कश्मीर के अनंतनाग की भांड पथेर चौराहा नाटक शैली

कश्मीर

मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय के सभागार में कश्मीर की लोक प्रचलित चौराहा नाटक शैली ‘भाण्ड पथेर’ प्रहसन का दर्शी बनना हमारे लिए नये अनुभव से साक्षात्कार करने जैसा था। शिकारगाह पथेर शीर्षक से पर्यावरण तथा वनजीव संरक्षण का संदेश देकर कश्मीर की लोक संस्कृति को प्रतिबिम्बित करते प्रसंगों ने देखने वालों को न केवल गुदगुदाया बल्कि सोचने पर भी विवश कर दिया। ‘इम्तियाज अहमद बगथ’ के निर्देशन में की गयी प्रस्तुति में लकड़हारे और चरवाहे के संवाद, शिकारी और चरवाहे के बीच झड़प, चरवाहे और उसकी पत्नी का वार्तालाप, आलसी सिपाही की सजग चरवाहे के साथ विनोदमूलक वार्ता और अंत में राजा द्वारा …

Continue Reading

राजस्थान के चितौड़गढ़ के घोसुण्डा की कलगी तुर्रा शैली

राजस्थान

भोपाल स्थित मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय के सभागार में राजस्थान के चितौड़गढ़ के घोसुण्डा कस्बे से पधारे कलगी के उस्ताद मिर्जा अकबर बेग काग़ज़ी के निर्देशत्व में तुर्रा कलगी शैली में निबद्ध राजकुमारी फूलवंती की आकर्षक प्रस्तुति ने मन मोह लिया। डेढ़ घण्टे के इस अभिनव प्रस्तुतीकरण में दर्शक आद्यंत सम्मोहित हुए से बैठे रहे। सूरजगढ़ के राजकुमार फूल सिंह के विवाह संबंधित कथानक में फूलसिंह भाभी संवाद, रूष्ट राजकुमार के बड़े भाई का उन्हें मनाना, फूलसिंह का चन्दरगढ़ में प्रवेश और मालिन द्वारा उन्हें शरण देना, स्त्री भेश में महल में राजकुमार फूलसिंह और राजकुमारी फूलवंती का परिसंवाद, ये समस्त …

Continue Reading

बिहार का गोड़ऊ लोकनाट्य, बुंदेली लोकगान और असम के लोकनृत्य

बिहार का गोड़ऊ लोकनाट्य, बुंदेली लोकगान और असम की कथक गुरू मरामी मेंधी लोकनृत्य शैली देवधानी और ओझा पाली

पिछले दिनों भोपाल स्थित जनजातीय संग्रहालय के दर्शनगृह में देश की लोकसंस्कृति और लोकांचलों के परिवेश की सुरम्यता को अनुभूत करने का अवसर मिला। रंग प्रयोगों के प्रदर्शन की साप्ताहिक श्रृंखला के अन्तर्गत बिहार प्रान्त के गोड़ऊ लोकनाट्य शैली में शिव-विवाह प्रसंग का रसमय मंचन हुआ विलुप्त प्राय तीव्र गति से होने वाले गोड़ऊ अथवा हुड़का नृत्यों की बहुलता वाली इस शैली को बक्सर के प्रभुकुमार गोंड के निर्देशत्व में तैयार किया गया था। लगभग डेढ़ घण्टे की नृत्य संगीत और वार्तालाप वाली समन्वित प्रस्तुति लोकतत्वों से परिपूर्ण थी। लोक नाटक में राजा हिमालय के पुत्री के विवाह की चिंता, …

Continue Reading

लोक धारणा : राजा विक्रमादित्य के पिता राजा गन्धर्वसेन की गन्धर्वपुरी

राजा विक्रमादित्य

९० वर्षीया केसर बाई के लोकगीतों में आज भी राजा गन्धर्वसेन के प्रति श्रद्धा भाव द्वादश ज्योतिर्लिगों में प्रतिष्ठित ओंकारेश्वर तीर्थ से दर्शन करके लौटते समय मध्यप्रदेश के इन्दौर भोपाल मार्ग SH 18 पर देवास जिले के समीप सोनकच्छ से उत्तर पूर्व में बांए हाथ पर लगे एक संकेतक ने हमारा ध्यान आकृष्ट किया। ‘गंधर्वपुरी’ विस्फारित नेत्रों से पहले तो संकेतक पर दृष्टिपात किया उत्सुकता होनी स्वाभाविक थी सो हमने गाड़ी गंधर्वपुरी की ओर मोड़ दी। मार्ग में राहगीरों से पूछते पाछते हम काली सिंध नदी(प्राचीन नाम सिंधु जिसका कालिदास और वराहमिहिर ने भी स्मरण किया था) से आवृतित सागौन …

Continue Reading

मालवा की लोक नाट्य शैली माच, जबलपुर का देवीजस गान, जूनागढ़ का गरबा

मालवा जबलपुर जूनागढ़

आचार्य नरेन्द्र देव ने कहा था संस्कृति लोक चित्त की खेती है। निःसन्देह जिये हुए जीवन पर निर्भर लोक साहित्य लोकरस की प्रधानता के कारण ही लोक संस्कृति को उर्वरत्व प्रदान करता है। लोकसंस्कृति का यही वैशिष्ट्य हमें भोपाल स्थित जनजातीय संग्रहालय के मंच पर अभिनयन श्रृंखला के अन्तर्गत आयोजित मालवा के लोकनाट्य ‘माच’ के प्रभावशाली प्रदर्शन में दिखाई दिया। मध्यप्रदेश के मालवा की चिरप्रचलित लोकनाट्य शैली में मालीपुरा सांस्कृतिक माच मण्डल एवं लोक कल्याण समिति उज्जैन के लोक कलाकारों द्वारा प्रणवीर तेजा जी का मंचन मन को लुभा गया। वीरवर तेजा जी का खेल मालवा संस्कृति का अभिन्न अंग …

Continue Reading

देश का एकमात्र संस्कृत वृंद (बैण्ड) और आदिशंकराचार्य की रचनाएँ

ब्रह्म सत्यस्य सत्यम् यही भारतीय आस्थावादी दृष्टिकोण – स्वामी मुक्तानंद पुरी देश के हृदय स्थल मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के जनजातीय संग्रहालय में आयोजित शंकर व्याख्यानमाला के अन्तर्गत भक्ति आंदोलन में संतों की वाणी में अद्वैत दर्शन विषयक उद्बोधन में आदरणीय स्वामी मुक्तानंद पुरी जी ने परमतत्व से उद्भूत सृष्टि का पर्यवसान् भी उसी में निहित है कहकर संत रैदास तुलसी, सूरदास, कबीर, संत दादू दयाल और गुरु ग्रन्थ साहिब में निरुपित  विराट ब्रह्म की विश्व व्यापक संकल्पना को दोहराया। कार्यक्रम का आयोजन आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास ने किया था। सम्मान्य स्वामी मुक्तानंद पुरी जी ने कहा कि मध्यप्रदेश की धरती …

Continue Reading

हरियाणा का लोकनाट्य स्वांग, चम्बल का लांगुरिया गान, मालवा का मटकी और आड़ा नृत्य

किसी ने ठीक ही लिखा है कि लोक गीतों में ताजे पानी जैसा स्वाद होता है जबकि साहित्यिक गीतों में उबले पानी सा भान होता है सही भी है लोकविद्याएं लोक की वाणी से अद्भूत होती हैं और लोक द्वारा ही सहेजी जाती हैं। लोक शैलियों की इसी विलक्षणता को हमने हाल ही में भोपाल स्थित जनजातीय संग्रहालय के सभागृह में साक्षात् देखा व निरखा। कार्यक्रम में हरियाणा की अनुकृतिपरक लोकनाट्य स्वांग परंपरा में ‘शकुंतला दुष्यंत’ के मिलाप और भरत के जन्म के कथानक को कृष्णलाल सांगी और उनके दल ने दक्षता के साथ प्रस्तुत कर दर्शकों को रसविभोर कर दिया। …

Continue Reading

पंजाब की लोकनाट्य नकल चमोटा शैली, लोक नृत्य, और मालवा का कबीर गायन

पंजाब का लोक नृत्य, लोकनाट्य शैली, चमोटा, मालवा, कबीर, गायन, धर्म और संस्कृति

लोकमानस की कल्पनाशीलता पर आश्रित लोकसाहित्य का वैशिष्ट्य ही है कि वह स्वयंप्रसूतता और स्वयंस्फूर्तता होता है जिसमें लोक गीत बादलों की भांति झरते हैं और घांस की तरह उपजते हैं। हाल ही में भोपाल स्थित जनजातीय संग्रहालय के प्रेक्षागृह में पंजाब की लोकनाट्य नक़ल चमोटा शैली  में लोक संस्कृति के मूल्यों से रंजित ‘हीर रांझा’के चमत्कारिक प्रदर्शन को देखने का अवसर मिला। पंजाब के मालवा अंचल की मलवई उपबोली में लोक कलम से लिखे गये लोकप्रेम की निश्छलता लिऐ ‘हीर रांझा’की विशुद्ध प्रेमकथा को ख़ुशी मोहम्मद,सलीम मोहम्मद,मंज़ूर अली, इखलाक मोहम्मद,शौक़त अली,इमरान,जगतार सिंह,भिन्दर सिंह और विभाजन का दंश झेल चुके ७४ …

Continue Reading

लोकरंजन में शिव – राजस्थानी कूचामणि ख्याल, बघेली गीत, निमाड़ी गणगौर नृत्य

लोकरंजन में शिव

बहुधा लोकसंस्कृति के संवाहक लोकगीतों और लोक अख्यायिकाओं में देवी-देवताओं के प्रति लोक मानस की अटूट आस्था परिलक्षित होती है। उसमें भी विशेष रूप से सृष्टि संहार के प्रणेता मंगलमय शिव तो पूर्ण श्रद्धा से विराजे दिखते हैं। प्राकृतिक प्रकोपों से रक्षणार्थ पूजित शिव आध्यात्मिक साधना करने वाले तत्वज्ञानी से लेकर जन-जन के परमाराध्य हैं उनके प्रति तीव्र आसक्ति लोक मन में उपजती है, लोक भावों के रूप में लोकधुनों में ढलकर लोकगायकों के कंठ से निस्रत होकर लोकरंजन का माध्यम बनती है। ऐसे ही आयोजन के दर्शक बनने का हमें सुअवसर मिला सोचा आपसे साझा करूं। भोपाल स्थित जनजातीय …

Continue Reading

शिवमय स्पंदन की जागृत धरा : ओंकारममलेश्वर ज्योतिर्लिंग तीर्थ

शिवपुरी स्थित ओंकारेश्वर मंदिर का विहंगम दृश्य

ओंकारममलेश्वर तीर्थ ज्योतिर्लिंग महानगरीय जीविकोपार्जन से परिश्रांत (थकान) और यंत्रबद्ध जड़ता से जी जब उकता जाता है, तब भौतिकता के कल्मष को धोने के लिए मन कहीं दूर चलने को अकुलाता है। यों भी यात्राएं अपने भीतर और बाहर को भली-भांति झांकने (आत्मदर्शी बनाने) का उपयुक्त अवसर प्रदान करती हैं। यात्रा यदि तीर्थ की हो तो भगवत्प्राप्ति और अन्तःकरण की शुद्धि दोनों का ही मार्ग प्रशस्त करती है। अतः इस बार हमने द्वादश ज्योतिर्लिंगों की परिसंख्या में चतुर्थ क्रम में प्रतिष्ठित सात्वक शिवधाम श्री ओंकारममलेश्वर के दर्शन-स्तवन का कार्यक्रम बनाया। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 263 कि.मी. दूर स्थित ओंकारेश्वर …

Continue Reading