उत्सवधर्मिता और औदात्य वाली धार्मिक नगरी अवन्तिपुर बड़ोदिया

अष्टनगर (आष्टा) होते हुए अवन्तिपुर बड़ोदिया पहुँच मार्ग पर कालिदास और वराहमिहिर द्वारा स्मृत काली सिंध नदी, पार्वती नदी,  नेवज नदी (निर्विन्ध्या) बाबा गरीबनाथ धाम और ध्वज स्तम्भ बचपन से ही मन यायावरी में ही रमता रहा है पर इन दिनों ज्ञानोत्कण्ठा लिए  खेत-खलिहान की आत्मीयता में अनचीन्हें स्थलों के अनुसंधान में  भटक रहा  है। राजा गंधर्वसेन  की नगरी गन्धर्वपुरी पर लेख लिखने के क्रम में प्राचीन भारत के 16 महा जनपदों में से एक अवन्ती जनपद के अन्तर्गत आने वाले मालवा के पश्चिमोत्तर भू-भाग में शाजापुर जिले की तहसील, धार्मिक नगरी अवन्तिपुर बड़ोदिया का बोर्ड दिखा। लगभग तभी निश्चय कर लिया था  कि अगली …

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लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती (चकल्दी) में शांत

लोकमतः राजा विक्रमादित्य का शनि प्रकोप चम्पावती में शांत   शनि प्रकोप से प्रभावित राजा विक्रमादित्य के चम्पावती नगरी में प्रवेश संबंधी कथानक के सूत्र चकल्दी में उपलब्ध मध्यप्रदेश के  शाजापुर जिले के अवन्तिपुर बड़ोदिया और पगरवाद गांवों में तुर्रा और कलगी के अखाड़े ढफ बजाकर अपने खयालों के माध्यम से विक्रमादित्य को लगी साढ़े साती शनि दशा को गा कर सुना रहे थे, सुनकर हम निःस्तब्ध थे। 2100 वर्ष बाद शनि की साढ़े साती से संत्रस्त राजपुरूष विक्रमादित्य की लोककथा आधारित गीत विक्रमादित्य  काल की ऐतिहासिकता को उद्घाटित कर रहे थे, इसी से उस दिव्य पुरूष की चतुर्दिक दिव्यता के प्रसरण का सहजता से अनुमान लगाना …

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राजा भोज का भोजपुर, आशापुरी और ढांवला में परमारकालीन मंदिर

bhopal bhojpur raja bhoj

पश्चिमाभिमुख भोजपुर मंदिर प्रदक्षिणा रहित होने के कारण निरंधार शैली में निबद्ध खेलते होंगे बच्चे यहां के कभी भरा समन्दर गोपी चन्दर बोल मेरी मछली तेरे तालाब में कितना पानी यह विचारते हुए होंठों पर स्मित (मुस्कान) तैर गयी थी। भोपाल से 32 कि.मी. दूर तक हरहराती बेतवा (वेत्रवती) नदी यमुना नदी में समागमित होने को आतुर, भूरे रंग की धूल खाई अनगढ़ चट्टानें, आम, महुआ, ईमली, पीपल, बड़ और सीताफल के असंख्य पेड़ों पर अटकी हुई धूप कलियासोत धारा को पार कर बायें हाथ पर बने विशालकाय नंदी को पीछे छोड़ते हुए हम परमारकालीन राजा भोज की नगरी भोजपुर …

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लोक धारणा : राजा विक्रमादित्य के पिता राजा गन्धर्वसेन की गन्धर्वपुरी

राजा विक्रमादित्य

९० वर्षीया केसर बाई के लोकगीतों में आज भी राजा गन्धर्वसेन के प्रति श्रद्धा भाव द्वादश ज्योतिर्लिगों में प्रतिष्ठित ओंकारेश्वर तीर्थ से दर्शन करके लौटते समय मध्यप्रदेश के इन्दौर भोपाल मार्ग SH 18 पर देवास जिले के समीप सोनकच्छ से उत्तर पूर्व में बांए हाथ पर लगे एक संकेतक ने हमारा ध्यान आकृष्ट किया। ‘गंधर्वपुरी’ विस्फारित नेत्रों से पहले तो संकेतक पर दृष्टिपात किया उत्सुकता होनी स्वाभाविक थी सो हमने गाड़ी गंधर्वपुरी की ओर मोड़ दी। मार्ग में राहगीरों से पूछते पाछते हम काली सिंध नदी(प्राचीन नाम सिंधु जिसका कालिदास और वराहमिहिर ने भी स्मरण किया था) से आवृतित सागौन …

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