हरियाणा का लोकनाट्य स्वांग, चम्बल का लांगुरिया गान, मालवा का मटकी और आड़ा नृत्य

किसी ने ठीक ही लिखा है कि लोक गीतों में ताजे पानी जैसा स्वाद होता है जबकि साहित्यिक गीतों में उबले पानी सा भान होता है सही भी है लोकविद्याएं लोक की वाणी से अद्भूत होती हैं और लोक द्वारा ही सहेजी जाती हैं। लोक शैलियों की इसी विलक्षणता को हमने हाल ही में भोपाल स्थित जनजातीय संग्रहालय के सभागृह में साक्षात् देखा व निरखा। कार्यक्रम में हरियाणा की अनुकृतिपरक लोकनाट्य स्वांग परंपरा में ‘शकुंतला दुष्यंत’ के मिलाप और भरत के जन्म के कथानक को कृष्णलाल सांगी और उनके दल ने दक्षता के साथ प्रस्तुत कर दर्शकों को रसविभोर कर दिया। …

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पंजाब की लोकनाट्य नकल चमोटा शैली, लोक नृत्य, और मालवा का कबीर गायन

पंजाब का लोक नृत्य, लोकनाट्य शैली, चमोटा, मालवा, कबीर, गायन, धर्म और संस्कृति

लोकमानस की कल्पनाशीलता पर आश्रित लोकसाहित्य का वैशिष्ट्य ही है कि वह स्वयंप्रसूतता और स्वयंस्फूर्तता होता है जिसमें लोक गीत बादलों की भांति झरते हैं और घांस की तरह उपजते हैं। हाल ही में भोपाल स्थित जनजातीय संग्रहालय के प्रेक्षागृह में पंजाब की लोकनाट्य नक़ल चमोटा शैली  में लोक संस्कृति के मूल्यों से रंजित ‘हीर रांझा’के चमत्कारिक प्रदर्शन को देखने का अवसर मिला। पंजाब के मालवा अंचल की मलवई उपबोली में लोक कलम से लिखे गये लोकप्रेम की निश्छलता लिऐ ‘हीर रांझा’की विशुद्ध प्रेमकथा को ख़ुशी मोहम्मद,सलीम मोहम्मद,मंज़ूर अली, इखलाक मोहम्मद,शौक़त अली,इमरान,जगतार सिंह,भिन्दर सिंह और विभाजन का दंश झेल चुके ७४ …

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