पंजाब की लोकनाट्य नकल चमोटा शैली, लोक नृत्य, और मालवा का कबीर गायन

पंजाब का लोक नृत्य, लोकनाट्य शैली, चमोटा, मालवा, कबीर, गायन, धर्म और संस्कृति

रब्बा दिल पंजाब दा पाकिस्तान च रह गिया ए।
कदे ना पुरा होना एसा घाटा पै गया ए।
वरिया बदल साडे ते जालम दे भाणे दा।
नहीं भूलना दुख संगता नुं विछड़े ननकाणे दा।
जित्थे बाबे जनम लिया उह कैसी थां होणी।
पूछु गा हर बच्चा पीड़ी जदों अगांह होणी।
कहणा पैणा रसता ए बंद उस टिकाणे दा।
नहीं भूलना दुख संगता नुं विछड़े ननकाणे दा।
जिनां गरीबां दे घर बाबा चल के आउंदा सी।
पुड़े छड के साग अलुणा खाणा चाहूंदा सी।
उहना नुं वी हूकम होया वीजा लगवाने दा।
नहीं भूलना दुख संगता नुं विछड़े ननकाणे दा।

हीर – रांझा की प्रस्तुति में भी गोरखनाथ जी से रांझा हीर के अप्रतिम सौन्दर्य को उपमानों के साथ कलीछंद में ऐसे वर्णित करता है कि सामने बैठे दर्शक का चित्त करूणा व प्रेम से भर जाता है जब वह कहता है-

कली (हीर दी सिफत)
तेरे टिल्ले तों उ सूरत दींहदी ए हीर दी ,
औ लै देख गोरखा उढदी उए फूलकारी।
बूल्ल पपीसीआं उहदीयां  गल्लां  गल गल नाल दियां।
टोआ ठोढी दे विच ना पतली ना भारी।
दोनो नैण  जट्टी दे भरे ने कौल शराब दे,
धौण सूराही मंगी मिरगां तोर उधारी।
गोरी धौण दूआले काली -गानी जट्टी दे ,
चंनण डोली नुं जिऊँ  नागां कूंढली मारी।

उपमेय भी कैसे निकटस्थ लोकजीवन से उठाये हुए -पंजाब की फुलकारी हस्तकला से निर्मित ओढ़नी ओढ़े हीर में रांझा संतरे की क़िस्म का गलगल फल , फुंनगी और गोरी गर्दन पर काली गानी चंदन से लिपटे भुजंग की प्रतीती कर रहा है। पंजाब में नकलियों की नकल मंडली के रूप में चर्चित इस कला में हारमोनियम और ढोलक वाला संगत भी करता है और संवाद का क्रम यथावत भी रखता है। प्राय: सभी विधाओं में पारंगत कलाकार अपने-अपने संवाद की अदायगी के उपरांत साज बजाते दिखते हैं।

इस लोककला के प्रदर्शन हेतु किसी मंच ,परदे और नेपथ्य की आवश्यकता नहीं होती, एक विशाल वृक्ष की पृष्ठभूमि में खुला आकाशीय वितान, विस्तारित मैदान, सीधी सादी बैठक व्यवस्था ही नाट्यशाला के लिए पर्याप्त होती है। इस लोक शैली के माध्यम से जन जागरण का कार्य भी किया जाता है, इन दिनों यह दल नशे की बुराईयों के प्रति अगाह भी करते चल रहें है। समता मूलक लोकधर्म और लोक दर्शन लिए यह कला गयात्मक, लयात्मक, पद्यात्मक और गद्यात्मक सभी दृष्टिकोणों से अद्भुत है। सांस्कृतिक एकता से प्रभावित इस लोककला के प्रदर्शन के बीच बीच में बेल (नकद ईनाम ) दी जाती है किसी संवाद अथवा किसी मसखरी पर रीझकर बेल देने वालों को मंच पर से ही आशीष दिया जाता है, यजमानों के सेहरा तक बाँधा जाता है। श्री हरदयाल सिंह थुही जी बताते है कि टीवी और मोबाइल की वर्तमान व्यापकता वाली व्यवस्था में लोकरंजन करने वालों को बेल का ही सहारा होता है। अपने आप में अनोखी इस कला को सहेजे जाने की आवश्यकता है। पंजाब संगीत नाटक अकादमी की इस दिशा में की जा रही पहल प्रशंसनीय है। मलेर कोटला और घनोर के इक्का दुक्का परिवारों तक सीमित इस कला को उसके पुराने स्वरूप में यथावत रखने वालों में फ़क़ीर मोहम्मद के परिवार का योगदान प्रशंसा के योग्य है।

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Comments

  1. दयाराम सारोलिया says:

    बहुत बहुत साधुवाद आपको

  2. हरदयाल सिंह थुही says:

    मैड़म दिशा जी, हमारी मंडली की ओर से भोपाल में जो लोकनाट्य नकल  चमोटा  शैली में ‘हीर रांझा ‘ की पेशकारी की गई उसकी आपने जो समीक्षा की है वो काबले तारीफ है। किसी दूसरे प्रदेश की लोक कला के बारे में इतनी गंभीर समीक्षा हर किसी के वस की बात नहीं होती।  छोटी से छोटी बात को भी आपने पकड़ा है। इसके लिए आपका हारदिक धन्यवाद।

    हरदयाल सिंह थुही

  3. जगजीत says:

    बहुत रोचक जानकारी
    जगजीत

  4. सिंगारा सिंह says:

    अति उत्तम
    सिंगारा सिंह