बुंदेलखण्ड की हास्य-परिहास वाली स्वांग परंपरा

बुंदेलखण्ड की हास्य-परिहास वाली स्वांग परंपरा

कांधे पर कपड़े की पोटली और लाठी लिए हठधर्मी भांजे और रंगीन एनक लगाये मम्मा के संलाप में बुंदेली भाषा की मीठास नीकी लगी। जब भानजा मामा से कहता है- काय मम्मा! कहां आय जा रये हो? आज तो बड़े नोने लग रये हो। मामा का प्रत्युत्तर होता है:- तोय काय करने है, तोरी मांई खों लिबाबे जा रये हैं।
भांजा – मैं सोंई चल हों बहोत दिनों से मांई खों देखों नईंया। लुआए चलो मांई के पास।
मामा – तो खों का देखने अरे देखने तो मोय है।
भांजा – मानो मम्मा लुआय चलों मांई के पास भोत दिना हो गये।
मामा – मैंने कै दई घरे रइयो, ले घरई रईये मैं तोय राजगिरा के लडुआ लाहों।
भांजा – आं हां मोय तो मेला को कलाकंद खाने है।
मामा- काय नईं मानत मैं तोय कलाकन्द और वई चिज्जू ले आहें, आदि संवादों पर दर्शक देर तक हंसते रहे। संवाद की समाप्ति के साथ ही मम्मा लुआय चलियों माई के प्यारे भनेजा मंच पर विराजे संगत कार नगड़ियां, झांझ, खंजड़ी, लोटा और केकड़ी लिये लोग गीत गाते हैं और लोक रसिक थिरकने लगते हैं। अनपढ़ भांजा ढलुआ बनाने के लिए (लगेन) डंगालों का एकत्रित करने जाता है।

पेड़ पर चढ़ने के क्रम में एक रस्सी के माध्यम से इन्द्र के रथ की सवारी कर वह इन्द्रलोक पहुंचता है। लोक के संकल्पनाकार कथानक में आगे इन्द्र द्वारा सौंपी गयी परी से चरवाहे के जीवन में आये बदलावों का चित्रण करता चलता है।  गीत व नृत्य प्रधान बुंदेली के इस स्वांग में आगे गन्ना (पोंड़ा) को लेकर मचल रहे ‘मम्मा भानेज’ का विनोद परक संवाद दर्शकों को गुदगुदाता है। बुंदेलखण्ड की असल सुवास लिए स्वांग में पूना बावरी का मंच पर पदार्पण लोकनाट्य का चरमोत्कर्ष होता है। समाज को दर्पण दिखाती पूना अपने अटपटे स्वरूप में ‘मचलबे को नाय’ का संदेश देती है। पढ़ाई लिखाई में ध्यान धरने और शांति से गुजर-बसर करने का ज्ञान दे कर पूना गांव में जन जागृति का कार्य करती है।

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Comments

  1. Hardial s thuhi says:

    Disha ji aap ke pryatan behad srahania hain. Aur raajon ki kalaon Ko aam logon tak pahuchana achhi baat hai.
    Hardial s thuhi