10वीं-13वीं सदी की परमारकालीन पुरातात्विक सम्पदा वाला शाजापुर जिला

भोपाल से शाजापुर तक 10वीं से 13वीं सदी में परमार नरेशों के सांस्कृतिक उन्नयन के प्रतिमान चप्पे-चप्पे पर  सूरज भल ऊगियो तुम जागो शंकर जी हो देव, तुम जागो हो ब्रह्म जी हो देव, तुम जागो विष्णु जी हो देव, सूरज भल ऊगियो रंग रातो जी दुनिया में हुओ उजास। मालवी भाषा की मिठास से पगी पंक्तियाँ इसलिए स्मृत हो आईं थीं क्योंकि आज हम पश्चिम मालवा के पुरातात्विक व ऐतिहासिक महत्व के स्थलों की जानकारियाँ एकत्रित करने के उद्देश्य से यात्रा पर निकले थे। उधर आकाश में धरती के उत्स में सम्मिलित होने के लिए सूर्य देव पटका बांधकर उद्यत हो …

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सिक्के वाले डॉ. आर. सी. ठाकुर के साथ अंतरंग भेंटवार्ता और महिदपुर दर्शन  

भोपाल से महिदपुर की साढ़े तीन घंटे की यात्रा, अश्विनी शोध संस्थान के संस्थापक डॉ. आर.सी. ठाकुर से वार्तालाप   कोहरे का दुशाला ओढ़े मानो कोई सौभाग्यवती सवेरे-सवेरे सूर्य दीपक जला गई हो और हम उसे निरखते हुए भोपाल से महिदपुर की यात्रा पर निकले हों उषाकाल में यही स्थिति थी राजमार्ग क्र.SH-18 और NH-52  पर, लगभग 240 किमी का रास्ता तय कर आज हम सिक्के वाले डॉ आर सी ठाकुर के अवेक्षणीय संग्रहण के अवलोकक बनने के लिए भोपाल से निकले हैं। लगभग चार लाख सिक्कों के अप्रतिम संग्रह के संबंध में जानने और समझने के उत्कंठातुर हम उज्जैन के महाकाल वन क्षेत्र …

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राजा विक्रमादित्य की बहन सुन्दराबाई का गांव सुन्दरसी

यात्रा का प्रारम्भ : भोपाल से सुन्दरसी पहुँच मार्ग में अखंड सनातन सत्य सी ग्राम्य संस्कृति कभी-कभी अनजाने ठिकानों को हेरना (ढूँढना) बहुत भला लगता है, है न!! इसीलिए  मुँह अँधेरे सूरज के जागने से पहले  इस बार हम श्यामपुर चांदबढ़ से होते हुए SH 41 मार्ग पर छतनारे बबूल के हट्टे-कट्टे वृक्षों के बीच से निकलकर  मालवांचल के गाँवों में अखंड सनातन सत्य सी ग्राम्य संस्कृति और तोतों-मोरों वाले भव्य नैसर्गिक विलास को निहारते हुए आगे बढ़े जा रहे थे। शाजापुर जिले के अंतर्गत आने वाला सुन्दरसी कस्बा हमारी गंतव्य स्थली था। हमने सुन रखा था ईसवी की प्रथम सदी में …

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उत्सवधर्मिता और औदात्य वाली धार्मिक नगरी अवन्तिपुर बड़ोदिया

अष्टनगर (आष्टा) होते हुए अवन्तिपुर बड़ोदिया पहुँच मार्ग पर कालिदास और वराहमिहिर द्वारा स्मृत काली सिंध नदी, पार्वती नदी,  नेवज नदी (निर्विन्ध्या) बाबा गरीबनाथ धाम और ध्वज स्तम्भ बचपन से ही मन यायावरी में ही रमता रहा है पर इन दिनों ज्ञानोत्कण्ठा लिए  खेत-खलिहान की आत्मीयता में अनचीन्हें स्थलों के अनुसंधान में  भटक रहा  है। राजा गंधर्वसेन  की नगरी गन्धर्वपुरी पर लेख लिखने के क्रम में प्राचीन भारत के 16 महा जनपदों में से एक अवन्ती जनपद के अन्तर्गत आने वाले मालवा के पश्चिमोत्तर भू-भाग में शाजापुर जिले की तहसील, धार्मिक नगरी अवन्तिपुर बड़ोदिया का बोर्ड दिखा। लगभग तभी निश्चय कर लिया था  कि अगली …

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लोकमतः शनिदेव की साढ़ेसाती ने सम्राट विक्रमादित्य को चम्पावती (चकल्दी) पहुंचाया

लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती में शांत मध्यप्रदेश के शाजापुर और सीहोर जिलों के अवन्तिपुर बड़ोदिया, पगरावद, रनायल, कोटरी, दिवड़िया, तिलावद, ढावला राय गाँवों में विक्रमादित्य की प्रशंसा के गीत पुरातन का सतत अनुसंधान हमारी यात्राओं के मूल में रहा है आज भी हम यात्रिक बन ऐसे अतीत में झांकने निकले हैं ,जिसमें हमें सम्राट विक्रमादित्य संबंधी एक  दंतकथा के  मर्म की खोज करना है  ,एक ऐसा राजा जिसे लोक ने देवता स्वरूप पूजा परन्तु इतिहास के समक्ष वह चुनौती बन गया हम उसी सर्वशक्तिमान लोकात्मा की सर्वप्रभुता के यथार्थ दर्शन के लिए निकले थे  कतिपय सूत्रों से पता चला था  कि  रमपुरा …

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राजा भोज का भोजपुर, आशापुरी और ढांवला में परमारकालीन मंदिर

bhopal bhojpur raja bhoj

पश्चिमाभिमुख भोजपुर मंदिर प्रदक्षिणा रहित होने के कारण निरंधार शैली में निबद्ध खेलते होंगे बच्चे यहां के कभी भरा समन्दर गोपी चन्दर बोल मेरी मछली तेरे तालाब में कितना पानी यह विचारते हुए होंठों पर स्मित (मुस्कान) तैर गयी थी। भोपाल से 32 कि.मी. दूर तक हरहराती बेतवा (वेत्रवती) नदी यमुना नदी में समागमित होने को आतुर, भूरे रंग की धूल खाई अनगढ़ चट्टानें, आम, महुआ, ईमली, पीपल, बड़ और सीताफल के असंख्य पेड़ों पर अटकी हुई धूप कलियासोत धारा को पार कर बायें हाथ पर बने विशालकाय नंदी को पीछे छोड़ते हुए हम परमारकालीन राजा भोज की नगरी भोजपुर …

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लोक धारणा : राजा विक्रमादित्य के पिता राजा गन्धर्वसेन की गन्धर्वपुरी

राजा विक्रमादित्य

९० वर्षीया केसर बाई के लोकगीतों में आज भी राजा गन्धर्वसेन के प्रति श्रद्धा भाव द्वादश ज्योतिर्लिगों में प्रतिष्ठित ओंकारेश्वर तीर्थ से दर्शन करके लौटते समय मध्यप्रदेश के इन्दौर भोपाल मार्ग SH 18 पर देवास जिले में सोनकच्छ से उत्तर पूर्व में बांए हाथ पर लगे एक संकेतक ने हमारा ध्यान आकृष्ट किया। ‘गंधर्वपुरी’ विस्फारित नेत्रों से पहले तो संकेतक पर दृष्टिपात किया उत्सुकता होनी स्वाभाविक थी सो हमने गाड़ी गंधर्वपुरी की ओर मोड़ दी। मार्ग में राहगीरों से पूछते पाछते हम काली सिंध नदी(प्राचीन नाम सिंधु जिसका कालिदास और वराहमिहिर ने भी स्मरण किया था) से आवृतित सागौन की …

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