मणिपुर की सुमंग लीला में थोइबी और खाम्बा का प्रेमाख्यानक

दिलीप श्याम की अद्वितीय जनजातीय चित्रकला

प्रेक्षागृह से बाहर निकलने पर जनजातीय संग्रहालय परिसर में स्थित लिखंदरा दीर्घा में गोण्ड समुदाय के सिद्धहस्त चितेरे दिलीप श्याम के अद्वितीय 25 चित्रों की प्रदर्शनी देखने का सुअवसर मिला। दिलीप के भित्ती चित्रों का विस्तार विश्वस्तरीय रहा है। हाल ही में स्पेन के मैड्रिड शहर में सम्पन्न हुई यूनाइटेड नेशन्स की जलवायु परिवर्तन विषयक अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी में उनका चित्र चयनित सर्वोत्तम 16 कृतियों में स्थान पाने की उपलब्धि अंकित कर चुका है। वास्तव में दिलीप के  भित्ति अलंकरण गोंडी लोकाचार-लोकमान्यताओं और लोकदेवताओं की सहज स्वाभाविक बोधगम्य अभिव्यक्तियां हैं। अतीत में प्रकृति से रंगों की निष्पत्ति करने वाले गोण्ड चितेरे दिलीप वर्तमान में कलम और एक्रेलिक रंगों की प्रयुक्ति से ऐसे प्रतीकात्मक चित्र सिरजते हैं कि दर्शक हतप्रभ रह जाएं। सत्यत: आरण्य  संस्कृति की मौलिकता लिये दिलीप के चित्र उनके जीवनानुभवों की निधि हैं। मंडला ढिढोरी की माटी से अगाध लगाव जहां प्रकृति की मंजुल गोद में उनके माता-पिता से उन्होंने पहले पहल आदिवासी ग्राम्य जीवन का ककहरा सीखा था, प्रकृति और उसमें विचरते वन्यजीव उनके संगी साथी बने थे बस वहीं से उनके चितेरे मन ने लोक में अन्तर्निहित पक्षों को भित्तियों पर उतारना प्रारम्भ कर दिया था।  बाद में भोपाल प्रवास में दिलीप   ने अपने चाचा प्रसिद्ध जनजातीय चित्रकार स्वर्गीय जनगण सिंह श्याम की गुरूआई में पुरखों की विरासत की विस्तारता के गुरूमंत्र लिए  , या कहें कि जनगण के सानिध्य में लोकज्ञान की मौखिक परंपरा को निरावकाश अंगीकार किया। वे गर्व से बताते हैं कि सन्  २००७ में  उनहैं मध्य प्रदेश जनगण पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है ,सन् २०१६ में उन्हें मुंबई का प्रतिष्ठित प्रफुल्ला डहाणुकर सम्मान प्राप्त करने का गौरव हासिल हुआ है ।

उनके जनजातीय चित्रों को निरखने के उपरांत हमने उनसे बात की और शाश्वत  आभा लिये श्वेतश्याम रेखाकंनों और रंगों के असाधारण सामंजस्य वाले लोक चित्रों को समझने की चेष्टा की। निरालेपन लिए हुए इन चित्रों के पीछे लोक में प्रचलित मिथकों का अपार ज्ञान है यह दिलीप श्याम से बात करने पर ही समझ में आया। उन्होंने बताया कि प्रदर्शित जनजातीय चित्र उनकी पूजा का प्रतिफल हैं। गोण्डी महाभारत और पौराणिक आख्यायिकाओं को अपने कैनवास पर उतारने वाले दिलीप श्याम बताते हैं कि हम हमारे ईष्ट बाना देव का सुमिरन करते हैं अपने गुरू जनगण को स्मृतियों में लाते है और फिर गोंडी कथाओं में व्याप्त गऊ माता और बाघादि की कथा चित्रित करते हैं। वैतरिणी पार कराने वाली गाय माता आदिवासी अंचलों में आत्मा को तारने हेतु गऊ दान वाली ग्राम्य कथा की चित्रावली का कारण रहीं है। एक अन्य चित्र में उड़ता हुआ सूंड धारी हस्ती ‘एरावत हाथी’ की कथा से संबंद्ध है गोण्डी दंत कथााओं में मान्यता है कि खेत खलिहानों को हानि पहुंचाने वाले हाथी को पंख प्रदाय कर आकाश में विचरने के लिए विधाता द्वारा आज्ञापित किया गया था। कथा के अंत में हाथी के पर कतर कर मोर को प्रदत्त कर दिये जाने का प्रसंग भी आता है। हमने पाटनगढ़ की जनजातीय चित्रकला का प्रतिनिधित्व कर रहे दिलीप श्याम जी से मत्स्यकन्या की लोकगाथा भी सुनी। दिलीप के सहज सरल से दिखने वाले चित्र बहुधा गहरे अर्थ लिए हुए होते हैं इनमे आध्यात्मिक जनजातीय जीवन से जुड़े मिथकों की विलक्षणता दिखाई देती है सरल शब्दों में कहें तो जो कुछ उन्होंने अरण्य में  देखा है उसकी स्मृतियों को मिथकीय बिम्बों के साथ जस का तस कैनवास पर उतार दिया है इसीलिए महुआ, घाठरी, करुहा काजल, बाघ बाना देव, मोर मोरनी , रमेली,टिटहरी, मैना, आदि उनके चित्रों में पुनरावर्तित हुए हैं। मुंबई दिल्ली की प्रसिद्ध कला दीर्घा जहांगीर आर्ट गैलरी और राष्ट्रीय संग्रहालय नेहरू कला केन्द्र की कला वीथिकाएं दिलीप श्याम की गोण्डी चित्रकला से पटी हुई हैं। एनिमेशन के क्षेत्र की अगुआ तारा डगलस के साथ काम कर चुके दिलीप श्याम की कलायात्रा वास्तव में आदिवासी जन जीवन का दर्पण हैं, जिनमें हमारी आदिम संस्कृति और मनोवृत्ति का सौन्दर्यपरक अवतरण हुआ है। दिलीप के शब्दों से ही हम इस आलेख का समापन करते है। ये चित्र कोरी रेखाएं नहीं है हमारी पूजाएं हैं, हमारे पुरखों की स्मृतियाँ हैं, इन्हें सहेजना हमारा धर्म हैं,उसी में रत हैं। निःसंदेह अपनी संस्कृति को निरंतरता प्रदान करने वाले दिलीप के बोलते चित्र अबोले होकर भी बहुत कुछ बोलते हैं।

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Comments

  1. राम जूनागढ़ says:

    આપ બહુત સુંદર કાર્ય કર રહે હૈ.લોક સંસ્કૃતિ કે વિધ વિધ મોતી સમાન કલા કો દ્રશ્ય શ્રાવ્ય રુપ મે પિરસકર અનઠા કાર્ય કર રહે હો.
    ધન્યવાદ

  2. Santosh Manipur says:

    Madam Disha Sharma I’m very thankful to you for your article promoting our Manipuri  folk theatre  Shumang Leela.