष के पत्ते के रूप में धारण कर रक्षार्थ अवतरण  लिया था, वैसे ही देवी बगलामुखी का यहाँ ‘स्वयंभू’ अवतरण हुआ है। मंदिर की प्रदक्षिणा करते हुए मन देवी के तेजोमय स्वरूप को हृदयंगम कर आल्हादित था। शिव के तेज से जिसका मुख प्रकट हुआ, यमराज के तेज से बाल, विष्णु के तेज से भुजाएँ, चन्द्रमा के तेज से स्तन, इंद्र के तेज से कटिप्रदेश, वरुण के तेज से जंघा, पिंडली, पृथ्वी के तेज से नितम्ब भाग का प्राकट्य हुआ, ब्रह्मा के तेज से दोनों चरण, सूर्य के तेज से उँगलियाँ, वसुओं के तेज से हाथ की उँगलियाँ, कुबेर के तेज से नासिका, प्रजापति के तेज से दन्तिका, अग्नि के तेज से तीनों नेत्र, संध्या के तेज से भौहें, कान वायु के तेज से आविर्भूत देवी की तेजस्वीयता को अनुभूत करते हम कृतार्थ हुए जा रहे थे ।  अत्यंत प्रभावक आभामंडल लिए सोलह खंभी मंदिर के  स्तम्भ के शिलालेख पर संवत  1815 सन 1759 में दक्षिणी कारीगर अबू जी द्वारा स्तम्भों की पुनर्निर्मिति कराये जाने उत्कीर्णन था। नमस्कृत मुद्रा में खड़े श्रद्धान्वितों की श्रद्धा का पारावार थमाए नहीं थम रहा था। भीतर  घंटियों का अनुनाद, घर्र घर्र चर्र चर्र चूं करते  यांत्रिक उपकरणों की प्रतिध्वनियाँ, मन्त्रों तंत्रों की गर्जना, मालवा के ढोलों की थापें सारी ध्वनियाँ परस्पर घुलमिल गयीं थीं।मंदिर के सन्मुख चम्पा का बड़ा वृक्ष हुआ करता था ,भूलवश श्रद्धालुओं के दूध दही डालने के कारण उसका क्षरण हो गया था ,प्रति चम्पा षष्टी को पुजने वाले इस वृक्ष में से वर्तमान में  निकलती शाखाएँ प्रशाखाएं दिखाकर गायरी जी और मनोहरलाल पंडा जी प्रसन्नचित्त लग रहे थे।

गोबर गणेश मंदिर, पंचमुखी हनुमान मंदिर, सांवलिया नाथ, किला, बलदावदा  के हनुमानजी, श्रीनाथ धाम , भोपा , डॉ. ओ. पी. शर्मा – शहर नलखेड़ा    

नलखेड़ा में अपने दिग्दर्शक श्री रामचंद्र गायरी जी के साथ मंदिर के सौंदर्य को निहारते हुए हम सीढियाँ उतरकर पार्श्व में स्थित स्थानीय नदी लखुंदरा (लक्ष्मणा )तक आ गए थे। आपको बताते चलें भद्र देश की एक राजकुमारी का नाम भी शास्त्रों में लक्ष्मणा उल्लेखित मिलता है जिन्होंने  मुरली मनोहर से विवाह किया था। सर्वगुणाधार श्री कृष्ण की अलौकिक लीला तो अनिवर्चनीय है। मंदिर परिसर में उनका भी एक मंदिर है।  मातृवत्सला नदी लक्ष्मणा का अखंड प्रवाह जिसे कोई और उपमा नहीं शोभती सिवाए माँ की। यहां एक हाथी कुंड भी  है जिसे पूर्ववर्ती गजपालक साधकों की उपस्थिति से जोड़कर देखा जाता है ,मार्ग में सत्रह समाधियाँ थीं, सूबेदार जी की छतरी भी मार्ग में ही स्थित थी, श्मशान की गतिविधियां जारी थीं। मन सोच रहा था श्मशान ही महाशक्ति की आवास भूमि है श्मशानालयवासिनी मां के चरण के नीचे सर्वान्तकारी महाकाल स्वयं हैं सच्चिदानंद स्वरूपणी माँ आदिशक्ति के कारण ही तो प्राणियों में चेतना का संचार होता है। यदि देवी चेतना के विस्तार का किंचित  संकुचन कर दें तो यह जगत निष्प्राण व निश्चेष्ट हो जाए। माया के बल पर देवी सृष्टि की उत्पत्ति करती हैं, उसका लालन पालन करती हैं और आवश्यकतानुसार उसका समाहार भी कर लेती हैं।  36 अक्षरों वाले मंत्रों के 36000 जापानुष्ठानों के दीर्घोच्चारण के स्वर बहुत दूर तक गुंजायमान थे।पथक  गायरी जी से  हमने यही उद्गार व्यक्त किए थे कि  मन्त्रों में असीम शक्ति होती है। हमारे ऋषियों ने अपनी मेधाशक्ति के कारण गूढ़ार्थ लिए ऐसे बीज मन्त्रों की सृष्टि की है जिनके उच्चारण मात्र से चतुर्दिक वातावरण कंपायमान हो जाता है। जहां  श्रद्धा रुपी भगवती और विश्वास रुपी महादेव  एकीभूत हो गए हों  वहां  अन्तःकरण में स्थित परमात्म सत्ता को देख पाना संभव हो जाता है बस सरल शब्दों में  नलखेड़ा की यही परिभाषा  है। मंदिर व्यवस्थापक के साथ लौटने पर सर्वदानवघातिनी चराचर भूतों को रचने वाली देवताओं की जननी बगलामुखी की पूजा के निमित्त श्रद्धातुर सत्तासुख पाने वालों की विशिष्ट प्रविष्टि की व्यवस्था देखी। जिस देवी की सत्ता से जगत सत्तावान हो उसके सम्मुख प्रणति अवस्था में सत्ताभोगी भी खड़े थे। स्थानीय शिक्षक पं दुर्गा प्रसाद शर्मा जी भी दर्शनार्थियों की पंक्ति  में खड़े  थे। अल्प परिचय के बाद उनसे चर्चा करने पर विदित हुआ कि मंदिर में गायी जाने वाली प्रातःकालीन आरती १५ वर्ष पूर्व उनके द्वारा रची गयी थी। उन्होंने हमें आरती गाकर भी सुनाई ॐ जय बगला माता मैया शक्ति-दाता / रमा सरस्वती दाएं बायें, बीच में जग धाता / चौदस मंगलवार को माता, जगको दरस दियो / मैया / शत्रुजीभ औ गदा हाथ ले, पाप को दमन कियो / जय / चंपा, विल्व, नीम, पीपल के कुंज मध्य सोहे / नदी लखुंदर कल-कल करती, चरणों को धोवे / नाक में नथनी मुकुट चंद्र है, गल चम्पक माला / पीताम्बर अतिभावे, रूप कांति वाला / माँ का वाहन द्वार रूप है, दुर्जन डरपाता / दीपमाल स्तम्भ रूप है, तम को बिरमाता / उत्तर में हनुमान औ भैरव दक्षिण वरदाता / पश्चिम में तो मुक्तिधाम से, यम स्तुति गाता / सोलह खम्ब में सोलह विद्या, कल्याणी माता / सर्वज्ञा आनंद प्रदा हो, तुम सुख की दाता / रूद्ररूप मृत्युंजयी माता, तीन नेत्र रूपा / हरसिद्धि चंडिका भवानी, तू ही सतरूपा / पाण्डव पूजित जन-जन कूजित, स्वयं सिद्ध माता / सिद्दपीठ पर जो भी आता भाग सँवर जाता / जय बगला माता मैया जय शुभफल दाता / मैया तू ही ज्ञान दाता / मैया संकट दुःख त्राता, मैया पूरण कर आसा / मैया नलखेड़ा वासा, रमा सरस्वती… / तंत्र-मंत्र और यन्त्र सब मिल माँ के गुण गावे / छत्तीस वरणी मंत्र जाप से, पार उतर जावे / त्रिगुणमयी माता की आरती जो कोई गाता / उर ‘आनंद’ अति उपजे सुख संपत्ति पाता /  सर्वसिद्धि मां बगलामुखी और बगलामुखी ब्रम्हास्त्र विद्या जैसी उत्कृष्ट पुस्तकों के रचियता पंडित दुर्गाप्रसाद शर्मा जी ने हमें बताया कि यहाँ प्राकृत भाषा का प्रचलन रहा है ,पांचवी शती में प्रत्यय युक्त प्राकृत भाषा का प्रभाव यहां के भंडावाद, कल्दावद, करनावद और नैनावद समीपवर्ती गाँव  बगावद , बटावद के रूप में सामने आता है। लखुंदर नदी के उस पार आज भी बगावद का होनाउनके अनुसार  इस कथ्य के सपुष्ट प्रमाण हैं। लखुंदर नदी का मंदिर से सटा घाट आज भी ‘बगावद घाट’ ही कहलाता है। पं दुर्गा प्रसाद शर्मा के अनुसार दक्षिण से उत्तर की ओर ढलाननुमा नगर नियोजन के कारण नलखेड़ा में किसी समय तीन नालों से  पानी का बहाव हुआ करता था। वे नालों पर बसे खेड़े को नलखेड़ा नामाभिधान से जोड़कर देखते हैं। उन्होंने बताया कि यहाँ जातिगत आधार पर मोहल्लों की बसाहट हुई है । ठाकुर मोहल्ला, मेवाती मोहल्ला, घोसीपुरा, कुम्हार सेरी, आदि उन्हीं में आते हैं। खेड़ापति हनुमान और पंचमुखी हनुमान की स्थापना, किला, नगरकोट की निर्मिति, ग्वालियर के सिंधिया नरेशों द्वारा सूबेदार की तैनाती, पश्चिम दिशा में गणेश दरवाजे पर गोबर गणेश की अति विशाल प्रतिमा की स्थापना और लदाव की छत लिए प्राचीन घर नलखेड़ा की  अतीत की स्मृतियाँ हैं। उज्जैन के शक्तिपीठ हरसिद्धि मंदिर परिसर में आस्थित दीपमालिका की प्रतिकृति नलखेड़ा की दीपमालिका के विशेष अवसरों पर प्रजज्वल्यमान होने का उल्लेख कर वे दीपस्तम्भ को महाराजा विक्रमादित्य की देन बताते है।

80 फ़ीट ऊँची  मराठाकालीन दीपमालिका के समक्ष भैरुं मंदिर, श्री हनुमान मंदिर  पर नतमस्तक हुए श्रद्धालुओं के चेहरों पर परितोष  के भाव पढ़ते हुए हम आगे बढ़े जा रहे थे। परिसर में   विल्ब पत्र, चम्पा, सफ़ेद आंकड़ा, आंवला, नीम और पीपल के पेड़ों के बीच खड़े हुए श्री रामचंद्र गायरी हमें बताने लगे कि यहाँ  नवमी पूजन के विशिष्ट अवसर पर अस्त्र शस्त्र पूजन का महत्व है। चलसमारोह के रूप में आयोजित होने वाला यह गरिमामयी कार्यक्रम सांवलिया नाथ मंदिर से प्रारम्भ होकर किला रोड, नाना बाजार क्षेत्र से होता हुआ गवलीपुरा, गायरी मोहल्ला, मेवाती मोहल्ला पथ चालन करता हुआ लक्ष्मणा नदी पर संपन्न होता है।  आपातकाल में भी पूरे देश में नलखेड़ा ही एकमात्र ऐसा गांव रहा है जहाँ  चल समारोह निकाला गया था । यहां दशहरे के दिन कृषि उपकरणों को पूजने की प्रथा के कारण आसपास के गावों के आसक्त बड़ी संख्या में एकत्रित होते हैं। नूतन धर्मशाला के पास यञशाला में हवनादि में रत् श्रद्धान्वितों  के मन्त्रों और अग्निज्वाला देवी की अंशभूता स्वाहादेवी का नामोच्चारण आकाश गुंजा रहा था। हमने मन ही मन सोचा स्वाहा देवी की उपस्थिति के कारण ही अग्निदेव आहूतियों को भस्मित कर पाने में समर्थ हो पा रहे हैं। कुलमिलाकर  सुखदा प्रकम्पन, मुक्तिदा स्पंदन वातावरण को अतिप्राकृत बना रहा था।

चलते हुए अब तक हम पूर्वाभिमुखी सूर्यनारायण बालहनुमान मंदिर के निकट आ गए थे जहां  स्थित बरगद की प्रकम्पित पत्तियों के नीचे खड़े हुए मंदिर के व्यवस्थापक गायरी जी बताने लगे कलिपुराण में माँ बगुलामुखी का पूजार्चन भीम के पुत्र बर्बरीक द्वारा किया गया था। महातांत्रिक बर्बरीक स्वयं एक सिद्ध योगी रहे हैं। जगजयी होने की अभिलाषा में माँ बगुलामुखी की साधना तो राक्षसराज रावण ने भी की थी। महाभारत युद्धारम्भ से पूर्व विजयी बनने की लालसा अर्जुन और द्रोणपुत्र  अश्वथामा को भी भवभयमोचिनी शमशान वासिनी  माँ बगलामुखी  के शरणापन्न लायी थी। भक्तों को अपने ही स्वरुप में प्रतिष्ठित करने वाली माँ बगुलामुखी को प्रसन्न  करने के लिए अमंगल भावों का त्याग आवश्यक माना  गया है। यहां अनौचित्य का स्थान नहीं, अनौपचारिकता भी नहीं, अनिश्चिंतता तो रत्ती भर भी नहीं। यहां से निकलकर गांव देखने की मंशा से हम गायरी जी को लेकर आगे बढ़े बनजारा पुरा के रास्ते में अधुनातन श्रीनाथ धाम की भव्य प्रतिष्ठा हमारा पहला पड़ाव था । अमल धवल छवि लिए इस मंदिर में  श्रीश्यामसुंदर के रूपमाधुर्य,  लीला माधुर्य और प्रेममाधुर्य की सहजानुभूति के अनुभावी बनकर बाहर आने पर गायरी जी से ज्ञात हुआ कि परिशुद्ध वातावरण में तीन पेड़ों नीम पीपल और बरगद के युग्मन वाले  पुरातन वृक्षों से घिरा यह मंदिर किसी प्रवासी भारतीय की कृष्णासक्ति का परिणाम है, बंजारापुरा क्षेत्र में यायावरी करते हुए ध्यान आया कि बंजारे भी तो कभी यायावरी व्यापारी थे। ये लोग संचित धन को कहीं भी वनादि में जमीन में गाढ़कर आगे बढ़ जाया करते थे। बड़ के पेड़ के नीचे इनकी बालद खुलती थी। राजस्थान से हल्दी, मिश्री, नमक, मसाला लाकर मालवा में बेचने वाले बंजारों की मालवा में बहुतेरी बस्तियां हैं। ऐसी ही एक बस्ती में किशन जी का निवास था गायरी जी से यह पता चलने पर कि बंजारा समाज का यह परिवार भक्तिपरक लोकगीत सुनाता है हम बिना समय गंवाए वहां पहुंच गए उन लोगों ने अपनी मनहर मदनी मालवी भाषा में जो हिंगलाज देवी का गीत सुनाया उसने हमें भाव विभोर कर दिया। अपनी मार्गणा में हमने पाया कि नलखेड़ावासियों को माँ से विलासिता की अपेक्षा नहीं। उनके लिए तो  श्रम का सौंदर्य और मंगलमय जीवन का उल्लास ही संतुष्टिदायक है। किल्ला सड़क से निकलकर हम ऐतिहासिक महत्व के किले के निकट पहुंच गए थे । वर्तमान में जिसकी प्राचीर 6 बुर्जियों से आवृत्तित  जर्जरावस्था में थी । । किला सदृश गढ़ी की उत्तर दिशा में प्रवेश द्वार था । गढ़ी के भीतर  पूर्व में तहसीलदार और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के कार्यालय रहे हैं। गायरी जी के अनुसार इस किले का निर्माण दक्षिणी ब्राह्मण विट्ठल एमाजी सूबेदार ने मिती माह सुदी 5 सम्वत 1951 (सन 1894) में करवाया था। बाद में यह सिंधिया नरेशों के अधिपत्य में आ गया था। युद्ध की स्थिति में शत्रु का मार्ग अवरुद्ध करने की दृष्टि से किले की सुदृढ़ सुरक्षा व्यवस्था से आकर्षित होकर किले में प्रविष्ट होने पर  निराशा ही हाथ लगी। यहाँ के जमींदार विनायक राव केशव भी कभी यहीं निवासित रहे हैं। मोटर संकरी गलियों से होते हुए सांवलिया सेठ मंदिर के सामने से निकली  यहां पुराने लदाव की छत वाले घर पंक्तिबद्ध थे । मंदिर में पूजारत पंडित श्री महेश  नागर, जो शासकीय लोकनिर्माण विभाग में कार्यरत हैं संयोग से वहीं मिल गए थे, ने हमें बताया कि मराठाकाल में स्थापित इस मंदिर के सम्बन्ध में उनके पूर्वजों द्वारा सुनी सुनाई कथाओं से उन्हें यह विदित हुआ है कि एक बार हाथी से साँवलिया सेठ की वर्तमान प्रतिमा अन्यत्र कहीं ले जाई जा रही थी। गजराज वहीं अड़ गए और आगे नहीं बढ़े। इस कारण मूर्ति को ईश्वरीय इच्छा मानकर यहीं प्रतिष्ठित कर दिया गया था । तभी से संवलियानाथ यहां विराजे हैं। मंदिर परिसर में शिवलिंग-बांकेश्वर महादेव मंदिरऔर खेड़ापति हनुमान जी की भी स्थापना है। नलखेड़ा से तीन किलोमीटर दूर बल्दावदा गांव  में हनुमान जी की प्रतिष्ठा है। बलड़ी (पहाड़ी) पर स्थित यह मंदिर हमें बताया गया माँ बगलामुखी की भांति चमत्कारिक शक्तियों से परिपूर्ण है। हम गायरी जी के साथ कचनारिया रोड से वहां भी गए ,यहाँ की धरा के नीचे पाषाण खण्डों की टंकार सुनाई देती है। स्थानीय मान्यता है कि यहां किसी  मंदिर के ध्वंसावशेष दबे हुए हैं ,वर्तमान में यह सात्विक स्थान बैरागियों की साधना स्थली है लौटे तो गायरी जी चौक बाजार में स्थापित पंचमुखी हनुमान मंदिर के दर्शनार्थ ले आये  जिनके समक्ष प्रणाम की मुद्रा में खड़े हम यही विचारते रहे  वस्तुतः श्री हनुमान को समझना भारतीय सनातन संस्कृति की विराट और उदात्त चेतना की समन्वयवादी दृष्टि को समझना है। लगभग वहीं से गायरी जी ने ऊँगली के संकेत से एन सामने स्थित गोबर गणेश प्रतिमा दिखाई  हम गोबर,चूना ,उड़द ,गोंद और बिल्बपत्र  से निर्मित विस्तीर्ण गणेश तथा रिद्धि सिद्धि प्रतिमा तक पैंया पैंया चलकर शीघ्र ही पहुंच  गए थे । हाल ही में धूलधूसरित होने से बचाने के लिए प्रतिमा को कांच के भीतर सुरक्षित किया गया था । स्थानीय निवासी श्री रमेश चंद्र शर्मा हमें गणेश जी के सन्मुख प्रणति अवस्था में  मिल गए थे । उन्हीं से विदित हुआ कि इस मुख्य बाजार में घनी बसाहट से पूर्व हनुमान मंदिर चौराहे पर स्थित बड़ के चौतरे से गणेश मंदिर सीध में दिखाई देता था। गायरी जी बोले  जानेमाने पुराविद पद्मश्री वाकणकर जी ने इस प्रतिमा के निरीक्षण के उपरांत इसे अत्यंत प्राचीन बताया था। पुराविदों को नलखेड़ा मंदिर में परमारकालीन स्थापत्य के चिन्हांकन भी मिले हैं। उज्जैन के वरिष्ठ पुराविद डॉ. रमण सोलंकी ने अपने शोध प्रबंध में नलखेड़ा और करेड़ी के देवी मंदिरों की अन्वीक्षा के उपरांत इनके शिल्प वैभव को परमारकालीन बताया है। हमने उनसे बात कर उनका भी पक्ष जानने की चेष्टा की।

Comments

  1. Sangeeta Tripathi says:

    बहुत ही सुंदर विवरण और फोटोग्राफी?
    दिशा तुम्हारी मेहनत से हमे भी काफी रोचक जनकारियां मिलती हैं।????

  2. बसन्त निरगुणे says:

    बढिया रिपोर्ट।कपिल जी का भाषण अद्भुत।वे हमारे
    समय के लोक और शास्त्र के बड़े चिन्तकों मे से एक हैं।उनको सुनना हमारे लोक और शास्त्र की नई व्याख्या सुनना है।

  3. रामचन्द्र गायरी नलखेड़ा says:

    बहुत ही अच्छा ,भाषा आपकी बहुत ही अच्छी और जानकारियाँ अद्भुत हैं बहुत सी बांते तो हमें भी नहीं ज्ञात थीं

  4. वंशीधर बंधु says:

    सुप्रभात दीदी?आपकी कलम को नमन बहुत सुंदर ब्लॉग लिखा है। वर्णित सारे चित्र सजीव हो उठे हैं ।

  5. जगदीश नागर says:

    शानदार कवरेज़ है,धन्यवाद आपका ?

  6. Kailash Chandra Pandey, Mandsaur says:

    Good collection.

  7. संजय शर्मा, भोपाल says:

    अतिi उत्तम

  8. Manju yadav Ujjain says:

    Good work mam for three lok devi ??????????

  9. मधुर त्रिवेदी, उज्जैन says:

    बहुत सुंदर वर्णन किया आप ने इस के माध्य्म से आगे की ओर जानकारी मिलती रहे
    यही अभिलाषा है
    जय माँ बगुलामुखी
    जय महाकाल??

  10. रामदयाल बंजारा, नलखेड़ा says:

    आपका बहुत अच्छा लगा मैडम

  11. अरूण सिंह, भोपाल says:

    मैं नलखेड़ा वाली माता जी से पहले ही बहुत अभीभूत हूँ आपके आलेख ने मुझे बहुत प्रभावित किया है

  12. कमलेश बुंदेला says:

    दीदी अति सुन्दर वर्णन

  13. श्याम सुन्दर पाठक says:

    बहुत सुंदर दीदी आपकी कलम को नमन है जय माता दी

  14. OP Misra, Bhopal says:

    Good morning, I have completed the lecture of kapil Ji. Excellent. Pl. Cover as much as photographs from all over the madhya pradesh and also tourist destination of your area. You are working for future. Cunningham surveyed like this before hundred years back. Now you are on the same line. Congratulations. Malwa area having good research material. Needs only researchers. Wakankar also doing such survey by foot. H v trivedi of also cover limited field . Please go ahead in your social study which will cover all field. I am behind your research and you are free to contact me at every stage of academic field. Once again jai chhathi maiya. Thanks.

  15. भोलाराम नायक says:

    हमको तो आपका काम एक नंबर का लगा बहुत बढ़िया

  16. सुरेश अवस्थी, दिल्ली says:

    दृश्य बहुत अच्छे हैं। उज्जैन, राजगढ़ और शाजापुर की पुरानी यादें ताजा हो गईं।

  17. भगवान दास शर्मा करेड़ी says:

    मेङम जी आप ने जो हमारी माँ महाकाली करेङी वाली के बारे मे जानकारी दी उसके लिए आप को साधुवाद बहूत बधाई हो पहली बार शोध करके लिखा गया है करेड़ी के बारे में बहुत ही बढ़िया

  18. जगदीश भावसार शाजापुर says:

    अच्छी प्रस्तुति है…… सम्पूर्ण वृत में इतिहास के साथ धार्मिक, आध्यात्मिक एवं लोक-मान्यताओ को उजागर करने में स्थानीय लोगों की मान्यताओ को पुस्तकीय तत्त्व से क्षेत्र की प्राचीनता और सामाजिक अवधारणा का सुन्दर चित्रण है।
    क्षेत्र की तीन देवियों की लोकास्था-लोक विश्वास की त्रिकोण यात्रा का विशेष अध्याय प्रस्तुत किया है।
    चरैवेति चरैवेति…….? मंगलकामनाएं

  19. बंशीधर बंधु शुजालपुर मंडी says:

    आपकी यात्रा डायरी गांव,नगर,नदी,खेत -खलिहान , प्रकृति न सिर्फ क्षेत्र के भौगोलिक परिदृश्य से रूबरू कराती है।बल्कि क्षेत्र की पुरातात्विक, ऐतिहासिक,धर्मिक,सामाजिक ,सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अवधारणाओं की समृद्धि से भी साक्षात्कार करवाती है। इसकी पुष्टि डायरी की सजीव दृष्यवली,अद्भुत मूर्तिशिल्प, वर्णित परंपराएं, लोकाचरण से भरापुरा सहचर देव लोक, डॉ कपिल तिवारी ,डॉ केदार नाथ शुक्ल जी, डॉ प्रतिभा दत्त चतुर्वेदी जी, डॉ ओ.पी. शर्मा, डॉ रमन सोलंकी जी, डॉ प्रशांत पौराणिक जी आदि विद्वानों के महत्वपूर्ण सारगर्भित साक्षात्कारों और श्री मनोहरलाल पंदाजी,श्री रामचन्द्र गायरी, पंडित श्री महेश नगर,श्री राजेश दीक्षित आदि की अभिभूत कर देने वाली महत्वपूर्ण जानकारियों से होती है।
    मालवा की मिठास घोलती मालवी के रसासिक्त संजा के लोकगीत,भोपी कृष्णा बई की संगत में भोपा भोलाराम की सारंगी के तारों से निसर्ग मनमोहक ध्वनि पर थिरकती लोक धुन से आबद्ध देवनारायण की फड़ गायकी, क्षेत्र को विशेष पहचान देती है ।
    इस महत्वपूर्ण,सारगर्भित यात्रा डायरी के लिए बहुत बहुत बधाई।

  20. संजीव सक्सेना,नलखेड़ा says:

    बहुत ही अच्छा कवरेज मैडम बधाइयां??

  21. अनुमिता says:

    दिशा बहुत ही अच्छा व्लॉग। हर बार की तरह सहज सरल भाषा का प्रयोग । गांव में बहुत सारे देवी देवता की पूजा की प्रथा और नाम पढ़कर बहुत सारी जानकारियां मिली। तुम इसी तरह घूमती रहो और सारा यात्रा वृतांत इसी प्रकार लिखो हमें पढ़ते हुए बहुत अच्छा लगता है, ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम साक्षात उस गांव में ही घूम रहे हैं।
    चरैवेति चरैवेति

  22. ललित शर्मा, इतिहासकार (महाराणा कुम्भा इतिहास अलंकरण) says:

    मध्यप्रदेश में लोक संस्कृति पर जनकार्य करने हेतु प्रख्यात श्रीमती दिशा अविनाश शर्मा ने मालवा की करेड़ी माता, बगलामुखी, भैसवामाता सहित यहाँ के लोक के हृदय में बसे भैरव, शीतला, छींक, खोखुल, मोतीझरा, बैमाता, सहित लोकदेवता देवनारायण पर जो ब्लॉग बनाया है वह जमीनी तौर पर एक अमूल्य धरोहर है जो किसी भी एतद्विषयक शोध से कमतर नहीं है। उन्होंने स्थान विशेष पर जाकर वहाँ के पर्यावरण, ग्रामीण, परिवेश को गहरे से छुआ है। मध्यप्रदेश के लोक पर अभी तक जितना भी प्रकाशित हुआ है उसमें सोने में सुहागा वाली कहावत इस ब्लॉग में चरितार्थ होती है। प्रख्यात विद्वान कपिल तिवारी, केदारनाथ शुक्ल के वैदुष्यपूर्ण साक्षात्कार इस ब्लॉग को चार चाँद लगाते हैं। नलखेड़ा का वाममार्गी अवधारणा का देवीस्थल तथा लोक में शक्ति की अंगीकार वाली अवधारणा का क्रमिक विकास इस ब्लॉग का वैशिष्ट्य है। अनेक लोक विद्वानों, तांत्रिकों के मत ब्लॉग को पुष्टता प्रदान करते हैं। अनेक सुन्दर चित्रों से संयोजित इस ब्लॉग को पढ़कर सहज ही एक अनुपम ग्रन्थ की रचना की जा सकती है। यह दिशा जी की अथक मेहनत का फल है कि वे अकेली ही इस यात्रा में चरैवेति मंत्र को जीवंत कर रही हैं।

  23. डॉ मोहन गुप्त उज्जैन says:

    बहुत अच़्छा। आधार डॉ. कपिल तिवारी ने आगम से ही लिया है। लोक उससे भी परे है।

  24. हरीश दुबे, महेश्वर says:

    लोकास्था – लोकविश्वास मातृशक्ति धाम की त्रिकोण यात्रा
    का आपने जो लालित्यपूर्ण शैली
    में वर्णन किया है । वह अद्भुत है
    ऐसा लगा जैसे ललित निबंध पड़
    (सुन)रहें हों ।।
    बहुत सुंदर यात्रा संस्मरण ।
    विद्वान अतिथि महोदय ने कितना
    सहज व्याख्यायित किया गूढ़
    तत्वों को । वाह वाह ।।
    ???????

  25. वीरेंद्र सिंह says:

    आपका नया ब्लाग पढ़ कर अति प्रसन्नता हुई और जिज्ञासा और बढती जा रही है साथ ही ये सवाल भी उठ रहाँ है कि कितना बडा केन्द्र किसी समय में रहा होगा ये स्थान वामपंथी तपस्या और तांत्रिक साधना का जिसके जीवंत प्रमाण आपके शोध में बहुत ही साफ देखा जा सकता है शायद इतना बड़ा केन्द्र पूरे अखण्ड भारत में नहीं होगा पर वो कैसे धीरे-धीरे समाप्त हो गया ये भी बहुत घना रहस्य है जो आपने चौंसठ योगीनी मंदिर के अवशेष, व भैरव के अवशेष आप ने खोजे है वो भी आज के समय में बहुत ही सराहनीय प्रयास है मुझे लगता है कि यदि सरकार इसे चाहे तो आज ये भारत का पुरी दुनिया के लिए एक बहुत ही बड़ा पर्यटन स्थल बन सकता है और देश व दुनिया के लिए ज्ञान विज्ञान को समझने मे भी सहायक होगा और भारत के गौरवशाली इतिहास को बताने मे भी सहायक होगा ।

  26. Nitya dubey says:

    बहुत ही सुंदर लेखनी है और आपके द्वारा हमें मां बगलामुखी मंदिर के दर्शन हुए इस बात के लिए बहुत आभारी है अगली लेखनी का इंतजार रहेगा ??

  27. Kamal Dubey says:

    बहुत ही सुंदर लेखनी है बगुलामुखी जय महाकाल ?

  28. हंसराज नागर कोटा says:

    हमने आपके पांचो ब्लाग पढ लिऐ है ।पढकर अच्छा लगा सबसे पहले दो बातो के लिऐ साधुवाद देना चाहुंगा ,पहला यह की आपने ज्यादातर शुद्व हिन्दी शब्दो को धाराप्रवाह प्रयोग किया है ।जो आपकी विदुता को दर्शाता है ।यह अच्छी बात है ।कि आप हिन्दी को अपने मुल स्वरूप में  बहने देती है ।
    दुसरा यह है कि आपने फोटोग्राफ़ी उत्तम कोटि की है ।जिस भी छवि चित्र को देखते मन को भा सा जाता है ।सारे ब्लागो को पढकर ही आपके लेखन को थोडा बहुत जाना जा सकता है ।सब कुछ ठीक ठाक है ।हमारी शूभकामनाऐ आपके लेखन को।

  29. वर्षा नाल्मे अजमेर says:

    Disha mam ..आप मालवा की अन्जानी और छुपी हुई कला,संस्कृति ,और आस्था से सबको परिचित करवा रही हैं, हम मालवा वाले हृदय से आपका आभार एवं धन्यवाद प्रकट करते हैं ।????आपके ब्लोग पढ़ कर लगता हे हम आपके साथ घूम रहे हैं ?????????

  30. रजनीश भामौरिया पोलायकलां says:

    अद्भुत संग्रहण

  31. डॉ धरमजीत कौर वरिष्ठ पुराविद जयपुर says:

    बहुत महत्वपूर्ण जानकारी है दिशा जी, कई दिनो बाद यौगनियों के बारे में सार्थक व उपयोगी सूचनाएं मिली.

    दिशा जी, योगिनी शिल्प पर मैं एक पुस्तक लिख रही हुं इस बारे आपसे बात करूंगी ???

  32. लक्ष्मीनारायण पयोधि, भोपाल says:

    अच्छा वृत्तांत है।इसमें वर्णित अनेक देवी-देवता भील जनजाति समूह के लोगों की आस्था के केन्द्र भी हैं।डॉ. कपिल तिवारी जी ने बहुत गहराई से सृष्टि और देवलोक की अवधारणा को स्पष्ट किया है।
    इसमें मैं केवल इतना जोड़ना चाहता हूँ कि शास्त्रों की रचना लोक मान्यताओं के अवलोकन और विवेचन के आधार पर हुई होगी,क्योंकि लोक मान्यताएँ मानव-सभ्यता के आरंभिक विकास के साथ ही धीरे-धीरे स्थापित होती चली गयी हैं।ये परंपरा के रूप में आगे बढ़ी हैं।शास्त्र इन्हीं मान्यताओं के परिष्कृत रूप हैं।यह भी कहा जा सकता है कि शास्त्र एक प्रकार से लोक मान्यताओं का कोडिफ़िकेशन हैं।यह काम चिंतक,अध्ययनशील और अन्वेषक ऋषियों ने किया है,जो बहुत बाद की स्थिति है।इसलिये यह सोचना एक बड़ी भूल होगी कि क्या वैदिक,शास्त्रीय, पौराणिक आदि देवी-देवता कम पड़ गये थे,जो लोक ने एक बड़े देवलोक की रचना कर ली? कपिल जी ने सही कहा है कि लोक आस्था के मूल केन्द्रबिंदु भी शिवशक्ति हैं।इसी से हम अनुमान लगा सकते हैं कि लोक-आस्था और मान्यताएँ शास्त्रीय ज्ञान-परंपरा की अनुगामिनी नहीं हैं।
    आपका यह वृत्तांत और कपिलजी की बातचीत अत्यंत ज्ञानवर्द्धक है।आपकी जिज्ञासा,अन्वेषणशीलता और परिश्रम को प्रणाम!
    शुभकामनाएँ!

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